त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
द्वादशोऽध्यायः। १६१ शृणु राम जगद्-भ्रान्तेर्मूलमेतत् सनातनम्। वस्त्वविद्यापूर्वकं यद्दृढा भावनमेव तत् ॥ ६ ॥ पश्यात्मानमविज्ञाय स्वात्मबुद्धिं शरीरके। क्व मांसरुधिरास्थीनि क्व चिदात्माऽतिनिर्मलः ॥ ७ ॥ केवलं भावनादार्ढ्याच्चिदात्मा देहकोऽभवत्। ज्ञातेऽप्यात्मनि चिद्रूपे भूयो भ्रान्तिः शरीरके ॥ ८ ॥ एवमेव भावनया सत्यं भाति जगत् खलु। विपरीतं भावयन् वै दृढं भ्रान्ति निवर्त्तयेत् ॥ ९ ॥ यो यथा भावयेदेतज्जगतस्य तथा भवेत्। योगिनां धारणाध्यानैः पश्य तद्रूपसङ्गतिम् ॥ १० ॥ अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुनरावृत्तमद्भुतम्। अस्ति वङ्गे सुन्दराख्यं पुरं परमपावनम् ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, इस जगत्-भ्रान्तिका अनादि मूल कारण यह है कि जो वस्तु अज्ञानसे भास रही है उसे हृदयसे दृढतापूर्वक पकड़ रखा है ॥ ६ ॥ देखो, आत्माको न जाननेके कारण ही तो शरीरमें आत्मबुद्धि हुई है। अन्यथा कहाँ ये मांस, रक्त और हड्डियाँ तथा कहाँ अत्यन्त निर्मल चेतन आत्मा ! ॥ ७ ॥ केवल भावनाकी दृढताके कारण ही यह शरीर चिदात्मा बन बैठा है। यहाँतक कि चिद्रूप आत्माको जान लेनेपर भी पुनः शरीरमें ही आत्मत्वकी भ्रान्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ ठीक इसी प्रकार भावनाकी दृढताके कारण ही संसार सत्य जान पड़ता है। अतः इसके विपरीत भावना करके इस दृढ भ्रान्तिको निवृत्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ जो जैसी भावना करता है उसके लिये यह, जगत् वैसा ही हो जाता है। देखो, योगियोंको धारणा-ध्यानादिके द्वारा तद्रूप अनुभव होने लगता है ॥ १० ॥ इस विषयमें मैं एक अद्भुत प्राचीन प्रसंगकी तुमसे चर्चा करता हूँ। वंगदेशमें सुन्दरपुर नामक एक बड़ा ही पवित्र नगर है ॥ ११ ॥
१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राऽऽसीन्नृपतिर्धीमान् सुषेण इति विश्रुतः। तस्य भ्राता महासेनो यवीयान् प्रियकृत् सदा ॥ १२ ॥ शशास राज्यं नृपतिर्धर्मतः सर्वसम्मतः। कदाचिदश्वमेधैः सोऽयजद्देवं महेश्वरम् ॥ १३ ॥ तत्र राजकुमारास्तु महाबलपराक्रमाः । महत्या सेनया यज्ञाश्वं सर्वेऽह्यनुसंययुः ॥ १४ ॥ अश्वस्य रोधकान् सर्वान् विजित्य बलिनो बलात्। ययुरैरावतीतीरमन्वश्वं नृपतेः सुताः ॥ १५ ॥ ददृशुस्तत्र राजर्षि तङ्गणाह्वयं तपोनिधिम् । बलोद्धता अवज्ञाय तमसङ्गम्य ते ययुः ॥ १६ ॥ तद्वीक्ष्य तङ्गणसुतः पित्रवज्ञां रुपान्वितः । जग्राहाश्वं यज्ञीयं तं राजपुत्रान् हि भर्त्सयन् ॥ १७ ॥ वहाँ सुषेण नामसे विख्यात एक बुद्धिमान् राजा था। उसका छोटा भाई महासेन था। वह सर्वदा उसका प्रिय करनेवाला था ॥१२॥ राजा धर्मपूर्वक राज्यका शासन करता था और सभीके द्वारा सम्मानित था। एक बार अश्वमेध यज्ञके द्वारा उसने भगवान् महेश्वरकी आराधना की ॥ १३ ॥ उस समय उसके सभी महान् बलवान् और पराक्रमी राजकुमार बड़ी भारी सेना लेकर यज्ञके लिये छोड़े हुए अश्वके साथ गये ॥१४॥ उन बलवान् राजकुमारोंने घोड़ेको रोकनेवाले सभी वीरोंको अपने पराक्रमसे परास्त कर दिया। इस प्रकार वे घोड़ेके पीछे इरावती नदीके तटपर पहुँचे ॥ १५ ॥ वहाँ उन्हें तंगण नामक तपोनिष्ठ राजर्षिके दर्शन हुए। किन्तु बलोन्मत्त होनेके कारण उन्होंने उनकी उपेक्षा कर दी और उनसे भेट किये बिना ही वे आगे चले गये ॥ १६ ॥ इस प्रकार पिताजीकी अवज्ञा होती देख तंगणके पुत्रको बड़ा क्रोध हुआ। उसने उस यज्ञीय अश्वको पकड़ लिया और उन राज- कुमारोंको ललकारा ॥ १७ ॥
द्वादशोऽध्यायः। १६३ अथ राजकुमारास्ते रुरुधुः सर्वतो हि तम् । तावत्तङ्गणपुत्रोऽपि गण्डशैलं पुरःस्थितम् ॥ १८ ॥ विवेशाश्वं समादाय पश्यत्सु राजसूनुषु । साश्वं शिलाविलीनं तं दृष्ट्वा राजकुमारकाः ॥ १९ ॥ विभिदुर्गण्डशैलं तं शस्त्रैरुच्चावचैः पृथक् । चूर्णिताद् गण्डशैलात् स महत्या सेनया वृतः ॥ २० ॥ निर्गत्य तङ्गणसुतो जिगाय युधि तान् क्षणात् । निहत्य सेनां सौषेणीं बध्वा राजकुमारकान् ॥ २१ ॥ प्रविवेश गण्डशैलं भूयस्तङ्गणसम्भवः । अथ सेनाभटाः शिष्टा गत्वा राज्ञे न्यवेदयन् ॥ २२ ॥ साश्वराजकुमाराणां हरणं गण्डशैलके । सुषेणो विस्मितोऽत्यन्तमुवाचाऽवरजं स्वकम् ॥ २३ ॥ वत्साऽऽशु गच्छ तं देशं यत्राऽऽस्ते तङ्गणो मुनिः । तपस्विनोऽचिन्त्यवीर्या अजेया देवमानुषैः ॥ २४ ॥ तब तो उन राजकुमारोंने उसे सब औरसे घेर लिया । बस, तंगणपुत्र उस घोड़ेको ले उन राजकुमारोंके देखते-देखते उनके सामनेवाली शिलामें घुस गया ॥ १८-१६ पू० ॥ राजकुमारोंने उसे घोड़ेके सहित शिलामें जाते देख छोटे-मोटे हथियारोंसे उस शिलाको फोड़ डाला ॥ १६ उ०-२० पू० ॥ उस फूटी हुई शिलासे तङ्गणपुत्र बड़ी भारी सेना लेकर निकला और क्षणभरमें ही उन्हें युद्धमें जीत लिया ॥ २० उ०-२१ पू० ॥ उसने सुषेणकी सेनाका संहार कर दिया और राजकुमारोंको बाँधकर फिर उसी शिलामें घुस गया ॥ २१ उ०-२२ पू० ॥ तब बचे-खुचे सैनिकोंने जाकर राजाको घोड़ेके सहित राजकुमारों के शिलामें हर ले जानेका समाचार सुनाया। इससे सुषेणको बड़ा विस्मय हुआ और उसने अपने छोटे भाईसे कहा ॥ २२ उ०-२३ ॥ "भाई ! तुम उस देशमें जाओ जहाँ तंगण मुनि विराजमान हैं। तपस्वियोंमें बड़ा अद्भुत सामर्थ्य होता है। वे देवता और मनुष्य सभीके लिये अजेय होते हैं ॥ २४ ॥
१६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तं प्रसाद्य सुतानश्वं चाऽऽसाद्याऽऽयाहि सत्वरम् । न कालोऽतिव्रजेदेष वसन्तो यज्ञसम्मतः ॥ २५ ॥ अभिमानो न कर्तव्यस्तपस्विषु कदाचन । क्रुद्धास्तपस्विनो लोकान् भस्मीकुर्युः क्षणेन वै ॥ २६ ॥ अतः प्रसादनपरो भूत्वा स्वार्थं प्रसाधय । इत्यादिष्टो महासेनस्तं देशं शीघ्रम्यायौ ॥ २७ ॥ अपश्यत्तङ्गणं तत्र समाहितमतिं दृढम् । काष्ठकुड्यात्मतां प्राप्तं शान्तेन्द्रियमनोधियम् ॥ २८ ॥ निर्विकल्पदशाम्भोधिनिलीनस्वात्मभावनम् । प्रणम्य दण्डवद् भूयः कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्महासेनो मुनीश्वरम् । तथा तस्य संस्तुवतो ह्यत्यगाद्वै दिनत्रयम् ॥ ३० ॥ अथाऽऽजगाम तत्पुत्रः सन्तुष्टः पितृसंस्तवात् । प्रोवाच तं महासेनं राजंस्तुष्टोऽस्मि संस्तवात् ॥ ३१ ॥ तुम उन्हें प्रसन्न करना और घोड़े तथा राजकुमारोंको कर शीघ्र ही लौट आना । देखो, यज्ञके लिये अनुकूल यह वसन्त का समय व्यतीत न हो जाय ॥ २५ ॥ तपस्वियोंके आगे कभी अभिमान नहीं करना चाहिये । तपस्वियोंको क्रोध हो जाय तो वे एक क्षणमें सम्पूर्ण लोकोंमें भस्म कर सकते हैं ॥२६॥ इसलिये तुम उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करके अपना काम बना लेना ।” राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर महासेन तुरंत उस देशमें पहुँचा ॥२७॥ वहाँ उसने तङ्गण मुनिको दृढ समाधिमें स्थित देखा । उनका शरीर काष्ठ और भीतके समान स्थिर था तथा इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि सर्वथा शान्त ॥ २८ ॥ उनका अहंकार निर्विकल्प दशारूप समुद्रमें डूबा हुआ था । तब महासेनने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अनेकों स्तोत्रोंसे उन मुनीश्वरकी स्तुति की । इस प्रकार स्तुति करते हुए उसे तीन दिन बीत गये ॥ २९-३० ॥ तब पिताकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर पुत्र आया और महासेनसे बोला, "राजन् ! मैं तुम्हारी प्रार्थनासे प्रसन्न हूँ ॥ ३१ ॥
द्वादशोऽध्यायः। १६५ ब्रूहि किं तेऽभिलषितं साधयाम्यविलम्बितम् । अहं पुत्रोऽस्म्यस्य विभोस्तङ्गणस्य महामुनेः ॥ ३२ ॥ नैतस्य मे पितुः कालो भाषणे शृणु भूमिप ! । समाहितस्वान्त एष द्वादशाब्दादनन्तरम् ॥ ३३ ॥ समाधितः समुत्तिष्ठेत्तत्र पञ्चाब्दका गताः । सप्ताऽवशेषा एवं हि समयोऽस्य पुरातनः ॥ ३४ ॥ तत्तेऽभिवाञ्छितं ब्रूहि यत्तस्मात्तत् करोम्यहम् । न मां वालं विजानीहि पितृतुल्यं तपस्विनम् ॥ ३५ ॥ नाऽसाध्यं विद्यते लोके योगिनां हि तपस्विनाम् । श्रुत्वा मुनिकुमारोक्तं महासेनोऽतिबुद्धिमान् ॥ ३६ ॥ प्राह तं तङ्गणसुतं प्रणम्य च कृताञ्जलिः । मुनिपुत्र ! प्रियं मेऽद्य करोषि यदि सत्यतः ॥ ३७ ॥ तत् पितुस्तेऽद्य वाञ्छामि समाधेर्व्युत्थितस्य वै । सह सम्भाषणं किञ्चिदेतदत्यन्तवाञ्छितम् ॥ ३८ ॥ बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है, मैं तुरंत उसे पूर्ण करूँगा। मैं इन परम समर्थ तंगण मुनिका पुत्र हूँ ॥ ३२ ॥ राजन् ! सुनो, अभी मेरे पिताजीके बोलनेका समय नहीं है। इनका अन्तःकरण समाधिमें लीन है। इस समाधिसे ये बारह वर्षोंमें उठेंगे अभी पाँच वर्ष बीते हैं, सात बाकी हैं। इस प्रकार पहलेसे ही इनका संकेत है ॥ ३३-३४ ॥ अतः इनसे तुम जो चाहते हो मुझे बताओ, मैं पूरा करूँगा। मुझे बच्चा मत समझो, मैं भी पिताके समान तपस्वी हूँ। तपस्वी योगियोंके लिये संसारमें कोई बात असाध्य नहीं होती” ॥३५-३६ पू०॥ मुनिकुमार की बातें सुनकर परम बुद्धिमान् महासेनने उसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोला-॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ “मुनिकुमार यदि आप इस समय सचमुच मेरा कोई प्रिय करना चाहते हैं तो मैं समाधिसे उठे हुए आपके पिताजीसे कुछ बात करना चाहता हूँ—यही मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ ३७ उ०-३८ ॥
१६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनुकम्प्यो यद्यहं ते द्रुतमेतत् प्रसाधय । श्रुत्वैतद्वचनं राज्ञः प्राऽऽह तापसजः पुनः ॥ ३९ ॥ राजन् न साध्यं ह्येतत्ते वाञ्छितं सर्वथा भवेत् । तथाऽपि ते करोमीति प्रतिश्रुत्याऽन्यथा कथम् ॥ ४० ॥ ब्रवीमि भूयस्तत् किञ्चित् प्रतीक्षस्वाऽभियाचितः । मुहूर्तमात्रं मे पश्य सामर्थ्यं योगसम्भवम् ॥ ४१ ॥ एष मेऽद्य गुरुः शान्तपदे परमपावने । संस्थितस्तं बाह्ययत्नैरपि को वै प्रबोधयेत् ॥ ४२ ॥ पश्याऽहं बोधयाम्येनं योगयुक्त्यैव सूक्ष्मया । इत्युक्त्वाऽथ समाविश्य समाहृत्येन्द्रियाण्यलम् ॥ ४३ ॥ प्राणेऽपानं सुसंयोज्य मुख्यप्राणेन निर्गतः । देहं पितुः प्रविश्याऽऽशु प्रलीनं तस्य मानसम् ॥ ४४ ॥ बोधयामास चाऽऽकृष्य प्रबोध्याऽऽशु विनिर्गतः । देहं स्वमाविशद् यावत्तावत् स बुबुधे मुनिः ॥ ४५ ॥ यदि आप मुझे कृपाका पात्र समझते हैं तो शीघ्र ही इसे पूर्ण कर दीजिये ।” राजाकी यह बात सुनकर मुनिपुत्रने पुनः कहा-॥ ३६ ॥ “राजन् ! तुम्हारी इस इच्छाका पूर्ण होना तो किसी प्रकार सम्भव नहीं है, तथापि मैं तुमसे 'तुम्हारा प्रिय करूँगा” ऐसा कहकर अब दूसरी बात कैसे कह सकता हूँ। तुम कुछ देर ठहरो और मेरा योग- सम्बन्धी सामर्थ्य देखो ॥ ४०-४१ ॥ इस समय ये मेरे गुरुदेव परमपवित्र शान्तिपदमें प्रतिष्ठित हैं, इन्हें बाह्य प्रयत्नोंसे तो भला, कौन जगा सकता है ? देखो, मैं इन्हें योगकी अत्यन्त सूक्ष्म युक्तिसे जगाता हूँ” ॥ ४२-४३ पू० ॥ ऐसा कहकर वह बैठ गया और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका पूर्णतया निरोध- कर उसने अपानको प्राणके साथ मिलाया। फिर मुख्य प्राणके द्वारा बाहर आकर तुरन्त ही अपने पिताके शरीरमें प्रविष्ट हो गया और उनके सुप्त मनको आकर्षित करके सजग कर दिया। इस प्रकार उन्हें सावधान कर तुरन्त ही वहाँसे निकल कर जैसे ही अपने शरीरमें प्रविष्ट हुआ उसी समय वे मुनिवर भी जागृत हो गये ॥ ४३ उ०-४५ ॥
द्वादशोऽध्यायः। १६७ अपश्यदग्रगं भूपं स्तुवन्तं प्रणतं तदा। किमेतदिति सञ्चिन्त्य सर्वं योगदृशाऽविदत् ॥ ४६ ॥ प्रसन्नचित्त आमन्त्र्य पुत्रं प्राह सुशान्तधीः। वत्स ! नैवं पुनः कार्यं क्रोधस्तु तपसो रिपुः ॥ ४७ ॥ राज्ञा हि रक्षिते लोके तपो निर्विघ्नमेधते । यज्ञविघ्नक्रिया दैत्यस्वभावो न मुनेः क्वचित् ॥ ४८ ॥ प्रयच्छाऽश्वं राजपुत्रानप्यस्मै सुमना द्रुतम् । शीघ्रं यात्वेष यज्ञस्य न कालातिक्रमो भवेत् ॥ ४९ ॥ इत्युक्तो गण्डशैलं स प्रविश्य क्षणमात्रतः । साश्वान् राजसुतांस्तस्मै ददौ प्रीत्या गतक्रुधः ॥ ५० ॥ ततः साश्वान् भ्रातृपुत्रान् संप्रेष्य नगरं प्रति । महासेनस्तद्गणं तं प्रणम्यात्यन्तविस्मितः ॥ ५१ ॥ अपृच्छत् प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रसाद्य मुनिपुङ्गवम् । उस समय उन्होंने अपने सामने राजाको अत्यन्त विनीत होकर स्तुति करते देखा। फिर यह सोचकर कि यह सब क्या मामला है उन्होंने योगदृष्टिसे सब बात जान ली ॥ ४६ ॥ तब उन्होंने प्रसन्न चित्तसे अत्यन्त शान्तिपूर्वक पुत्रको सम्बोधन करके कहा, "बेटा ! ऐसा काम फिर कभी मत करना। यह क्रोध तो तपस्याका शत्रु है ॥ ४७ ॥ राजाके द्वारा लोककी रक्षा ( सुव्यवस्था ) होनेपर ही निर्विघ्नता- पूर्वक तपकी वृद्धि होती है। यज्ञमें विघ्न करना-यह तो दैत्योंका स्वभाव है, मुनियोंका कभी नहीं ॥ ४८ ॥ इसलिये तुम प्रसन्नचित्त होकर तुरन्त ही इन्हें घोड़ा और सब राजकुमार दे दो। इन्हें जल्दी ही जाना चाहिये, जिससे यज्ञका समय निकल न जाय ॥ ४९ ॥ पिताकी ऐसी आज्ञा होनेपर मुनिपुत्रका क्रोध शान्त हो गया। वह उस शिला में घुसा और एक क्षणमें ही घोड़ेके सहित राजपुत्रोंको लाकर प्रीतिपूर्वक महासेनको सौंप दिया ॥ ५० ॥ तब घोड़ेके सहित राजकुमारोंको नगर की ओर भेजकर महासेनने
१६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भगवन् ज्ञातुमिच्छामि साश्वा मे भ्रातृनन्दनाः ॥ ५२ ॥ कथं गण्डशैलगर्भे संस्थितास्तत् समीरय । एवं राज्ञानुयुक्तोऽथ तङ्गणः प्राह भूपतिम् ॥ ५३ ॥ शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराऽहं पृथिवीपतिः । समुद्रवलयां पृथ्वीमन्वशासं चिरं खलु ॥ ५४ ॥ महादेवप्रसादेन ज्ञात्वा चितिमधीश्वरीम् । त्रिपुरां लोकसंस्थानं नीरसं विमृशंस्तथा ॥ ५५ ॥ निर्विण्णो लोकयात्रायां न्यस्य राज्यं सुतेष्वथ । प्राविशं वनमेतं वै भार्या मामन्वगात् सती ॥ ५६ ॥ तस्याभितप्यतो मेऽद्य ययुरर्बुदवत्सराः । भार्यापि मत्सेवनेन परां सिद्धिमूपागता ॥ ५७ ॥ कदाचिदथ भाव्यर्थगौरवान्मे प्रिया सती । समाधावेव कामार्त्तमानसाभूत्ततस्तु सा ॥ ५८ ॥ मां दृष्ट्वा रतिमिच्छन्ती समाधिस्थं स्थिरान्तरम् । अत्यन्त विस्मित हो तंगण मुनिको प्रणाम किया और उन मुनिश्रेष्ठको प्रसन्न कर उनसे हाथ जोड़कर पूछा—॥ ५१-५२ पू० ॥ “भगवन् ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि घोड़ेके सहित मेरे ये भतीजे इस शिलाके भीतर कैसे रहे—बतानेकी कृपा करें” ॥५२ उ०-५३ पू०॥ राजाके ऐसा प्रश्न करनेपर तंगणमुनिने उससे कहा, “राजन् ! सुनो, अपना मैं हाल बताता हूँ । पहले मैं भी राजा था और बहुत दिनों तक मैंने समुद्रपर्यन्त इस भूमण्डलका शासन किया है ॥५३ उ०-५४॥ भगवान् महेश्वरकी कृपासे मुझे सर्वलोकमहेश्वरी चित्स्वरूपा त्रिपुराका ज्ञान हो गया । इससे मैं दृश्य जगत्को नीरस समझकर लोकव्यवहारसे विरक्त हो अपना राज्य पुत्रोंको सौंपकर इस वनमें चला आया । मेरी सती धर्मपत्नी भी मेरे साथ चली आयी ॥ ५५-५६ ॥ यहाँ तपस्या करते-करते मुझे एक अरब वर्ष व्यतीत हो गये । मेरी सेवा करते रहनेसे मेरी पत्नीको भी परम पदकी प्राप्ति हो गयी ॥ ५७ ॥ पीछे किसी समय होनहारके प्रभावसे मेरी पतिपरायणा धर्मपत्नीका चित्त समाधि अवस्थामें ही कामाकुल हो गया ॥ ५८ ॥ उसे रतिकी इच्छा हुई । किन्तु उसने देखा कि मैं
द्वादशोऽध्यायः । १६६ असहन्ती कामवेगं भावयामास मद्रतिम् ॥ ५९ ॥ गाढभावनया प्राप्य सम्भोगं तु मया सह । दधार गर्भं सुषुवे पुत्रमेतं पुरः स्थितम् ॥ ६० ॥ पुत्रं न्यस्य मदुत्सङ्गे मां समाधेः प्रबोध्य च । देहं भूतेषु सात्कृत्य परव्योमाऽऽत्मतां ययौ ॥ ६१ ॥ अथ दृष्ट्वोत्सङ्ग एनं ज्ञात्वा तस्या गतिं पराम् । दयाक्रान्तमना जातस्तेनायं वर्द्धितो मया ॥ ६२ ॥ श्रुत्वा कदाचिन्मत्तोऽयं राज्यशास्तिं पुरा कृताम् । राज्यशासनकामोऽभूत् प्रार्थयामास मामनु ॥ ६३ ॥ ततो मदुपदेशेन प्राप्य योगर्द्धिमुत्तमाम् । निर्माय भावनायोगात् लोकमस्मिन् महाऽश्मनि ॥ ६४ ॥ समुद्रवलयां पृथ्वीं शास्ति नित्यं सुतस्त्वयम् । तल्लोकेऽश्वः सुता राज्ञो निरुद्धास्ते हि मोचिताः ॥ ६५ ॥ स्थित और अत्यन्त अन्तर्मुख हूँ । तब कामवेगको सहन न कर सकनेके कारण उसने मेरे साथ सम्भोग की भावना की ॥ ५६ ॥ गाढ़ भावनाके कारण उसे मेरे साथ सम्भोगकी प्राप्ति हो गयी और उसने गर्भ धारण किया । तब उसने यह सामने विद्यमान पुत्र उत्पन्न किया ॥ ६० ॥ उसने पुत्र मेरी गोदमें रख दिया और मुझे समाधिसे जगा दिया । फिर शरीर को पञ्चभूतोंमें लीनकर वह स्वयं परब्रह्मसे अभिन्न हो गयी ॥ ६१ ॥ इसे अपनी गोदमें देखकर और उसे परमपदमें लीन जानकर मेरा चित्त दयासे भर गया । इसीसे मैंने इसका पालन-पोषण किया ॥ ६२ ॥ एक बार इसने मुझसे मेरी पूर्वकालिक राज्यशासनकी बात सुनी तो इसे भी राज्य करनेकी इच्छा हो गयी और इसने मुझसे प्रार्थना की॥६३॥ तब मेरे उपदेशसे इसने उत्तम योगसम्पत्ति प्राप्त की और अपने संकल्पसे ही इस विशाल शिलामें एक विश्वकी रचनाकर यह मेरा पुत्र सर्वदा आसमुद्र भूमण्डलका शासन करता है । उसी लोकमें इसने तुम्हारे घोड़े और राजपुत्रोंको कैद कर लिया था, जिन्हें अब छोड़ दिया है ॥ ६४-६५ ॥
१७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे इत्येतत्ते समाख्यातं गण्डशैलेऽवरोधनम् । इति श्रुत्वा मुनिवचो भूयः पप्रच्छ भूपतिः ॥ ६६ ॥ श्रुतं त्वदुक्तमेतद्वै महाश्चर्यकरं परम् । तं लोकं द्रष्टुमिच्छामि कृपया मे प्रदर्शय ॥ ६७ ॥ इति सम्प्रार्थितो राज्ञा मुनिः पुत्रं समादिशत् । वत्सास्मै दर्शय स्वीयं लोकं सर्वं यथेप्सितम् ॥ ६८ ॥ इत्युक्त्वा तङ्गणो भूयः प्रांवेवेश समाहितिम् । अथ तं तङ्गणसुतः समासाद्य नृपं ययौ ॥ ६९ ॥ गण्डशैलं प्रति ततः प्राविशन्मुनिदारकः । प्रवेष्टुं नाशकद् भूप आह्वयतं मुनेः सुतम् ॥ ७० ॥ सोऽपि गण्डशिलान्तस्थो राजानं समुपाव्हयत् । अथ भूयो विनिष्क्रम्य प्राह भूपं मुनेः सुतः ॥ ७१ ॥ नृपैष लोकस्तेऽसाध्यः प्रवेष्टुं खल्वयोगिनः । अयोगाद् गण्डशैलोऽयं घनः सप्रतिघोऽभवत् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार मैंने तुम्हें शिलाके भीतर कैद करनेकी कथा सुना दी।” मुनिवरका यह वक्तव्य सुनकर राजाने पुनः पूछा—॥ ६६ ॥ “आपके मुखसे मैंने यह बड़ा ही आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुना। अब मैं उस लोककी देखना चाहता हूँ। दिखानेकी कृपा करें” ॥ ६७ ॥ राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर मुनिवरने अपने पुत्रको आज्ञा दी, “बेटा ! तुम इसे इच्छानुसार अपना सारा संसार दिखा दो” ॥ ६८ ॥ ऐसा कहकर तंगणमुनि पुनः समाधिमें प्रविष्ट हो गये। तब उनका पुत्र राजाको लेकर उस शिलाके समीप गया वहाँ पहुँचकर वह मुनिपुत्र तो शिलामें घुस गया किन्तु राजा प्रवेश नहीं कर सका। तब उसने मुनिकुमारको पुकारा ॥ ६९-७० ॥ उधर शिलाके भीतरसे उसने भी राजाको पुकारा। फिर बाहर आकर उसने राजासे कहा—॥ ७१ ॥ राजन् ! तुम योगी नहीं हो, इसलिये तुम्हारे लिये तो इस शिलामें घुसना सम्भव नहीं है। योगहीन होनेके कारण ही तुम्हें यह शिला सघन और रुकावट डालनेवाली जान पड़ी ॥ ७२ ॥
द्वादशोऽध्यायः । १७१ नेतव्यस्तं सर्वथैव पितुर्वचनगौरवात् । तदत्र देहं विन्यस्य कोटरे तृणसंवृते ॥ ७३ ॥ मनोमात्रशरीरः सन् शैलं विश मया सह । इत्युक्तः प्राह नृपतिरशक्तो देहनिर्गमे ॥ ७४ ॥ कथं मुने देहमिममुत्सृजामि समीरय । उत्सृजामि यदि बलात्नाशमेष्यामि सर्वथा ॥ ७५ ॥ एवं वदन्तं नृपतिं प्रहस्याह मुनेः सुतः । अहो योगानभिज्ञोऽसि चाऽस्तु नेत्रे निमीलय ॥ ७६ ॥ इत्युक्त्वा मीलिताक्षं तं प्रविश्य निमिषार्द्धतः । आकृष्य तल्लिङ्गतनुं क्षिप्त्वा श्वभ्रे च तत्तनुम् ॥ ७७ ॥ योगसामर्थ्यतः शैले निविश्य नृपसंयुतः । सुषुप्तं देहवैकल्यात् स्वसङ्कल्पोत्थदेहके ॥ ७८ ॥ संयोज्य बोधयामास प्रबुद्धो नृपतिस्तदा । गृहीतं मुनिनाऽपश्यत् स्वं महागगने तदा ॥ ७९ ॥
तथापि पिताजीकी आज्ञाके कारण किसी भी प्रकार तुम्हें ले चलना ही होगा । अतः तुम घास-फूससे ढके हुये इस गढ़ेमें अपना शरीर रख दो और केवल मनोमय शरीरसे मेरे साथ शिलामें चले आओ” ॥ ७३-७४ पू० ॥ ऐसा कहे जानेपर राजा बोला, “मैं शरीरसे बाहर आनेमें असमर्थ हूँ । मुने ! बताओ तो, मैं किस प्रकार इस शरीरको छोड़ूँ । यदि इसे बलपूर्वक छोड़ भी दूँ तो मेरा तो सर्वथा नाश हो जायगा” ॥ ७४ उ०-७५ ॥ राजाके ऐसा कहनेपर मुनिकुमार हँसकर बोला, “अरे ठाक, तुम तो योग नहीं जानते । अच्छा, तुम आँखें मूंद लो” ॥ ७६ ॥ मुनिपुत्र ऐसा कहकर, राजाके आँख मूँद लेनेपर, आधे पलमें ही उसके भीतर घुस गया । उसने राजाके लिंग शरीरको बाहर खींचा और स्थूल शरीरको गढ़ेमें डाल दिया फिर अपने योगबलसे राजाके सहित शिलामें घुस गया । देहसे पृथक् हो जानेके कारण इस समय राजाका लिंग शरीर अचेत था । उसे अपने संकल्पसे बनाये हुए शरीरसे संयुक्त करके सावधान किया तो राजा सचेत हो गया ! तब
१७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ऊर्ध्वं विष्वक् च संपश्यन् नभो भीममनन्तकम् । भीतः प्राह मुनेः पुत्रं मुने मां न परित्यज ॥ ८० ॥ परित्यक्तो विनश्यामि पतिष्येऽहं निराश्रये । इति भीतं नृपं दृष्ट्वा प्रहस्याऽऽह मुनेः सुतः ॥ ८१ ॥ परित्यज भयं भूप नोत्सृजामि निशामय । एनं शैलान्तरस्थानं लोकं धैर्येण सर्वतः ॥ ८२ ॥ अथ धैर्यं समालम्ब्य नृपः समवलोकयन् । अधो दूरे सनक्षत्रमभ्रमन्धतमोवृतम् ॥ ८३ ॥ प्रविश्य तं देशमपि ततोऽधस्तात् प्रपश्यत् । चन्द्रमण्डलमास्फीतं तत्राऽऽगत्य जडीकृतः ॥ ८४ ॥ चन्द्रमण्डलशीतेन मुनिपुत्रेण रक्षितः । अथ प्राप्य सूर्यलोकं तत्करैरभितापितः ॥ ८५ ॥ मुनिपुत्रेण योगेन शिशिरीकृतदेहकः । अपश्यल्लोकमखिलं स्वर्लोकप्रतिविम्ववत् ॥ ८६ ॥ उसने देखा कि मुनिपुत्र उसे बड़े भारी आकाशमें पकड़े ले जा रहा है ॥ ७७-७६ ॥ अपने ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर अति भयानक एवं असीम आकाश ही देख कर वह डर गया और मुनिपुत्रसे बोला, “मुने । मुझे छोड़ मत देना । आप छोड़ देंगे तो मैं इस निराधारमें गिरकर मर जाऊँगा” । इस प्रकार राजाको भयभीत देखकर मुनिकुमारने हँसकर कहा—॥ ८०-८१ ॥ “राजन् ! भय छोड़ दो, मैं छोडूंगा नहीं । यह शिलाके भीतर स्थित लोक है । इसे धैर्यपूर्वक सब ओर देखो” ॥ ८२ ॥ अब राजाने धैर्य धारणकर देखा तो उसे बड़ी दूरीपर नक्षत्रोंके सहित अन्धकारसे आच्छादित आकाश दिखायी दिया ॥ ८३ ॥ उस प्रदेशमें भी घुसकर जब नीचेकी ओर देखा तो बड़ा विशाल चन्द्रमण्डल दीख पड़ा । वहां पहुँचकर वह चन्द्रलोककी ठंडसे अकड़ गया । तब मुनिपुत्रने उसकी रक्षा की ॥ ८४-८५ पू० ॥ फिर जब सूर्यलोकमें पहुँचा तो वह सूर्यकी किरणोंसे झुलसने लगा । तब मुनिपुत्रने योगद्वारा उसके शरीरको शीतल किया । उसे वह सारा
द्वादशोऽध्यायः। १७३ अथ शृङ्गे हेमगिरेर्मुनिना सह संस्थितः । मुनिप्रदर्शितं सर्वमपश्यत् पृथिवीपतिः ॥ ८७ ॥ देशान्तरावलोकाय मुनिदत्तशुभेक्षणः अपश्यद्वलयात्मानं लोकालोकाख्यपर्वतम् ॥ ८८ ॥ तद्बहिर्ध्वान्तसन्दोहमन्तःसौवर्णमेदिनीम् । समुद्रान् सप्तद्वीपांश्च नदीगिरिसमाकुलान् ॥ ८९ ॥ भुवनान्यपि सर्वाणि चेन्द्राद्यान् विबुधोत्तमान् । दैत्यान् मनुष्यान् रक्षांसि यक्षकिंपुरुषादिकान् ॥ ९० ॥ तत्राऽपश्यत् सत्यलोके वैकुण्ठे राजते नगे । मुनिपुत्रं स्वमात्मानं ब्रह्मविष्णुशिवात्मना ॥ ९१ ॥ विभज्य संस्थितं सर्वलोक-सृष्ट्यादिहेतवे । अथोऽपश्यद् भूविभागे कृत्वा रूपान्तरं तथा ॥ ९२ ॥ प्रशासनपरो भूमेः सार्वभौमत्वमास्थितः । एवं मुनिकुमारस्य दृष्ट्वा योगर्द्धिमुत्तमाम् ॥ ९३ ॥ लोक स्वर्गलोकके प्रतिबिम्बके समान दिखायी दिया ॥ ८५ उ०-८६ ॥ फिर वह मुनिके साथ ही हिमालयके शिखरपर उतरा। वहाँसे वह मुनिपुत्रके दिखानेसे सब वस्तुएँ देखने लगा ॥ ८७ ॥ विभिन्न देशोंको देखनेके लिये मुनिने उसे सुन्दर दृष्टि दे दी। उससे उसने चारों ओर मण्डलाकार लोकालोक पर्वतको देखा ॥ ८८ ॥ उसके बाहर की ओर घोर अन्धकार था और भीतरकी ओर सुवर्णमयी भूमि थी। इसके सिवा उसने सब समुद्र, नदी और पर्वतोंसे पूर्ण सातों द्वीप, सभी भुवन, इत्यादि प्रधान-प्रधान देवगण, दैत्य, मनुष्य, राक्षस, यक्ष और किन्नर आदि सभी देखे ॥ ८९--९० ॥ वहाँ उसने यह भी देखा कि वह मुनिपुत्र ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीन रूपोंमें अपने ही को विभक्त करके लोकों की रचना आदिके लिये सत्यलोक, वैकुण्ठ और कैलाशमें विराजमान है ॥ ९१-९२ पू० ॥ साथ ही यह भी देखा कि पृथ्वीतलमें एक अन्य रूप धारणकर वही सार्वभौम सम्राट्के पदपर स्थित हो पृथ्वीका शासनकर रहा है ॥ ९२ उ०-९३ पू० ॥
१७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विस्मितोऽभून्महासेनस्ततः प्राह मुनेः सुतः । राजन्नेतल्लोकजातं पश्यतः काल अत्यगात् ॥ ९४ ॥ अर्बुदानां द्वादशकमितोऽप्यत्र दिनात्मकः । गच्छावो बाह्यलोकं तं यत्रास्ते जनको मम ॥ ९५ ॥ इत्युक्त्वा भूभृता तेन सह भूयः समागतः । पूर्ववत्तं गण्डशैलान्निर्गत्याभ्याययौ बहिः ॥ ९६ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गण्डशैललोकावलोकने द्वादशोऽध्यायः ॥ मुनिकुमारका ऐसा योगसामर्थ्य देखकर महासेनको बड़ा आश्चर्य हुआ । तब उससे वह मुनिपुत्र बोला ॥ ६३ उ०-६४ पू० ॥ राजन् ! इन लोकोंको देखते हुए हमें बारह अरब वर्ष बीत चुके हैं और यहाँ अभी एक दिन ही हुआ है । अब हम बाहरके लोकमें चलेंगे, जहाँ मेरे पिताजी विराजमान हैं ॥ ६४ उ०-६५ ॥ ऐसा कहकर वह राजाके सहित पुनः लौट आया । पहले ही की भाँति उसने शिलाको पार किया और बाहर आ गया ॥ ६६ ॥ द्वादश अध्याय समाप्त ।
त्रयोदशोऽध्यायः मुनिपुत्रः पुनः शैलान्महासेने विनिर्गते । विधाय मूर्च्छितं लिङ्गदेहं संस्कारमात्रकम् ॥ १ ॥ समादाय विनिर्गत्य प्राक्षिपत्तच्छरीरके । उत्थापयामास तु तं जीर्णदेहसुसङ्गतम् ॥ २ ॥ अथोत्थितो महासेनो बाह्यलोकं समीक्ष्य तु । भुवं जनांस्तरून् स्रोतोह्रदादींश्चापि नूतनान् ॥ ३ ॥ बभूव विस्मितोऽत्यन्तं पप्रच्छ मुनिनन्दनम् । कतमो वै महाभाग लोकोऽयं मे प्रदर्शितः ॥ ४ ॥ पुरादृष्टादपूर्वोऽयं समाचक्ष्वैतदद्भुतम् । इत्यापृष्टो मुनिसुतो महासेनमुवाच ह ॥ ५ ॥ शृणु राजन्नयं लोकः पूर्वं योऽस्माभिरास्थितः । स एव चिरकालेन परिणामान्तरं गतः ॥ ६ ॥ त्रयोदश अध्याय ॥ १३ ॥ शोकाकुल महासेनको मुनिपुत्रका उपदेश महासेनके शिलासे बाहर निकलते समय मुनिपुत्रने उसके लिंग शरीरको पुनः मूर्च्छित कर दिया और उस संस्कारमात्र शरीरको लेकर बाहर आ उसके स्थूल शरीरमें डाल दिया। इस प्रकार पूर्व शरीरके साथ संयुक्त होनेपर उसने उसे सचेत कर दिया ॥ १-२ ॥ महासेनने चेत होनेपर बाह्य जगत्को देखा तो पृथ्वी, मनुष्य, वृक्ष, स्रोत और सरोवर आदि सभीको नये ही रूपमें देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने मुनिपुत्रसे पूछा, "महाभाग ! आपने मुझे यह कौनसा लोक दिखा दिया ? ॥ ३-४ ॥ मेरे पहले देखे हुए प्रदेशसे तो यह भिन्न ही है। देखो जी ! यह तो बड़ी ही विचित्र बात है।" इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने महासेनसे कहा—॥ ५ ॥ “राजन् ! सुनो, यह वही देश है जिसमें हम पहले रहते थे। बहुत समय हो जानेके कारण वही अब बदल गया है ॥ ६ ॥
१७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकगतानां नो दिनमेकं यदत्यगात् । तावतैवाऽत्र कालेन द्वादशार्वुदवत्सराः ॥ ७ ॥ अतिक्रान्ता अतो लोकस्त्वयं रूपान्तरं गतः । भिन्नां व्यवहृतिं पश्य भाषां चापि समन्ततः ॥ ८ ॥ एवमेव जनानां तु कालेन भिद्यते स्थितिः । एवं मया तु बहुधा दृष्टा भिन्ना जगत्स्थितिः ॥ ९ ॥ पश्यैषमेष भगवान् समाहितमतिः पिता । सोऽयं देशो यत्र पूर्वं त्वया मे संस्तुतः पिता ॥ १० ॥ एनं पश्य महाशैलं यत्र मे लोक ईक्षितः । त्वद्भ्रातृवंशपुरुषा अतिक्रान्ताः सहस्रशः ॥ ११ ॥ यत्ते परं वङ्गदेशे सुन्दराख्यं स्थितं पुरा । तत्राऽभूत् सम्प्रति वनं व्याप्तं श्वापदमण्डलैः ॥ १२ ॥ त्वद्भ्रातुर्वंशजः सद्यो वीरवाहुरिति श्रुतः । मालवेशो विशालाख्ये क्षिप्रातीरे पुरेऽस्ति हि ॥ १३ ॥
शिलाके संसारमें जानेपर हमें जो एक दिन बीता था, उतने हीमें यहाँ बारह अरब वर्ष बीत गये हैं। इसीसे इस लोकका दूसरा ही रूप हो गया है। देखो, अब यहाँ सब ओर दूसरी ही आचार-पद्धति है और दूसरी ही भाषा है ॥ ७-८ ॥ कालक्रमसे इसी प्रकार लोगोंकी स्थितिमें परिवर्तन होता रहता है। मैंने तो अनेकों बार जगत्की ऐसी विभिन्न स्थितियाँ देखी हैं ॥ ९ ॥ देखो, मेरे सामर्थ्यवान् पिताजी उसी प्रकार समाधिमें स्थित हैं। यह वही देश है जहाँ पहले तुमने मेरे पिताजीकी स्तुति की थी ॥ १० ॥ इस विशाल शिलाको भी देखो, जिसमें तुमने मेरी सृष्टि देखी है। तुम्हारे भाईकी वंश-परम्परामें तो अब हजारों पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं ॥११॥ तुम्हारे वङ्गदेशमें जो पहले सुन्दरपुर नामका श्रेष्ठ नगर था वहाँ तो अब हिंस्र जीवोंसे भरा हुआ विशाल वन हो गया है ॥ १२ ॥ तुम्हारे भाईके वंशमें उत्पन्न हुआ इस समय वीरबाहु नामसे विख्यात मालव-देशका राजा है, जो क्षिप्रा नदीके तट पर विशाल नामके नगरमें रहता है ॥ १३ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः। १७७ तद्वंश्योऽपि सुशर्माख्यो द्राविडेष्वभवन्नृपः। वर्द्धने नाम नगरे ताम्रपर्णीसरित्तटे ॥ १४ ॥ लोकस्थितिरियं चेत्थं सर्वदा परिवर्त्तते। अल्पकालेनैवमेतद्भवन्नूतनं जगत् ॥ १५ ॥ इतोऽपि चिरकालेन नगा नद्यो ह्रदा भुवः। अन्यथाभावमायान्ति एवमेव जगद्-गतिः ॥ १६ ॥ गिरयो निम्नतां यान्ति निम्नदेशा महोच्चताम्। मरुदेशास्त्वनूपाः स्युः पर्वता वालुकामयाः ॥ १७ ॥ कठिना भूः शिलाप्राया भवेदत्यन्तकोमला। कोमला भूरपि भवेत् पाषाणसदृशी क्वचित् ॥ १८ ॥ ऊपरा भूरुर्वरा स्यादुर्व्वरोषररूपिणी। रत्नानि शर्कराः स्युर्वै रत्नात्मानस्तु शर्कराः ॥ १९ ॥ क्षारं जलं स्वादुरसं मधुरं क्षारतां गतम्। कदाचिन्नरबाहुल्यं कदाचित् पशुसञ्चयम् ॥ २० ॥ उसीके वंशमें द्रविड देशमें ताम्रपर्णी नदीके तीरपर वर्द्धन नामकी नगरीमें सुशर्मा नामका भी एक राजा हुआ है ॥ १४ ॥ यह लोकस्थिति सर्वदा इसी प्रकार बदलती रहती है। इस तरह थोड़े ही समयमें यह जगत् नया बन जाता है ॥ १५ ॥ आगे भी अधिक समय बीतनेपर ये पर्वत, नदियाँ, सरोवर और भूमियाँ दूसरे ही प्रकार की हो जायँगी। संसारका स्वरूप ऐसा ही है ॥ १६ ॥ पर्वत गड्ढे हो जाते हैं और निम्न देश बहुत ऊँचे उठ जाते हैं। मरुस्थल सजल देश हो जाते हैं और पहाड़ियाँ रेगिस्तान बन जाती हैं ॥ १७ ॥ जिनमें पत्थरोंकी अधिकता होती है वे कठोर भूमियाँ अत्यन्त कोमल हो जाती हैं और कहीं-कहीं कोमल भूमियाँ भी पत्थरके समान हो जाती हैं ॥ १८ ॥ ऊसर भूमि उपजाऊ और उपजाऊ भूमि ऊसर बन जाती हैं। इसी प्रकार रत्न रोड़े बन जाते हैं और रोड़े रत्नरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ १९ ॥ मीठा जल खारी हो जाता है और खारी जल मीठा। कहीं जहाँ
१७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कदाचित् कृमिकीटादिप्रचुरं जगदीक्षितम् । एवमेतज्जगत् कालभेदात् परिणतं पृथक् ॥ २१ ॥ तस्मादयं पुराऽस्माकं लोक एवेदृशः स्थितः । इत्याकर्ण्य मुनिसुत-वाक्यं स च महीपतिः ॥ २२ ॥ महासेनोऽत्यन्तशोकाविष्टो मूर्च्छामुपागतः । मुनिपुत्रसमाश्वस्तः प्रज्ञामासाद्य भूपतिः ॥ २३ ॥ अत्यन्तशोकसंविष्टो विललाप सुदीनवत् । भ्रातरं भ्रातृपुत्रांश्च दारान् स्वात्मन एव च ॥ २४ ॥ पुत्रादींश्च पृथक् स्मृत्वा विललापाऽतिदुःखितः । अथ तं मोहतो भ्रातृमुखान् शोचन्तमञ्जसा ॥ २५ ॥ मुनिपुत्रो वचः प्राह बुवोधयिषया नृपम् । राजंस्त्वं बुद्धिमान्नूनं तत्किमर्थं हि शोचसि ॥ २६ ॥ बुद्धिमन्तो हि विफलं जातु कुर्वन्ति कर्म नो । अविमृश्य फलं यस्तु कर्म कुर्यात् स बालिशः ॥ २७ ॥ मनुष्योंकी अधिकता होती है वहीं पशुओंके झुण्ड दीख पड़ते हैं ॥ २० ॥ कोई समय ऐसा भी था जब इस जगत्में कृमि-कीटादिकी ही बहुलता देखी जाती थी। इस प्रकार कालभेदसे यह जगत् अलग-अलग रूपोंमें बदलता रहता है ॥ २१ ॥ इसलिये हमारा यह पूर्वकालिक प्रदेश ही इस समय ऐसा हो गया है।" मुनिपुत्रकी यह बात सुनकर राजा महासेन शोकाकुल होकर मूर्च्छित हो गया ॥ २२-२३ पू० ॥ तब मुनिपुत्रके शान्त करनेपर उसे चेत हुआ और वह शोकातुर हो अत्यन्त दीनकी तरह विलाप करने लगा ॥ २३ उ०-२४ पू० ॥ वह अपने भाई, भतीजों तथा स्त्री-पुत्र आदिको अलग-अलग याद करके अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगा ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥ इस प्रकार उसे मोहवश स्वभावसे ही अपने भाई आदिके लिये शोक करते देख उसे समझानेके लिये मुनिकुमारने ये वचन कहे—॥ २५ उ०-२६ पू० ॥ "राजन् ! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर शोक क्यों करते हो ?
त्रयोदशोऽध्यायः। १७६ तत्त्वं शोचसि कं ब्रूहि किमर्थं वा हि शोचनम् । इत्युक्तः प्राह तं भूपो महासेनोऽतिदुःखितः ॥ २८ ॥ किं न पश्यसि शोकस्य स्थानं मम महामुने ! । सर्वं यस्य हृतं तस्य कारणं पृच्छसीह किम् ॥ २९ ॥ एकस्मिन्नपि शोकः स्यादृते लोकस्य सर्वथा । कुतस्त्वं पृच्छसि पुनः सर्वनाशे ह्युपस्थिते ॥ ३० ॥ इत्युक्तो मुनिपुत्रोऽपि भूयः प्राह हसन्निव । राजन् ब्रूहि किमेतत्ते कुलधर्मः सनातनः ॥ ३१ ॥ यच्छोचनमकृत्वा तु प्रत्यवायो महान् भवेत् । अथवा शोचिते नष्टं प्राप्यते भूय एव तत् ॥ ३२ ॥ राजन् विमृश धैर्येण शोचिते किं फलं भवेत् । नष्टेषु बन्धुषु यदि शोचितव्यं तदा शृणु ॥ ३३ ॥ बुद्धिमान् लोग तो कभी कोई व्यर्थ कर्म नहीं किया करते। जो व्यक्ति फलका विचार न करके कर्म कर बैठता है वही मूर्ख है ॥२६ उ०-२७॥ अच्छा, तुम यह तो बताओ कि किसके लिये शोक करते हो और किस निमित्तसे तुम्हें शोक है?” ऐसा पूछे जानेपर महासेनने अत्यन्त दुःखी होकर उससे कहा-॥ २८ ॥ “मुनिराज ! क्या आपको मेरे शोकका स्थान दिखायी नहीं देता ? भला, जिसका सभी कुछ चला गया उससे आप शोकका कारण क्यों पूछते हैं ? ॥ २९ ॥ जिसका एक सम्बन्धी मर जाता है उसे भी सब प्रकार शोक होता ही है, फिर मेरा सर्वनाश हो जानेपर भी आप यह प्रश्न कैसे कर रहे हैं ?” ॥ ३० ॥ ऐसा कहे जानेपर मुनिपुत्रने कुछ हँसते हुए-से कहा, “राजन् ! बताओ तो, क्या यह तुम्हारा परम्परागत कुलधर्म है, जिससे कि शोक न करने पर कोई बड़ा भारी अनर्थ हो जायगा ? अथवा शोक करनेसे तुम्हें गयी हुई वस्तुएँ पुनः मिल जायेंगी ॥ ३१-३२ ॥ राजन् ! तुम धैर्यधारण करके विचार करो कि शोक करनेसे क्या फल मिलेगा। यदि नष्ट हुए सम्बन्धियोंके लिये शोक करना
१८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतीता बन्धवो नष्टाः पितामहमुखाः खलु । तत् सर्वदा शोचितव्यं कुतः सर्वं न शोचितम् ॥ ३४ ॥ अथ ते बन्धवः कस्य बन्धुत्वं वा कुतस्तव । मातापित्रोः स्वस्य वाऽपि पुरीषक्रमयो हि ये ॥ ३५ ॥ असङ्ख्याताः स्वदेहोत्था देहसम्बन्धिनोऽपि च । न ते स्युर्बन्धवः कस्मात् कुतो वा ते न शोचिताः ॥ ३६ ॥ राजन् विमृश कस्त्वं वै कान् विनष्टान् प्रशोचसि । देहस्त्वं देहभिन्नो वा देहः सङ्घातरूपकः ॥ ३७ ॥ सङ्घातस्यैकदेशस्य वा नाशानाश उच्यते । प्रतिक्षणं त्वेकदेशनाशो देहस्य भावितः ॥ ३८ ॥ मूत्रोच्चारश्लेष्मनखकेशादेः सन्ततं च यः । सर्वात्मना तु सङ्घातनाशो न हि विभाव्यते ॥ ३९ ॥ आवश्यक हो, तो सुनो । तुम्हारे दादा आदि और भी अनेकों भूतकालीन सम्बन्धी मर ही चुके हैं; तब तुम्हें सर्वदा शोक ही करते रहना चाहिये था । तुमने उन सबके लिये शोक क्यों नहीं किया ? ॥ ३३-३४ ॥ अच्छा, तुम्हारे वे सम्बन्धी भी वास्तवमें किसके थे और तुम्हारे साथ भी उनका कैसे सम्बन्ध हुआ ? देखो, माता-पिता अथवा अपने भी विष्ठामें जो अगणित कीड़े होते हैं वे अपने देहसे ही होते हैं और देहके सम्बन्धी भी हैं ही, फिर वे तुम्हारे स्वजन क्यों न हुए और उनके लिये तुम शोक क्यों नहीं करते ? ॥ ३५-३६ ॥ राजन् ! तुम सोचो कि वास्तवमें तुम कौन हो और किन मरे हुओं- के लिये तुम शोक कर रहे हो ? तुम देह हो या देहसे भिन्न ? देह तो अनेक तत्त्वोंका संघात ( समूह ) है ॥ ३७ ॥ उस सम्पूर्ण संघातके अथवा उसके एक अंशके नाशको ही नाश कहते हैं । और देहके एक-एक अंशका नाश तो प्रत्येक क्षणमें माना जाता है । जैसे मूत्र, मल, कफ, नख और केश आदिका नाश निर- न्तर होता ही रहता है । तथा इस संघातका पूर्णतया नाश कभी माना नहीं जाता ॥ ३८-३९ ॥