त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकगतानां नो दिनमेकं यदत्यगात् । तावतैवाऽत्र कालेन द्वादशार्वुदवत्सराः ॥ ७ ॥ अतिक्रान्ता अतो लोकस्त्वयं रूपान्तरं गतः । भिन्नां व्यवहृतिं पश्य भाषां चापि समन्ततः ॥ ८ ॥ एवमेव जनानां तु कालेन भिद्यते स्थितिः । एवं मया तु बहुधा दृष्टा भिन्ना जगत्स्थितिः ॥ ९ ॥ पश्यैषमेष भगवान् समाहितमतिः पिता । सोऽयं देशो यत्र पूर्वं त्वया मे संस्तुतः पिता ॥ १० ॥ एनं पश्य महाशैलं यत्र मे लोक ईक्षितः । त्वद्भ्रातृवंशपुरुषा अतिक्रान्ताः सहस्रशः ॥ ११ ॥ यत्ते परं वङ्गदेशे सुन्दराख्यं स्थितं पुरा । तत्राऽभूत् सम्प्रति वनं व्याप्तं श्वापदमण्डलैः ॥ १२ ॥ त्वद्भ्रातुर्वंशजः सद्यो वीरवाहुरिति श्रुतः । मालवेशो विशालाख्ये क्षिप्रातीरे पुरेऽस्ति हि ॥ १३ ॥
शिलाके संसारमें जानेपर हमें जो एक दिन बीता था, उतने हीमें यहाँ बारह अरब वर्ष बीत गये हैं। इसीसे इस लोकका दूसरा ही रूप हो गया है। देखो, अब यहाँ सब ओर दूसरी ही आचार-पद्धति है और दूसरी ही भाषा है ॥ ७-८ ॥ कालक्रमसे इसी प्रकार लोगोंकी स्थितिमें परिवर्तन होता रहता है। मैंने तो अनेकों बार जगत्की ऐसी विभिन्न स्थितियाँ देखी हैं ॥ ९ ॥ देखो, मेरे सामर्थ्यवान् पिताजी उसी प्रकार समाधिमें स्थित हैं। यह वही देश है जहाँ पहले तुमने मेरे पिताजीकी स्तुति की थी ॥ १० ॥ इस विशाल शिलाको भी देखो, जिसमें तुमने मेरी सृष्टि देखी है। तुम्हारे भाईकी वंश-परम्परामें तो अब हजारों पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं ॥११॥ तुम्हारे वङ्गदेशमें जो पहले सुन्दरपुर नामका श्रेष्ठ नगर था वहाँ तो अब हिंस्र जीवोंसे भरा हुआ विशाल वन हो गया है ॥ १२ ॥ तुम्हारे भाईके वंशमें उत्पन्न हुआ इस समय वीरबाहु नामसे विख्यात मालव-देशका राजा है, जो क्षिप्रा नदीके तट पर विशाल नामके नगरमें रहता है ॥ १३ ॥