भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

१५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनेकभेदभिन्नापि मनसोऽन्या न हि क्वचित् । उत्पन्ना मनसस्तत्र स्थिता तत्रैव लीयते ॥ ४३ ॥ सा केवलमनोरूपा यथा तद्वज्जगच्छिवात् । स शिवश्चितिमात्रैकरूपश्चितिरविग्रहा ॥ ४४ ॥ त्रिपुरानन्तशक्त्यैकरूपिणी सर्वसाक्षिणी । सा चितिः सर्वतः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ ४५ ॥ कालो देशश्च लोकेऽस्मिन्परिच्छेदकरः स्मृतः । तत्राकारमयो देशः कालस्तु स्यात्क्रियामयः ॥ ४६ ॥ यां चितिं समुपाश्रित्य स्यादाकारः क्रियापि वा । तस्याः परिच्छेदकत्वमनयोः स्यात्कथं वद ॥ ४७ ॥ कस्मिन्देशे च काले च चितिर्नास्तीह तद् वद । यत्र न स्याच्चितिः सोऽपि कथं स्यादिति वै भवेत् ॥ ४८ ॥ इस प्रकार अनेको भेदोंसे विभिन्न-सी भासती हुई भी वह मनके सिवा और कुछ नहीं होती । वह मनसे उत्पन्न होती है, उसीमें स्थित रहती है और उसीमें लीन भी हो जाती है ॥ ४३ ॥ जैसे वह केवल मनःस्वरूपा ही होती है, उसी प्रकार शिवसे उत्पन्न हुआ यह जगत् चेतनमात्र है; क्योंकि शिव एकमात्र चिति- स्वरूप ही है और उस चितिका कोई शरीर नहीं है ॥ ४४ ॥ एकमात्र अनन्तशक्ति ही जिसका स्वरूप है वह सर्वसाक्षिणी त्रिपुरा ही चिति है और वह परिच्छेदसे शून्य तथा सब ओर परिपूर्ण है ॥ ४५ ॥ इस लोकमें काल और देश ही परिच्छेद करनेवाले माने गये हैं । इनमें देश आकारमय है और काल क्रियामय । फिर ये आकार और क्रिया जिस शुद्ध चितिके आश्रित हैं, बताओ, उसीका ये परिच्छेद करनेवाले कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४६-४७ ॥ बताओ, यहाँ ऐसा कौन देश या काल है जिसमें चिति नहीं है । जहाँ चिति नहीं होगी वहाँ देश या काल भी कैसे रहेगा ।¹ अतः सत्तारूपसे चिति ही सब कुछ है ॥ ४८ ॥ १. 'चिति' ज्ञानमात्र है । ज्ञान ही में सम्पूर्ण दृश्य का भाव होता है । अतः जैसे दर्पणके बिना प्रतिबिम्ब और मृत्तिकाके बिना घट-शरावादि नहीं हो सकते उसी प्रकार चितिके बिना देश-कालादि कोई दृश्य पदार्थ भी नहीं हो सकता ।