त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः। १५३ अस्तिता हि पदार्थानां प्रकाशो नापरः खलु। प्रकाशस्तु चितिः प्रोक्ता नाऽचितः स्यात्प्रकाशता॥ ४९॥ प्रकाशस्तु सुमुख्यः स्याद्यः स्वतन्त्रः प्रकाशते। जडा न स्वप्रकाशा हि चितियोगप्रकाशनात्॥ ५०॥ अन्यानपेक्षेणैव चितिः स्वस्मिन्प्रकाशते। जडाश्चितिं समाश्रित्य प्रकाशन्ते न चान्यथा॥ ५१॥ अप्रकाशेऽपि वस्तूनामस्तिता चेत्तदा शृणु। अस्ति नास्तीति लोकेऽस्मिन् व्यवस्था न हि सेत्स्यति ॥५२॥ तस्माद्वस्त्वस्तिता लोके चित्प्रकाशो न चापरः। यथा हि प्रतिबिम्बानां सत्त्वं दर्पण एव हि॥ ५३॥ तथा चितिर्जगत्सत्ता ततः सर्वं चितिर्भवेत्। अधिकं भासते यत्तु तन्नैर्मल्यमहत्त्वतः॥ ५४॥ पदार्थोंकी सत्ता तो उनका प्रकाशित होना ही है, और कुछ नहीं। और 'प्रकाश' चिति को ही कहा जाता है, क्योंकि अचित् (जडवर्ग) प्रकाशरूप नहीं हो सकता ४६॥ प्रकाश भी वही मुख्य है जो [किसी अन्यकी सहायताके बिना] स्वयं ही प्रकाशित हो। [अग्नि-सूर्य आदि] जडपदार्थ स्वयं प्रका- शित होनेवाले नहीं हैं, क्योंकि वे चेतनके द्वारा ही प्रकाशित होते हैं॥ ५०॥ केवल चिति ही किसी अन्यकी अपेक्षाके बिना स्वयं प्रकाशित होती है। जड पदार्थ तो चितिके अधीन ही प्रकाशित होते हैं, अन्य किसी प्रकार नहीं॥ ५१॥ यदि कहो कि प्रकाशित न होनेपर भी जड वस्तुओंकी सत्ता तो रह ही सकती है, तो सुनो—ऐसी अवस्थायें लोकमें 'है' और 'नहीं है' इसकी कोई व्यवस्था नहीं हो सकेगी॥ ५२॥ अतः लोकमें 'वस्तु की सत्ता' का अर्थ है चैतन्यका उस रूपमें प्रकाश, और कुछ नहीं। जिस प्रकार प्रतिबिम्बोंकी सत्ता दर्पण ही है उसी प्रकार चिति ही जगत् की सत्ता है। अतः सब कुछ चिति ही है। वह जो घट-पटादि विशिष्टरूपोंमें भासती है यह उसकी निर्म- लताकी महिमा है॥ ५३-५४॥