भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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एकादशोऽध्यायः। १५७ साधारणं स्थिरं स्वार्थक्रियार्हं भूय एव तु । स्वात्मन्युपसंहरेच्च जगदेवं विभासते ॥ ७२ ॥ योगिनः पश्य सृष्टिं तां पूर्णस्थैर्यसमावृताम् । योगिनस्तु मितत्वेन सृष्टिर्बाह्या विभाविता ॥ ७३ ॥ अमितत्वात्सृष्टिरियं चिन्नाथस्यान्तरेव हि । अत एव चिदात्मत्वव्यतिरेकादसत्यता ॥ ७४ ॥ जगतः प्रतिबिम्बस्यादर्शात्मत्वं विना यथा । अत एव विचारेणासत्यतां याति नान्यथा ॥ ७५ ॥ सत्यं स्वभावं नो मुञ्चेदसत्यं तं परित्यजेत् । जगत्पश्य भार्गवैतत् स्वभावादतिचञ्चलम् ॥ ७६ ॥ सत्यासत्ये विभागेन भासेते सर्वतोऽखिलम् । प्रतिबिम्बादर्शभानमिव तत्प्रविचारय ॥ ७७ ॥ वह सबको दिखायी देता है, स्थिर जान पड़ता है, तथा सच्ची वस्तुओंके समान उससे व्यवहार भी हो सकता है । फिर अपने में ही उसे लीन भी कर लेता है । इसी प्रकार यह संसार भी भास रहा है ॥ ७२ ॥ योगियोंकी मनःकल्पित सृष्टिको देखो । वह तो पूर्ण स्थिरतासे युक्त होती है । किन्तु योगियोंका स्वरूप सीमित होता है, इसलिये उनकी सृष्टि उनसे बाहर भासती है ॥ ७३ ॥ परन्तु चिन्मात्र परमेश्वरका स्वरूप तो असीम है, इसलिये उनकी यह सृष्टि उनके भीतर ही है । अतः प्रतिबिम्ब जैसे दर्पणस्वरूप ही होता है वैसे ही चिदात्मासे भिन्न इस जगत्की कोई सत्ता नहीं है । इस प्रकार केवल विचारसे ही इसकी असत्यता सिद्ध होती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ७४-७५ ॥ परशुरामजी ! सत्य कभी अपने स्वभावको नहीं छोड़ता और असत्य उसे त्याग देता है । देखो, यह जगत् तो स्वभावसे बहुत ही चंचल है ॥ ७६ ॥ सब प्रकारके सत्य और असत्य दर्पण और प्रतिबिम्बके [ स्थिर और चंचल ] भानोंकी तरह अलग-अलग प्रतीत होते हैं । तुम उनका विचार करो ॥ ७७ ॥