भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

१८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतीता बन्धवो नष्टाः पितामहमुखाः खलु । तत् सर्वदा शोचितव्यं कुतः सर्वं न शोचितम् ॥ ३४ ॥ अथ ते बन्धवः कस्य बन्धुत्वं वा कुतस्तव । मातापित्रोः स्वस्य वाऽपि पुरीषक्रमयो हि ये ॥ ३५ ॥ असङ्ख्याताः स्वदेहोत्था देहसम्बन्धिनोऽपि च । न ते स्युर्बन्धवः कस्मात् कुतो वा ते न शोचिताः ॥ ३६ ॥ राजन् विमृश कस्त्वं वै कान् विनष्टान् प्रशोचसि । देहस्त्वं देहभिन्नो वा देहः सङ्घातरूपकः ॥ ३७ ॥ सङ्घातस्यैकदेशस्य वा नाशानाश उच्यते । प्रतिक्षणं त्वेकदेशनाशो देहस्य भावितः ॥ ३८ ॥ मूत्रोच्चारश्लेष्मनखकेशादेः सन्ततं च यः । सर्वात्मना तु सङ्घातनाशो न हि विभाव्यते ॥ ३९ ॥ आवश्यक हो, तो सुनो । तुम्हारे दादा आदि और भी अनेकों भूतकालीन सम्बन्धी मर ही चुके हैं; तब तुम्हें सर्वदा शोक ही करते रहना चाहिये था । तुमने उन सबके लिये शोक क्यों नहीं किया ? ॥ ३३-३४ ॥ अच्छा, तुम्हारे वे सम्बन्धी भी वास्तवमें किसके थे और तुम्हारे साथ भी उनका कैसे सम्बन्ध हुआ ? देखो, माता-पिता अथवा अपने भी विष्ठामें जो अगणित कीड़े होते हैं वे अपने देहसे ही होते हैं और देहके सम्बन्धी भी हैं ही, फिर वे तुम्हारे स्वजन क्यों न हुए और उनके लिये तुम शोक क्यों नहीं करते ? ॥ ३५-३६ ॥ राजन् ! तुम सोचो कि वास्तवमें तुम कौन हो और किन मरे हुओं- के लिये तुम शोक कर रहे हो ? तुम देह हो या देहसे भिन्न ? देह तो अनेक तत्त्वोंका संघात ( समूह ) है ॥ ३७ ॥ उस सम्पूर्ण संघातके अथवा उसके एक अंशके नाशको ही नाश कहते हैं । और देहके एक-एक अंशका नाश तो प्रत्येक क्षणमें माना जाता है । जैसे मूत्र, मल, कफ, नख और केश आदिका नाश निर- न्तर होता ही रहता है । तथा इस संघातका पूर्णतया नाश कभी माना नहीं जाता ॥ ३८-३९ ॥