भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

१५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे काठिन्यनिर्मलत्वाभ्यां प्रतिबिम्बावभासनम् । तयोस्तु तारतम्येन प्रतिबिम्बः स्फुटोऽस्फुटः ॥ ५५ ॥ दर्पणे च जले चापि स्पष्टमेतद्धि लक्ष्यते । जडत्वाद्दर्पणादेस्तु स्वातन्त्र्यपरिवर्जनात् ॥ ५६ ॥ बिम्बापेक्षा चितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यादनपेक्षता । निर्मलत्वं स्वतःसिद्धं चितेर्मांलिन्यवर्जनात् ॥ ५७ ॥ अनेकरसतैव स्यान्मालिन्यं तच्चितेर्न हि । ऐकात्म्यरूप्यान्चिच्छक्तेरखण्डत्वाच्च सर्वथा ॥ ५८ ॥ अरिक्तात्मभावहेतो नैर्मल्यं सर्वतोऽधिकम् । अस्वतो भासमानस्य भानमन्यानुषङ्गतः ॥ ५९ ॥ प्रतिबिम्बकी प्रतीति [ दर्पणादि आधारकी ] सघनता और निर्म- लताके कारण हुआ करती है। इनकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रतिबिम्ब भी अस्पष्ट या स्पष्ट होता है। यह अन्तर दर्पण और जलमें साफ-साफ देखा जा सकता है। [ दर्पण की अपेक्षा जलमें सघनता और निर्मलता कम होती है, इसलिये उसमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह दर्पणमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बकी अपेक्षा अस्पष्ट होता है ] ॥ ५५-५६ पू० ॥ [ यदि कहो कि दर्पणादिमें तो बिम्बके अनुसार प्रतिबिम्ब पड़ता है, चितिमें बिना बिम्बके ही जगत्-रूप प्रतिबिम्ब कैसे प्रतीत होने लगता है, तो उसका उत्तर देते हैं— ] दर्पणादि तो जड हैं और उनमें स्वतन्त्रता भी नहीं है, इसलिये उन्हें बिम्ब की अपेक्षा होती है। किन्तु चिति स्वच्छ है और स्वतन्त्र है, इसलिये उसे उसकी अपेक्षा नहीं है। चितिमें मलिनता है ही नहीं, इसलिये उसकी स्वच्छता [ किसीकी की हुई नहीं ] स्वतः सिद्ध है ॥ ५६ उ०-५७ ॥ अनेकरसता अर्थात् अनेक पदार्थोंका मेल ही मलिनता है। चिति एकरूप और सर्वथा अखण्ड है, इसलिये उसके साथ किसीका मेल नहीं है। उसमें किसी अन्यके लिये स्थान ही नहीं है, अतः उसकी निर्मलता सबसे अधिक है ॥ ५८-५९ पू० ॥ जिसका स्वयं मान न हो, किसी अन्यके सम्पर्कसे ही जिसकी