भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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त्रयोदशोऽध्यायः। १७७ तद्वंश्योऽपि सुशर्माख्यो द्राविडेष्वभवन्नृपः। वर्द्धने नाम नगरे ताम्रपर्णीसरित्तटे ॥ १४ ॥ लोकस्थितिरियं चेत्थं सर्वदा परिवर्त्तते। अल्पकालेनैवमेतद्भवन्नूतनं जगत् ॥ १५ ॥ इतोऽपि चिरकालेन नगा नद्यो ह्रदा भुवः। अन्यथाभावमायान्ति एवमेव जगद्-गतिः ॥ १६ ॥ गिरयो निम्नतां यान्ति निम्नदेशा महोच्चताम्। मरुदेशास्त्वनूपाः स्युः पर्वता वालुकामयाः ॥ १७ ॥ कठिना भूः शिलाप्राया भवेदत्यन्तकोमला। कोमला भूरपि भवेत् पाषाणसदृशी क्वचित् ॥ १८ ॥ ऊपरा भूरुर्वरा स्यादुर्व्वरोषररूपिणी। रत्नानि शर्कराः स्युर्वै रत्नात्मानस्तु शर्कराः ॥ १९ ॥ क्षारं जलं स्वादुरसं मधुरं क्षारतां गतम्। कदाचिन्नरबाहुल्यं कदाचित् पशुसञ्चयम् ॥ २० ॥ उसीके वंशमें द्रविड देशमें ताम्रपर्णी नदीके तीरपर वर्द्धन नामकी नगरीमें सुशर्मा नामका भी एक राजा हुआ है ॥ १४ ॥ यह लोकस्थिति सर्वदा इसी प्रकार बदलती रहती है। इस तरह थोड़े ही समयमें यह जगत् नया बन जाता है ॥ १५ ॥ आगे भी अधिक समय बीतनेपर ये पर्वत, नदियाँ, सरोवर और भूमियाँ दूसरे ही प्रकार की हो जायँगी। संसारका स्वरूप ऐसा ही है ॥ १६ ॥ पर्वत गड्ढे हो जाते हैं और निम्न देश बहुत ऊँचे उठ जाते हैं। मरुस्थल सजल देश हो जाते हैं और पहाड़ियाँ रेगिस्तान बन जाती हैं ॥ १७ ॥ जिनमें पत्थरोंकी अधिकता होती है वे कठोर भूमियाँ अत्यन्त कोमल हो जाती हैं और कहीं-कहीं कोमल भूमियाँ भी पत्थरके समान हो जाती हैं ॥ १८ ॥ ऊसर भूमि उपजाऊ और उपजाऊ भूमि ऊसर बन जाती हैं। इसी प्रकार रत्न रोड़े बन जाते हैं और रोड़े रत्नरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ १९ ॥ मीठा जल खारी हो जाता है और खारी जल मीठा। कहीं जहाँ