त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः एवं दत्तात्रेयमुखाज्जगतत्त्वं निशम्य तु। पप्रच्छ भार्गवो भूयः सन्देहकलिलान्तरः ॥ १ ॥ भगवन् संश्रुतं प्रोक्तं भवता जागतं ननु। यथा ब्रवीषि भगवंस्तत्तथैव न चान्यथा ॥ २ ॥ तथापि कुत एतद्धि भाति सत्यात्मकं सदा। कुतो वाऽन्यैर्बुद्धिमद्भिः सत्यत्वेन विनिश्चितम् ॥ ३ ॥ त्वत्तः श्रुतं चापि भूयो भाति मे सत्यवत् कुतः। ब्रूहेतत् कृपया नाथ यथा नश्येदयं भ्रमः ॥ ४ ॥ इत्यापृष्टो भार्गवेण दत्तात्रेयो महाशयः। जगत्सत्यभ्रान्तिमूलं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥ द्वादश अध्याय ॥ १२ ॥ शिलालोकका दर्शन इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे जगत्का तत्त्व श्रवण कर परशुरामजीका चित्त सन्देहसे भर गया और उन्होंने पूछा ॥ १ ॥ भगवन् ! मैंने आपका कहा जगत्सम्बन्धी विचार सुना । आप जैसा कहते हैं वह बात निश्चय वैसी ही है, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ २ ॥ तो भी यह संसार सर्वदा सत्यरूप क्यों भासता है तथा अन्य कई बुद्धिमानों ने इसे सत्य ही क्यों निश्चय किया है ? ॥ ३ ॥ आप गुरुदेवके मुखसे मैंने असत्य सुना, फिर भी मुझे यह सत्य-सा क्यों प्रतीत हो रहा है ? नाथ ! कृपा करके इसका कारण बताइये, जिससे मेरा यह भ्रम नष्ट हो जाय ॥ ४ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महामना दत्तात्रेयजीने जगत्में सत्यता की भ्रान्तिके मूलका वर्णन करना आरम्भ किया ॥ ५ ॥