भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 404 में से

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एकादशोऽध्यायः । १५६ तथैवास्य स्वभावोऽपि विचारे न स्थिरीभवेत् । अत आश्रयरूपेण विना नास्ति हि किञ्चन ॥ ८४ ॥ यदस्तीति भाति तत्तु चितिरेव महेश्वरी । एवं जगच्चिदेकात्मरूपं ते सम्यगीरितम् ॥ ८५ ॥ इति श्री० ज्ञानखण्डे जगत्तत्त्वनिरूपणे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ प्रकार विचार करने पर इस संसारका स्वभाव भी स्थिर नहीं जान पड़ता । अतः अपने आश्रय चेतनके सिवा यह और कुछ नहीं है ॥ ८३ उ०-८४ ॥ जो 'है' इस रूपसे भास रहा है वह तो केवल महेश्वरी चिति ही है। इस प्रकार जगत् और चेतनकी एकरूपताका यथावत् विवेचन हुआ ॥ ८५ ॥ एकादश अध्याय समाप्त ।

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