त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः। १७३ अथ शृङ्गे हेमगिरेर्मुनिना सह संस्थितः । मुनिप्रदर्शितं सर्वमपश्यत् पृथिवीपतिः ॥ ८७ ॥ देशान्तरावलोकाय मुनिदत्तशुभेक्षणः अपश्यद्वलयात्मानं लोकालोकाख्यपर्वतम् ॥ ८८ ॥ तद्बहिर्ध्वान्तसन्दोहमन्तःसौवर्णमेदिनीम् । समुद्रान् सप्तद्वीपांश्च नदीगिरिसमाकुलान् ॥ ८९ ॥ भुवनान्यपि सर्वाणि चेन्द्राद्यान् विबुधोत्तमान् । दैत्यान् मनुष्यान् रक्षांसि यक्षकिंपुरुषादिकान् ॥ ९० ॥ तत्राऽपश्यत् सत्यलोके वैकुण्ठे राजते नगे । मुनिपुत्रं स्वमात्मानं ब्रह्मविष्णुशिवात्मना ॥ ९१ ॥ विभज्य संस्थितं सर्वलोक-सृष्ट्यादिहेतवे । अथोऽपश्यद् भूविभागे कृत्वा रूपान्तरं तथा ॥ ९२ ॥ प्रशासनपरो भूमेः सार्वभौमत्वमास्थितः । एवं मुनिकुमारस्य दृष्ट्वा योगर्द्धिमुत्तमाम् ॥ ९३ ॥ लोक स्वर्गलोकके प्रतिबिम्बके समान दिखायी दिया ॥ ८५ उ०-८६ ॥ फिर वह मुनिके साथ ही हिमालयके शिखरपर उतरा। वहाँसे वह मुनिपुत्रके दिखानेसे सब वस्तुएँ देखने लगा ॥ ८७ ॥ विभिन्न देशोंको देखनेके लिये मुनिने उसे सुन्दर दृष्टि दे दी। उससे उसने चारों ओर मण्डलाकार लोकालोक पर्वतको देखा ॥ ८८ ॥ उसके बाहर की ओर घोर अन्धकार था और भीतरकी ओर सुवर्णमयी भूमि थी। इसके सिवा उसने सब समुद्र, नदी और पर्वतोंसे पूर्ण सातों द्वीप, सभी भुवन, इत्यादि प्रधान-प्रधान देवगण, दैत्य, मनुष्य, राक्षस, यक्ष और किन्नर आदि सभी देखे ॥ ८९--९० ॥ वहाँ उसने यह भी देखा कि वह मुनिपुत्र ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीन रूपोंमें अपने ही को विभक्त करके लोकों की रचना आदिके लिये सत्यलोक, वैकुण्ठ और कैलाशमें विराजमान है ॥ ९१-९२ पू० ॥ साथ ही यह भी देखा कि पृथ्वीतलमें एक अन्य रूप धारणकर वही सार्वभौम सम्राट्के पदपर स्थित हो पृथ्वीका शासनकर रहा है ॥ ९२ उ०-९३ पू० ॥