त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विस्मितोऽभून्महासेनस्ततः प्राह मुनेः सुतः । राजन्नेतल्लोकजातं पश्यतः काल अत्यगात् ॥ ९४ ॥ अर्बुदानां द्वादशकमितोऽप्यत्र दिनात्मकः । गच्छावो बाह्यलोकं तं यत्रास्ते जनको मम ॥ ९५ ॥ इत्युक्त्वा भूभृता तेन सह भूयः समागतः । पूर्ववत्तं गण्डशैलान्निर्गत्याभ्याययौ बहिः ॥ ९६ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गण्डशैललोकावलोकने द्वादशोऽध्यायः ॥ मुनिकुमारका ऐसा योगसामर्थ्य देखकर महासेनको बड़ा आश्चर्य हुआ । तब उससे वह मुनिपुत्र बोला ॥ ६३ उ०-६४ पू० ॥ राजन् ! इन लोकोंको देखते हुए हमें बारह अरब वर्ष बीत चुके हैं और यहाँ अभी एक दिन ही हुआ है । अब हम बाहरके लोकमें चलेंगे, जहाँ मेरे पिताजी विराजमान हैं ॥ ६४ उ०-६५ ॥ ऐसा कहकर वह राजाके सहित पुनः लौट आया । पहले ही की भाँति उसने शिलाको पार किया और बाहर आ गया ॥ ६६ ॥ द्वादश अध्याय समाप्त ।