भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 404 में से

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१५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सङ्कल्प एव स्वातन्त्र्यं चितेरुच्छूनमीर्यते । असङ्कल्पदशायां सा चितिः स्वच्छैकरूपिणी ॥ ६६ ॥ एवं चितेर्विशुद्धैकरूपायाः सृष्टिः पुरा । बृहत्स्वातन्त्र्यमभवत्सङ्कल्पात्मकमेव तत् ॥ ६७ ॥ तत एतत्समाभातं प्रतिबिम्बात्मकं जगत् । बृहत्सङ्कल्पसुस्थैर्याच्चिरमेतद्विभासते ॥ ६८ ॥ साधारणं जगद्भाति पूर्णस्वातन्त्र्यहेतुतः । अन्येषां तदपूर्णत्वाद्भात्यसाधारणात्मना ॥ ६९ ॥ अभ्यासान्मणिमन्त्राद्यैः स्वातन्त्र्यं तु यथा यथा । त्यजेत्सङ्कोचमात्मस्थं तथा तत्र हि भासनम् ॥ ७० ॥ पश्यैन्द्रजालिकं राम निरुपादानयोगतः । भासयन्तं जगच्चित्रं सङ्कल्पादेव सर्वतः ॥ ७१ ॥ संकल्परूप स्वातन्त्र्य ही उस चितिका स्थूल रूप कहा जाता है। जब संकल्प नहीं होता उस अवस्था में तो वह शुद्ध चिन्मात्ररूपिणी ही है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार सृष्टिसे पूर्व एकमात्र शुद्धस्वरूपिणी चितिमें जो परम स्वातन्त्र्य था वही सृष्टिके आरम्भमें संकल्परूप हो गया ॥ ६७ ॥ उसीसे यह प्रतिबिम्बरूप जगत् भासने लगा । वह महान् संकल्प बहुत स्थिर है, इसीसे यह चिरकालतक भासता रहता है ॥ ६८ ॥ चितिके पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण यह जगत् सबको समानरूपसे प्रतीत होता है । अन्य जीवोंका स्वातन्त्र्य तो पूर्ण नहीं है, इसलिये उनके संकल्पसे भासनेवाली वस्तुएँ असाधारणरूपसे केवल उन्हें ही प्रतीत होती हैं ॥ ६९ ॥ अभ्यास, मणि अथवा मन्त्र आदिके प्रभावसे जैसे-जैसे उनकी- स्वतन्त्रता बढती जाती है वैसे-वैसे ही उनके अन्तःकरणमें भासनेवाले पदार्थोंकी प्रतीतिमें भी संकोचकी कमी होने लगती है ॥ ७० ॥ परशुराम ! देखो, एक ऐन्द्रजालिक (मायावी) कोई सामग्री न रखते हुए भी केवल अपने संकल्पसे नया संसारचित्र दिखा देता है ॥ ७१ ॥

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