त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः। १७६ तत्त्वं शोचसि कं ब्रूहि किमर्थं वा हि शोचनम् । इत्युक्तः प्राह तं भूपो महासेनोऽतिदुःखितः ॥ २८ ॥ किं न पश्यसि शोकस्य स्थानं मम महामुने ! । सर्वं यस्य हृतं तस्य कारणं पृच्छसीह किम् ॥ २९ ॥ एकस्मिन्नपि शोकः स्यादृते लोकस्य सर्वथा । कुतस्त्वं पृच्छसि पुनः सर्वनाशे ह्युपस्थिते ॥ ३० ॥ इत्युक्तो मुनिपुत्रोऽपि भूयः प्राह हसन्निव । राजन् ब्रूहि किमेतत्ते कुलधर्मः सनातनः ॥ ३१ ॥ यच्छोचनमकृत्वा तु प्रत्यवायो महान् भवेत् । अथवा शोचिते नष्टं प्राप्यते भूय एव तत् ॥ ३२ ॥ राजन् विमृश धैर्येण शोचिते किं फलं भवेत् । नष्टेषु बन्धुषु यदि शोचितव्यं तदा शृणु ॥ ३३ ॥ बुद्धिमान् लोग तो कभी कोई व्यर्थ कर्म नहीं किया करते। जो व्यक्ति फलका विचार न करके कर्म कर बैठता है वही मूर्ख है ॥२६ उ०-२७॥ अच्छा, तुम यह तो बताओ कि किसके लिये शोक करते हो और किस निमित्तसे तुम्हें शोक है?” ऐसा पूछे जानेपर महासेनने अत्यन्त दुःखी होकर उससे कहा-॥ २८ ॥ “मुनिराज ! क्या आपको मेरे शोकका स्थान दिखायी नहीं देता ? भला, जिसका सभी कुछ चला गया उससे आप शोकका कारण क्यों पूछते हैं ? ॥ २९ ॥ जिसका एक सम्बन्धी मर जाता है उसे भी सब प्रकार शोक होता ही है, फिर मेरा सर्वनाश हो जानेपर भी आप यह प्रश्न कैसे कर रहे हैं ?” ॥ ३० ॥ ऐसा कहे जानेपर मुनिपुत्रने कुछ हँसते हुए-से कहा, “राजन् ! बताओ तो, क्या यह तुम्हारा परम्परागत कुलधर्म है, जिससे कि शोक न करने पर कोई बड़ा भारी अनर्थ हो जायगा ? अथवा शोक करनेसे तुम्हें गयी हुई वस्तुएँ पुनः मिल जायेंगी ॥ ३१-३२ ॥ राजन् ! तुम धैर्यधारण करके विचार करो कि शोक करनेसे क्या फल मिलेगा। यदि नष्ट हुए सम्बन्धियोंके लिये शोक करना