त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आदर्शो ह्यचलस्तत्र चलं हि प्रतिबिम्बकम्। तथा जगच्चलं संविदचलं सर्वभावितम् ॥ ७८ ॥ अत एव हि भावानां विचारासहरूपता। तथा हि सूर्यालोको हि वस्तूनामवभासकः ॥ ७९ ॥ उलूकादिदिवान्धानां विपरीतोऽन्धकारवत्। प्रकाशत्वान्धकारत्वे न विविक्तेऽनयोः स्फुटे ॥ ८० ॥ एवं विषं कस्यचित्स्यादविषं कस्यचिद्भवेत्। मनुष्यादेः प्रतीघातकरी भित्तिर्हि लक्ष्यते ॥ ८१ ॥ योगिनां गुह्यकादीनामप्रतीघातलक्षणा । कालो देशश्च दीर्घो यो मनुष्यादिप्रभावितः ॥ ८२ ॥ स एव विपरीतो वै देवानां योगिनामपि। दर्पणे भासमानस्य दूराद्देर्दूरता यथा ॥ ८३ ॥
इनमें दर्पण स्थिर होता है और प्रतिबिम्ब चंचल। इसी प्रकार जगत् चलायमान है और चेतन अचल है—यह बात सभी जानते हैं॥ ७८ ॥ इसीसे संसारके पदार्थ विचारके आगे ठहरनेवाले नहीं हैं। जैसे सूर्य सभी पदार्थोंको प्रकाशित करने वाला है, किन्तु जो दिनमें अन्धे रहते हैं उन उल्लू आदिके लिये वह अन्धकारके समान विपरीत स्वभाववाला जान पड़ता है। इससे प्रकाशत्व और अन्धकारत्वका स्पष्ट निर्णय नहीं हो सकता ॥ ७९-८० ॥ इसी प्रकार जो एकके लिये विष होता है वही दूसरेके लिये विष नहीं रहता। भीत मनुष्यादिके लिये तो रुकावट करनेवाली होती है, किन्तु योगी और गुह्यकादिके लिये रुकावट करनेवाली नहीं रहती ॥ ८१-८२ पू० ॥ जो देश और काल मनुष्यादिको बहुत लंबा जान पड़ता है, वही देवता और योगियोंको वैसा प्रतीत नहीं होता ॥ ८२ उ०-८३ पू० ॥ जैसे दर्पणमें भासनेवाली दूरी आदि में दूरता नहीं होती, उसी