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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

१५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे काठिन्यनिर्मलत्वाभ्यां प्रतिबिम्बावभासनम् । तयोस्तु तारतम्येन प्रतिबिम्बः स्फुटोऽस्फुटः ॥ ५५ ॥ दर्पणे च जले चापि स्पष्टमेतद्धि लक्ष्यते । जडत्वाद्दर्पणादेस्तु स्वातन्त्र्यपरिवर्जनात् ॥ ५६ ॥ बिम्बापेक्षा चितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यादनपेक्षता । निर्मलत्वं स्वतःसिद्धं चितेर्मांलिन्यवर्जनात् ॥ ५७ ॥ अनेकरसतैव स्यान्मालिन्यं तच्चितेर्न हि । ऐकात्म्यरूप्यान्चिच्छक्तेरखण्डत्वाच्च सर्वथा ॥ ५८ ॥ अरिक्तात्मभावहेतो नैर्मल्यं सर्वतोऽधिकम् । अस्वतो भासमानस्य भानमन्यानुषङ्गतः ॥ ५९ ॥ प्रतिबिम्बकी प्रतीति [ दर्पणादि आधारकी ] सघनता और निर्म- लताके कारण हुआ करती है। इनकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रतिबिम्ब भी अस्पष्ट या स्पष्ट होता है। यह अन्तर दर्पण और जलमें साफ-साफ देखा जा सकता है। [ दर्पण की अपेक्षा जलमें सघनता और निर्मलता कम होती है, इसलिये उसमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह दर्पणमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बकी अपेक्षा अस्पष्ट होता है ] ॥ ५५-५६ पू० ॥ [ यदि कहो कि दर्पणादिमें तो बिम्बके अनुसार प्रतिबिम्ब पड़ता है, चितिमें बिना बिम्बके ही जगत्-रूप प्रतिबिम्ब कैसे प्रतीत होने लगता है, तो उसका उत्तर देते हैं— ] दर्पणादि तो जड हैं और उनमें स्वतन्त्रता भी नहीं है, इसलिये उन्हें बिम्ब की अपेक्षा होती है। किन्तु चिति स्वच्छ है और स्वतन्त्र है, इसलिये उसे उसकी अपेक्षा नहीं है। चितिमें मलिनता है ही नहीं, इसलिये उसकी स्वच्छता [ किसीकी की हुई नहीं ] स्वतः सिद्ध है ॥ ५६ उ०-५७ ॥ अनेकरसता अर्थात् अनेक पदार्थोंका मेल ही मलिनता है। चिति एकरूप और सर्वथा अखण्ड है, इसलिये उसके साथ किसीका मेल नहीं है। उसमें किसी अन्यके लिये स्थान ही नहीं है, अतः उसकी निर्मलता सबसे अधिक है ॥ ५८-५९ पू० ॥ जिसका स्वयं मान न हो, किसी अन्यके सम्पर्कसे ही जिसकी

एकादशोऽध्यायः। १५५ प्रतिबिम्बस्वरूपज्ञाः प्रतिबिम्बं प्रचक्षते । जगदेतादृशं सर्वं सर्वैः समभिलक्षितम् ॥ ६० ॥ स्वतो न भासते क्वापि भासते च चिदाश्रयात् । अतो जगत्स्यादादर्शप्रतिबिम्बसुसंमितम् ॥ ६१ ॥ चितिर्विचित्राऽन्यभावैरूपरक्तापि भासिनी । स्वरूपादप्रच्युतैवाऽऽदर्शवल्लेशतोऽपि हि ॥ ६२ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बानां दर्पणानन्यता यथा । चिदात्मप्रतिबिम्बानां चिदात्मानन्यता तथा ॥ ६३ ॥ दर्पणे प्रतिबिम्बो हि बिम्बहेतुर्निरूपितः । चितेः स्वातन्त्र्यहेतुः स्यात्प्रतिबिम्बो हि जागतः ॥ ६४ ॥ स्वसङ्कल्पाद्राम पश्य स्वात्मनि प्रतिबिम्बितान् । भावान् बिम्बविनाभूतान्निर्निमित्तावभासनान् ॥ ६५ ॥ प्रतीति हो, उसीको प्रतिबिम्बका स्वरूप जाननेवाले 'प्रतिबिम्ब' कहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् सबको ऐसा ही जान पड़ा है ॥ ५६ उ०-६० ॥ यह स्वयं कभी नहीं भासता, चेतनके आश्रयसे ही भासता है। इसलिये यह जगत् दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान है ॥ ६१ ॥ इसे प्रकाशित करनेवाली चिति बड़ी विचित्र है। वह अन्य भावोंसे उपरञ्जित (रँगी हुई) रहनेपर भी दर्पणके समान अपने स्वरूपसे लेशमात्र भी च्युत नहीं होती ॥ ६२ ॥ दर्पणके प्रतिबिम्बोंका जिस प्रकार दर्पणसे अभेद रहता है उसी प्रकार चिदात्मा में प्रतिबिम्बित पदार्थोंका भी चिदात्मासे अभेद है ॥ ६३ ॥ दर्पणमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है उसका हेतु बिम्ब कहा जाता है, किन्तु यह जगत्-रूप प्रतिबिम्ब चितिकी स्वतन्त्रताके कारण पड़ता है ॥ ६४ ॥ परशुराम ! तुम स्वयं अनुभव करके देखो; तुम्हारे संकल्पसे बिम्ब- के बिना ही तुम्हारे अन्तःकरणमें बिना निमित्तके ही अनेकों भाव प्रतिबिम्बित होते हैं ॥ ६५ ॥

१५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सङ्कल्प एव स्वातन्त्र्यं चितेरुच्छूनमीर्यते । असङ्कल्पदशायां सा चितिः स्वच्छैकरूपिणी ॥ ६६ ॥ एवं चितेर्विशुद्धैकरूपायाः सृष्टिः पुरा । बृहत्स्वातन्त्र्यमभवत्सङ्कल्पात्मकमेव तत् ॥ ६७ ॥ तत एतत्समाभातं प्रतिबिम्बात्मकं जगत् । बृहत्सङ्कल्पसुस्थैर्याच्चिरमेतद्विभासते ॥ ६८ ॥ साधारणं जगद्भाति पूर्णस्वातन्त्र्यहेतुतः । अन्येषां तदपूर्णत्वाद्भात्यसाधारणात्मना ॥ ६९ ॥ अभ्यासान्मणिमन्त्राद्यैः स्वातन्त्र्यं तु यथा यथा । त्यजेत्सङ्कोचमात्मस्थं तथा तत्र हि भासनम् ॥ ७० ॥ पश्यैन्द्रजालिकं राम निरुपादानयोगतः । भासयन्तं जगच्चित्रं सङ्कल्पादेव सर्वतः ॥ ७१ ॥ संकल्परूप स्वातन्त्र्य ही उस चितिका स्थूल रूप कहा जाता है। जब संकल्प नहीं होता उस अवस्था में तो वह शुद्ध चिन्मात्ररूपिणी ही है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार सृष्टिसे पूर्व एकमात्र शुद्धस्वरूपिणी चितिमें जो परम स्वातन्त्र्य था वही सृष्टिके आरम्भमें संकल्परूप हो गया ॥ ६७ ॥ उसीसे यह प्रतिबिम्बरूप जगत् भासने लगा । वह महान् संकल्प बहुत स्थिर है, इसीसे यह चिरकालतक भासता रहता है ॥ ६८ ॥ चितिके पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण यह जगत् सबको समानरूपसे प्रतीत होता है । अन्य जीवोंका स्वातन्त्र्य तो पूर्ण नहीं है, इसलिये उनके संकल्पसे भासनेवाली वस्तुएँ असाधारणरूपसे केवल उन्हें ही प्रतीत होती हैं ॥ ६९ ॥ अभ्यास, मणि अथवा मन्त्र आदिके प्रभावसे जैसे-जैसे उनकी- स्वतन्त्रता बढती जाती है वैसे-वैसे ही उनके अन्तःकरणमें भासनेवाले पदार्थोंकी प्रतीतिमें भी संकोचकी कमी होने लगती है ॥ ७० ॥ परशुराम ! देखो, एक ऐन्द्रजालिक (मायावी) कोई सामग्री न रखते हुए भी केवल अपने संकल्पसे नया संसारचित्र दिखा देता है ॥ ७१ ॥

एकादशोऽध्यायः। १५७ साधारणं स्थिरं स्वार्थक्रियार्हं भूय एव तु । स्वात्मन्युपसंहरेच्च जगदेवं विभासते ॥ ७२ ॥ योगिनः पश्य सृष्टिं तां पूर्णस्थैर्यसमावृताम् । योगिनस्तु मितत्वेन सृष्टिर्बाह्या विभाविता ॥ ७३ ॥ अमितत्वात्सृष्टिरियं चिन्नाथस्यान्तरेव हि । अत एव चिदात्मत्वव्यतिरेकादसत्यता ॥ ७४ ॥ जगतः प्रतिबिम्बस्यादर्शात्मत्वं विना यथा । अत एव विचारेणासत्यतां याति नान्यथा ॥ ७५ ॥ सत्यं स्वभावं नो मुञ्चेदसत्यं तं परित्यजेत् । जगत्पश्य भार्गवैतत् स्वभावादतिचञ्चलम् ॥ ७६ ॥ सत्यासत्ये विभागेन भासेते सर्वतोऽखिलम् । प्रतिबिम्बादर्शभानमिव तत्प्रविचारय ॥ ७७ ॥ वह सबको दिखायी देता है, स्थिर जान पड़ता है, तथा सच्ची वस्तुओंके समान उससे व्यवहार भी हो सकता है । फिर अपने में ही उसे लीन भी कर लेता है । इसी प्रकार यह संसार भी भास रहा है ॥ ७२ ॥ योगियोंकी मनःकल्पित सृष्टिको देखो । वह तो पूर्ण स्थिरतासे युक्त होती है । किन्तु योगियोंका स्वरूप सीमित होता है, इसलिये उनकी सृष्टि उनसे बाहर भासती है ॥ ७३ ॥ परन्तु चिन्मात्र परमेश्वरका स्वरूप तो असीम है, इसलिये उनकी यह सृष्टि उनके भीतर ही है । अतः प्रतिबिम्ब जैसे दर्पणस्वरूप ही होता है वैसे ही चिदात्मासे भिन्न इस जगत्की कोई सत्ता नहीं है । इस प्रकार केवल विचारसे ही इसकी असत्यता सिद्ध होती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ७४-७५ ॥ परशुरामजी ! सत्य कभी अपने स्वभावको नहीं छोड़ता और असत्य उसे त्याग देता है । देखो, यह जगत् तो स्वभावसे बहुत ही चंचल है ॥ ७६ ॥ सब प्रकारके सत्य और असत्य दर्पण और प्रतिबिम्बके [ स्थिर और चंचल ] भानोंकी तरह अलग-अलग प्रतीत होते हैं । तुम उनका विचार करो ॥ ७७ ॥

३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आदर्शो ह्यचलस्तत्र चलं हि प्रतिबिम्बकम्। तथा जगच्चलं संविदचलं सर्वभावितम् ॥ ७८ ॥ अत एव हि भावानां विचारासहरूपता। तथा हि सूर्यालोको हि वस्तूनामवभासकः ॥ ७९ ॥ उलूकादिदिवान्धानां विपरीतोऽन्धकारवत्। प्रकाशत्वान्धकारत्वे न विविक्तेऽनयोः स्फुटे ॥ ८० ॥ एवं विषं कस्यचित्स्यादविषं कस्यचिद्भवेत्। मनुष्यादेः प्रतीघातकरी भित्तिर्हि लक्ष्यते ॥ ८१ ॥ योगिनां गुह्यकादीनामप्रतीघातलक्षणा । कालो देशश्च दीर्घो यो मनुष्यादिप्रभावितः ॥ ८२ ॥ स एव विपरीतो वै देवानां योगिनामपि। दर्पणे भासमानस्य दूराद्देर्दूरता यथा ॥ ८३ ॥


इनमें दर्पण स्थिर होता है और प्रतिबिम्ब चंचल। इसी प्रकार जगत् चलायमान है और चेतन अचल है—यह बात सभी जानते हैं॥ ७८ ॥ इसीसे संसारके पदार्थ विचारके आगे ठहरनेवाले नहीं हैं। जैसे सूर्य सभी पदार्थोंको प्रकाशित करने वाला है, किन्तु जो दिनमें अन्धे रहते हैं उन उल्लू आदिके लिये वह अन्धकारके समान विपरीत स्वभाववाला जान पड़ता है। इससे प्रकाशत्व और अन्धकारत्वका स्पष्ट निर्णय नहीं हो सकता ॥ ७९-८० ॥ इसी प्रकार जो एकके लिये विष होता है वही दूसरेके लिये विष नहीं रहता। भीत मनुष्यादिके लिये तो रुकावट करनेवाली होती है, किन्तु योगी और गुह्यकादिके लिये रुकावट करनेवाली नहीं रहती ॥ ८१-८२ पू० ॥ जो देश और काल मनुष्यादिको बहुत लंबा जान पड़ता है, वही देवता और योगियोंको वैसा प्रतीत नहीं होता ॥ ८२ उ०-८३ पू० ॥ जैसे दर्पणमें भासनेवाली दूरी आदि में दूरता नहीं होती, उसी

एकादशोऽध्यायः । १५६ तथैवास्य स्वभावोऽपि विचारे न स्थिरीभवेत् । अत आश्रयरूपेण विना नास्ति हि किञ्चन ॥ ८४ ॥ यदस्तीति भाति तत्तु चितिरेव महेश्वरी । एवं जगच्चिदेकात्मरूपं ते सम्यगीरितम् ॥ ८५ ॥ इति श्री० ज्ञानखण्डे जगत्तत्त्वनिरूपणे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ प्रकार विचार करने पर इस संसारका स्वभाव भी स्थिर नहीं जान पड़ता । अतः अपने आश्रय चेतनके सिवा यह और कुछ नहीं है ॥ ८३ उ०-८४ ॥ जो 'है' इस रूपसे भास रहा है वह तो केवल महेश्वरी चिति ही है। इस प्रकार जगत् और चेतनकी एकरूपताका यथावत् विवेचन हुआ ॥ ८५ ॥ एकादश अध्याय समाप्त ।

द्वादशोऽध्यायः एवं दत्तात्रेयमुखाज्जगतत्त्वं निशम्य तु। पप्रच्छ भार्गवो भूयः सन्देहकलिलान्तरः ॥ १ ॥ भगवन् संश्रुतं प्रोक्तं भवता जागतं ननु। यथा ब्रवीषि भगवंस्तत्तथैव न चान्यथा ॥ २ ॥ तथापि कुत एतद्धि भाति सत्यात्मकं सदा। कुतो वाऽन्यैर्बुद्धिमद्भिः सत्यत्वेन विनिश्चितम् ॥ ३ ॥ त्वत्तः श्रुतं चापि भूयो भाति मे सत्यवत् कुतः। ब्रूहेतत् कृपया नाथ यथा नश्येदयं भ्रमः ॥ ४ ॥ इत्यापृष्टो भार्गवेण दत्तात्रेयो महाशयः। जगत्सत्यभ्रान्तिमूलं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥ द्वादश अध्याय ॥ १२ ॥ शिलालोकका दर्शन इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे जगत्का तत्त्व श्रवण कर परशुरामजीका चित्त सन्देहसे भर गया और उन्होंने पूछा ॥ १ ॥ भगवन् ! मैंने आपका कहा जगत्सम्बन्धी विचार सुना । आप जैसा कहते हैं वह बात निश्चय वैसी ही है, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ २ ॥ तो भी यह संसार सर्वदा सत्यरूप क्यों भासता है तथा अन्य कई बुद्धिमानों ने इसे सत्य ही क्यों निश्चय किया है ? ॥ ३ ॥ आप गुरुदेवके मुखसे मैंने असत्य सुना, फिर भी मुझे यह सत्य-सा क्यों प्रतीत हो रहा है ? नाथ ! कृपा करके इसका कारण बताइये, जिससे मेरा यह भ्रम नष्ट हो जाय ॥ ४ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महामना दत्तात्रेयजीने जगत्में सत्यता की भ्रान्तिके मूलका वर्णन करना आरम्भ किया ॥ ५ ॥

द्वादशोऽध्यायः। १६१ शृणु राम जगद्-भ्रान्तेर्मूलमेतत् सनातनम्। वस्त्वविद्यापूर्वकं यद्दृढा भावनमेव तत् ॥ ६ ॥ पश्यात्मानमविज्ञाय स्वात्मबुद्धिं शरीरके। क्व मांसरुधिरास्थीनि क्व चिदात्माऽतिनिर्मलः ॥ ७ ॥ केवलं भावनादार्ढ्याच्चिदात्मा देहकोऽभवत्। ज्ञातेऽप्यात्मनि चिद्रूपे भूयो भ्रान्तिः शरीरके ॥ ८ ॥ एवमेव भावनया सत्यं भाति जगत् खलु। विपरीतं भावयन् वै दृढं भ्रान्ति निवर्त्तयेत् ॥ ९ ॥ यो यथा भावयेदेतज्जगतस्य तथा भवेत्। योगिनां धारणाध्यानैः पश्य तद्रूपसङ्गतिम् ॥ १० ॥ अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुनरावृत्तमद्भुतम्। अस्ति वङ्गे सुन्दराख्यं पुरं परमपावनम् ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, इस जगत्-भ्रान्तिका अनादि मूल कारण यह है कि जो वस्तु अज्ञानसे भास रही है उसे हृदयसे दृढतापूर्वक पकड़ रखा है ॥ ६ ॥ देखो, आत्माको न जाननेके कारण ही तो शरीरमें आत्मबुद्धि हुई है। अन्यथा कहाँ ये मांस, रक्त और हड्डियाँ तथा कहाँ अत्यन्त निर्मल चेतन आत्मा ! ॥ ७ ॥ केवल भावनाकी दृढताके कारण ही यह शरीर चिदात्मा बन बैठा है। यहाँतक कि चिद्रूप आत्माको जान लेनेपर भी पुनः शरीरमें ही आत्मत्वकी भ्रान्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ ठीक इसी प्रकार भावनाकी दृढताके कारण ही संसार सत्य जान पड़ता है। अतः इसके विपरीत भावना करके इस दृढ भ्रान्तिको निवृत्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ जो जैसी भावना करता है उसके लिये यह, जगत् वैसा ही हो जाता है। देखो, योगियोंको धारणा-ध्यानादिके द्वारा तद्रूप अनुभव होने लगता है ॥ १० ॥ इस विषयमें मैं एक अद्भुत प्राचीन प्रसंगकी तुमसे चर्चा करता हूँ। वंगदेशमें सुन्दरपुर नामक एक बड़ा ही पवित्र नगर है ॥ ११ ॥

१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राऽऽसीन्नृपतिर्धीमान् सुषेण इति विश्रुतः। तस्य भ्राता महासेनो यवीयान् प्रियकृत् सदा ॥ १२ ॥ शशास राज्यं नृपतिर्धर्मतः सर्वसम्मतः। कदाचिदश्वमेधैः सोऽयजद्देवं महेश्वरम् ॥ १३ ॥ तत्र राजकुमारास्तु महाबलपराक्रमाः । महत्या सेनया यज्ञाश्वं सर्वेऽह्यनुसंययुः ॥ १४ ॥ अश्वस्य रोधकान् सर्वान् विजित्य बलिनो बलात्। ययुरैरावतीतीरमन्वश्वं नृपतेः सुताः ॥ १५ ॥ ददृशुस्तत्र राजर्षि तङ्गणाह्वयं तपोनिधिम् । बलोद्धता अवज्ञाय तमसङ्गम्य ते ययुः ॥ १६ ॥ तद्वीक्ष्य तङ्गणसुतः पित्रवज्ञां रुपान्वितः । जग्राहाश्वं यज्ञीयं तं राजपुत्रान् हि भर्त्सयन् ॥ १७ ॥ वहाँ सुषेण नामसे विख्यात एक बुद्धिमान् राजा था। उसका छोटा भाई महासेन था। वह सर्वदा उसका प्रिय करनेवाला था ॥१२॥ राजा धर्मपूर्वक राज्यका शासन करता था और सभीके द्वारा सम्मानित था। एक बार अश्वमेध यज्ञके द्वारा उसने भगवान् महेश्वरकी आराधना की ॥ १३ ॥ उस समय उसके सभी महान् बलवान् और पराक्रमी राजकुमार बड़ी भारी सेना लेकर यज्ञके लिये छोड़े हुए अश्वके साथ गये ॥१४॥ उन बलवान् राजकुमारोंने घोड़ेको रोकनेवाले सभी वीरोंको अपने पराक्रमसे परास्त कर दिया। इस प्रकार वे घोड़ेके पीछे इरावती नदीके तटपर पहुँचे ॥ १५ ॥ वहाँ उन्हें तंगण नामक तपोनिष्ठ राजर्षिके दर्शन हुए। किन्तु बलोन्मत्त होनेके कारण उन्होंने उनकी उपेक्षा कर दी और उनसे भेट किये बिना ही वे आगे चले गये ॥ १६ ॥ इस प्रकार पिताजीकी अवज्ञा होती देख तंगणके पुत्रको बड़ा क्रोध हुआ। उसने उस यज्ञीय अश्वको पकड़ लिया और उन राज- कुमारोंको ललकारा ॥ १७ ॥

द्वादशोऽध्यायः। १६३ अथ राजकुमारास्ते रुरुधुः सर्वतो हि तम् । तावत्तङ्गणपुत्रोऽपि गण्डशैलं पुरःस्थितम् ॥ १८ ॥ विवेशाश्वं समादाय पश्यत्सु राजसूनुषु । साश्वं शिलाविलीनं तं दृष्ट्वा राजकुमारकाः ॥ १९ ॥ विभिदुर्गण्डशैलं तं शस्त्रैरुच्चावचैः पृथक् । चूर्णिताद् गण्डशैलात् स महत्या सेनया वृतः ॥ २० ॥ निर्गत्य तङ्गणसुतो जिगाय युधि तान् क्षणात् । निहत्य सेनां सौषेणीं बध्वा राजकुमारकान् ॥ २१ ॥ प्रविवेश गण्डशैलं भूयस्तङ्गणसम्भवः । अथ सेनाभटाः शिष्टा गत्वा राज्ञे न्यवेदयन् ॥ २२ ॥ साश्वराजकुमाराणां हरणं गण्डशैलके । सुषेणो विस्मितोऽत्यन्तमुवाचाऽवरजं स्वकम् ॥ २३ ॥ वत्साऽऽशु गच्छ तं देशं यत्राऽऽस्ते तङ्गणो मुनिः । तपस्विनोऽचिन्त्यवीर्या अजेया देवमानुषैः ॥ २४ ॥ तब तो उन राजकुमारोंने उसे सब औरसे घेर लिया । बस, तंगणपुत्र उस घोड़ेको ले उन राजकुमारोंके देखते-देखते उनके सामनेवाली शिलामें घुस गया ॥ १८-१६ पू० ॥ राजकुमारोंने उसे घोड़ेके सहित शिलामें जाते देख छोटे-मोटे हथियारोंसे उस शिलाको फोड़ डाला ॥ १६ उ०-२० पू० ॥ उस फूटी हुई शिलासे तङ्गणपुत्र बड़ी भारी सेना लेकर निकला और क्षणभरमें ही उन्हें युद्धमें जीत लिया ॥ २० उ०-२१ पू० ॥ उसने सुषेणकी सेनाका संहार कर दिया और राजकुमारोंको बाँधकर फिर उसी शिलामें घुस गया ॥ २१ उ०-२२ पू० ॥ तब बचे-खुचे सैनिकोंने जाकर राजाको घोड़ेके सहित राजकुमारों के शिलामें हर ले जानेका समाचार सुनाया। इससे सुषेणको बड़ा विस्मय हुआ और उसने अपने छोटे भाईसे कहा ॥ २२ उ०-२३ ॥ "भाई ! तुम उस देशमें जाओ जहाँ तंगण मुनि विराजमान हैं। तपस्वियोंमें बड़ा अद्भुत सामर्थ्य होता है। वे देवता और मनुष्य सभीके लिये अजेय होते हैं ॥ २४ ॥

१६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तं प्रसाद्य सुतानश्वं चाऽऽसाद्याऽऽयाहि सत्वरम् । न कालोऽतिव्रजेदेष वसन्तो यज्ञसम्मतः ॥ २५ ॥ अभिमानो न कर्तव्यस्तपस्विषु कदाचन । क्रुद्धास्तपस्विनो लोकान् भस्मीकुर्युः क्षणेन वै ॥ २६ ॥ अतः प्रसादनपरो भूत्वा स्वार्थं प्रसाधय । इत्यादिष्टो महासेनस्तं देशं शीघ्रम्यायौ ॥ २७ ॥ अपश्यत्तङ्गणं तत्र समाहितमतिं दृढम् । काष्ठकुड्यात्मतां प्राप्तं शान्तेन्द्रियमनोधियम् ॥ २८ ॥ निर्विकल्पदशाम्भोधिनिलीनस्वात्मभावनम् । प्रणम्य दण्डवद् भूयः कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्महासेनो मुनीश्वरम् । तथा तस्य संस्तुवतो ह्यत्यगाद्वै दिनत्रयम् ॥ ३० ॥ अथाऽऽजगाम तत्पुत्रः सन्तुष्टः पितृसंस्तवात् । प्रोवाच तं महासेनं राजंस्तुष्टोऽस्मि संस्तवात् ॥ ३१ ॥ तुम उन्हें प्रसन्न करना और घोड़े तथा राजकुमारोंको कर शीघ्र ही लौट आना । देखो, यज्ञके लिये अनुकूल यह वसन्त का समय व्यतीत न हो जाय ॥ २५ ॥ तपस्वियोंके आगे कभी अभिमान नहीं करना चाहिये । तपस्वियोंको क्रोध हो जाय तो वे एक क्षणमें सम्पूर्ण लोकोंमें भस्म कर सकते हैं ॥२६॥ इसलिये तुम उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करके अपना काम बना लेना ।” राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर महासेन तुरंत उस देशमें पहुँचा ॥२७॥ वहाँ उसने तङ्गण मुनिको दृढ समाधिमें स्थित देखा । उनका शरीर काष्ठ और भीतके समान स्थिर था तथा इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि सर्वथा शान्त ॥ २८ ॥ उनका अहंकार निर्विकल्प दशारूप समुद्रमें डूबा हुआ था । तब महासेनने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अनेकों स्तोत्रोंसे उन मुनीश्वरकी स्तुति की । इस प्रकार स्तुति करते हुए उसे तीन दिन बीत गये ॥ २९-३० ॥ तब पिताकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर पुत्र आया और महासेनसे बोला, "राजन् ! मैं तुम्हारी प्रार्थनासे प्रसन्न हूँ ॥ ३१ ॥

द्वादशोऽध्यायः। १६५ ब्रूहि किं तेऽभिलषितं साधयाम्यविलम्बितम् । अहं पुत्रोऽस्म्यस्य विभोस्तङ्गणस्य महामुनेः ॥ ३२ ॥ नैतस्य मे पितुः कालो भाषणे शृणु भूमिप ! । समाहितस्वान्त एष द्वादशाब्दादनन्तरम् ॥ ३३ ॥ समाधितः समुत्तिष्ठेत्तत्र पञ्चाब्दका गताः । सप्ताऽवशेषा एवं हि समयोऽस्य पुरातनः ॥ ३४ ॥ तत्तेऽभिवाञ्छितं ब्रूहि यत्तस्मात्तत् करोम्यहम् । न मां वालं विजानीहि पितृतुल्यं तपस्विनम् ॥ ३५ ॥ नाऽसाध्यं विद्यते लोके योगिनां हि तपस्विनाम् । श्रुत्वा मुनिकुमारोक्तं महासेनोऽतिबुद्धिमान् ॥ ३६ ॥ प्राह तं तङ्गणसुतं प्रणम्य च कृताञ्जलिः । मुनिपुत्र ! प्रियं मेऽद्य करोषि यदि सत्यतः ॥ ३७ ॥ तत् पितुस्तेऽद्य वाञ्छामि समाधेर्व्युत्थितस्य वै । सह सम्भाषणं किञ्चिदेतदत्यन्तवाञ्छितम् ॥ ३८ ॥ बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है, मैं तुरंत उसे पूर्ण करूँगा। मैं इन परम समर्थ तंगण मुनिका पुत्र हूँ ॥ ३२ ॥ राजन् ! सुनो, अभी मेरे पिताजीके बोलनेका समय नहीं है। इनका अन्तःकरण समाधिमें लीन है। इस समाधिसे ये बारह वर्षोंमें उठेंगे अभी पाँच वर्ष बीते हैं, सात बाकी हैं। इस प्रकार पहलेसे ही इनका संकेत है ॥ ३३-३४ ॥ अतः इनसे तुम जो चाहते हो मुझे बताओ, मैं पूरा करूँगा। मुझे बच्चा मत समझो, मैं भी पिताके समान तपस्वी हूँ। तपस्वी योगियोंके लिये संसारमें कोई बात असाध्य नहीं होती” ॥३५-३६ पू०॥ मुनिकुमार की बातें सुनकर परम बुद्धिमान् महासेनने उसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोला-॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ “मुनिकुमार यदि आप इस समय सचमुच मेरा कोई प्रिय करना चाहते हैं तो मैं समाधिसे उठे हुए आपके पिताजीसे कुछ बात करना चाहता हूँ—यही मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ ३७ उ०-३८ ॥

१६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनुकम्प्यो यद्यहं ते द्रुतमेतत् प्रसाधय । श्रुत्वैतद्वचनं राज्ञः प्राऽऽह तापसजः पुनः ॥ ३९ ॥ राजन् न साध्यं ह्येतत्ते वाञ्छितं सर्वथा भवेत् । तथाऽपि ते करोमीति प्रतिश्रुत्याऽन्यथा कथम् ॥ ४० ॥ ब्रवीमि भूयस्तत् किञ्चित् प्रतीक्षस्वाऽभियाचितः । मुहूर्तमात्रं मे पश्य सामर्थ्यं योगसम्भवम् ॥ ४१ ॥ एष मेऽद्य गुरुः शान्तपदे परमपावने । संस्थितस्तं बाह्ययत्नैरपि को वै प्रबोधयेत् ॥ ४२ ॥ पश्याऽहं बोधयाम्येनं योगयुक्त्यैव सूक्ष्मया । इत्युक्त्वाऽथ समाविश्य समाहृत्येन्द्रियाण्यलम् ॥ ४३ ॥ प्राणेऽपानं सुसंयोज्य मुख्यप्राणेन निर्गतः । देहं पितुः प्रविश्याऽऽशु प्रलीनं तस्य मानसम् ॥ ४४ ॥ बोधयामास चाऽऽकृष्य प्रबोध्याऽऽशु विनिर्गतः । देहं स्वमाविशद् यावत्तावत् स बुबुधे मुनिः ॥ ४५ ॥ यदि आप मुझे कृपाका पात्र समझते हैं तो शीघ्र ही इसे पूर्ण कर दीजिये ।” राजाकी यह बात सुनकर मुनिपुत्रने पुनः कहा-॥ ३६ ॥ “राजन् ! तुम्हारी इस इच्छाका पूर्ण होना तो किसी प्रकार सम्भव नहीं है, तथापि मैं तुमसे 'तुम्हारा प्रिय करूँगा” ऐसा कहकर अब दूसरी बात कैसे कह सकता हूँ। तुम कुछ देर ठहरो और मेरा योग- सम्बन्धी सामर्थ्य देखो ॥ ४०-४१ ॥ इस समय ये मेरे गुरुदेव परमपवित्र शान्तिपदमें प्रतिष्ठित हैं, इन्हें बाह्य प्रयत्नोंसे तो भला, कौन जगा सकता है ? देखो, मैं इन्हें योगकी अत्यन्त सूक्ष्म युक्तिसे जगाता हूँ” ॥ ४२-४३ पू० ॥ ऐसा कहकर वह बैठ गया और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका पूर्णतया निरोध- कर उसने अपानको प्राणके साथ मिलाया। फिर मुख्य प्राणके द्वारा बाहर आकर तुरन्त ही अपने पिताके शरीरमें प्रविष्ट हो गया और उनके सुप्त मनको आकर्षित करके सजग कर दिया। इस प्रकार उन्हें सावधान कर तुरन्त ही वहाँसे निकल कर जैसे ही अपने शरीरमें प्रविष्ट हुआ उसी समय वे मुनिवर भी जागृत हो गये ॥ ४३ उ०-४५ ॥

द्वादशोऽध्यायः। १६७ अपश्यदग्रगं भूपं स्तुवन्तं प्रणतं तदा। किमेतदिति सञ्चिन्त्य सर्वं योगदृशाऽविदत् ॥ ४६ ॥ प्रसन्नचित्त आमन्त्र्य पुत्रं प्राह सुशान्तधीः। वत्स ! नैवं पुनः कार्यं क्रोधस्तु तपसो रिपुः ॥ ४७ ॥ राज्ञा हि रक्षिते लोके तपो निर्विघ्नमेधते । यज्ञविघ्नक्रिया दैत्यस्वभावो न मुनेः क्वचित् ॥ ४८ ॥ प्रयच्छाऽश्वं राजपुत्रानप्यस्मै सुमना द्रुतम् । शीघ्रं यात्वेष यज्ञस्य न कालातिक्रमो भवेत् ॥ ४९ ॥ इत्युक्तो गण्डशैलं स प्रविश्य क्षणमात्रतः । साश्वान् राजसुतांस्तस्मै ददौ प्रीत्या गतक्रुधः ॥ ५० ॥ ततः साश्वान् भ्रातृपुत्रान् संप्रेष्य नगरं प्रति । महासेनस्तद्गणं तं प्रणम्यात्यन्तविस्मितः ॥ ५१ ॥ अपृच्छत् प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रसाद्य मुनिपुङ्गवम् । उस समय उन्होंने अपने सामने राजाको अत्यन्त विनीत होकर स्तुति करते देखा। फिर यह सोचकर कि यह सब क्या मामला है उन्होंने योगदृष्टिसे सब बात जान ली ॥ ४६ ॥ तब उन्होंने प्रसन्न चित्तसे अत्यन्त शान्तिपूर्वक पुत्रको सम्बोधन करके कहा, "बेटा ! ऐसा काम फिर कभी मत करना। यह क्रोध तो तपस्याका शत्रु है ॥ ४७ ॥ राजाके द्वारा लोककी रक्षा ( सुव्यवस्था ) होनेपर ही निर्विघ्नता- पूर्वक तपकी वृद्धि होती है। यज्ञमें विघ्न करना-यह तो दैत्योंका स्वभाव है, मुनियोंका कभी नहीं ॥ ४८ ॥ इसलिये तुम प्रसन्नचित्त होकर तुरन्त ही इन्हें घोड़ा और सब राजकुमार दे दो। इन्हें जल्दी ही जाना चाहिये, जिससे यज्ञका समय निकल न जाय ॥ ४९ ॥ पिताकी ऐसी आज्ञा होनेपर मुनिपुत्रका क्रोध शान्त हो गया। वह उस शिला में घुसा और एक क्षणमें ही घोड़ेके सहित राजपुत्रोंको लाकर प्रीतिपूर्वक महासेनको सौंप दिया ॥ ५० ॥ तब घोड़ेके सहित राजकुमारोंको नगर की ओर भेजकर महासेनने

१६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भगवन् ज्ञातुमिच्छामि साश्वा मे भ्रातृनन्दनाः ॥ ५२ ॥ कथं गण्डशैलगर्भे संस्थितास्तत् समीरय । एवं राज्ञानुयुक्तोऽथ तङ्गणः प्राह भूपतिम् ॥ ५३ ॥ शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराऽहं पृथिवीपतिः । समुद्रवलयां पृथ्वीमन्वशासं चिरं खलु ॥ ५४ ॥ महादेवप्रसादेन ज्ञात्वा चितिमधीश्वरीम् । त्रिपुरां लोकसंस्थानं नीरसं विमृशंस्तथा ॥ ५५ ॥ निर्विण्णो लोकयात्रायां न्यस्य राज्यं सुतेष्वथ । प्राविशं वनमेतं वै भार्या मामन्वगात् सती ॥ ५६ ॥ तस्याभितप्यतो मेऽद्य ययुरर्बुदवत्सराः । भार्यापि मत्सेवनेन परां सिद्धिमूपागता ॥ ५७ ॥ कदाचिदथ भाव्यर्थगौरवान्मे प्रिया सती । समाधावेव कामार्त्तमानसाभूत्ततस्तु सा ॥ ५८ ॥ मां दृष्ट्वा रतिमिच्छन्ती समाधिस्थं स्थिरान्तरम् । अत्यन्त विस्मित हो तंगण मुनिको प्रणाम किया और उन मुनिश्रेष्ठको प्रसन्न कर उनसे हाथ जोड़कर पूछा—॥ ५१-५२ पू० ॥ “भगवन् ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि घोड़ेके सहित मेरे ये भतीजे इस शिलाके भीतर कैसे रहे—बतानेकी कृपा करें” ॥५२ उ०-५३ पू०॥ राजाके ऐसा प्रश्न करनेपर तंगणमुनिने उससे कहा, “राजन् ! सुनो, अपना मैं हाल बताता हूँ । पहले मैं भी राजा था और बहुत दिनों तक मैंने समुद्रपर्यन्त इस भूमण्डलका शासन किया है ॥५३ उ०-५४॥ भगवान् महेश्वरकी कृपासे मुझे सर्वलोकमहेश्वरी चित्स्वरूपा त्रिपुराका ज्ञान हो गया । इससे मैं दृश्य जगत्को नीरस समझकर लोकव्यवहारसे विरक्त हो अपना राज्य पुत्रोंको सौंपकर इस वनमें चला आया । मेरी सती धर्मपत्नी भी मेरे साथ चली आयी ॥ ५५-५६ ॥ यहाँ तपस्या करते-करते मुझे एक अरब वर्ष व्यतीत हो गये । मेरी सेवा करते रहनेसे मेरी पत्नीको भी परम पदकी प्राप्ति हो गयी ॥ ५७ ॥ पीछे किसी समय होनहारके प्रभावसे मेरी पतिपरायणा धर्मपत्नीका चित्त समाधि अवस्थामें ही कामाकुल हो गया ॥ ५८ ॥ उसे रतिकी इच्छा हुई । किन्तु उसने देखा कि मैं

द्वादशोऽध्यायः । १६६ असहन्ती कामवेगं भावयामास मद्रतिम् ॥ ५९ ॥ गाढभावनया प्राप्य सम्भोगं तु मया सह । दधार गर्भं सुषुवे पुत्रमेतं पुरः स्थितम् ॥ ६० ॥ पुत्रं न्यस्य मदुत्सङ्गे मां समाधेः प्रबोध्य च । देहं भूतेषु सात्कृत्य परव्योमाऽऽत्मतां ययौ ॥ ६१ ॥ अथ दृष्ट्वोत्सङ्ग एनं ज्ञात्वा तस्या गतिं पराम् । दयाक्रान्तमना जातस्तेनायं वर्द्धितो मया ॥ ६२ ॥ श्रुत्वा कदाचिन्मत्तोऽयं राज्यशास्तिं पुरा कृताम् । राज्यशासनकामोऽभूत् प्रार्थयामास मामनु ॥ ६३ ॥ ततो मदुपदेशेन प्राप्य योगर्द्धिमुत्तमाम् । निर्माय भावनायोगात् लोकमस्मिन् महाऽश्मनि ॥ ६४ ॥ समुद्रवलयां पृथ्वीं शास्ति नित्यं सुतस्त्वयम् । तल्लोकेऽश्वः सुता राज्ञो निरुद्धास्ते हि मोचिताः ॥ ६५ ॥ स्थित और अत्यन्त अन्तर्मुख हूँ । तब कामवेगको सहन न कर सकनेके कारण उसने मेरे साथ सम्भोग की भावना की ॥ ५६ ॥ गाढ़ भावनाके कारण उसे मेरे साथ सम्भोगकी प्राप्ति हो गयी और उसने गर्भ धारण किया । तब उसने यह सामने विद्यमान पुत्र उत्पन्न किया ॥ ६० ॥ उसने पुत्र मेरी गोदमें रख दिया और मुझे समाधिसे जगा दिया । फिर शरीर को पञ्चभूतोंमें लीनकर वह स्वयं परब्रह्मसे अभिन्न हो गयी ॥ ६१ ॥ इसे अपनी गोदमें देखकर और उसे परमपदमें लीन जानकर मेरा चित्त दयासे भर गया । इसीसे मैंने इसका पालन-पोषण किया ॥ ६२ ॥ एक बार इसने मुझसे मेरी पूर्वकालिक राज्यशासनकी बात सुनी तो इसे भी राज्य करनेकी इच्छा हो गयी और इसने मुझसे प्रार्थना की॥६३॥ तब मेरे उपदेशसे इसने उत्तम योगसम्पत्ति प्राप्त की और अपने संकल्पसे ही इस विशाल शिलामें एक विश्वकी रचनाकर यह मेरा पुत्र सर्वदा आसमुद्र भूमण्डलका शासन करता है । उसी लोकमें इसने तुम्हारे घोड़े और राजपुत्रोंको कैद कर लिया था, जिन्हें अब छोड़ दिया है ॥ ६४-६५ ॥

१७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे इत्येतत्ते समाख्यातं गण्डशैलेऽवरोधनम् । इति श्रुत्वा मुनिवचो भूयः पप्रच्छ भूपतिः ॥ ६६ ॥ श्रुतं त्वदुक्तमेतद्वै महाश्चर्यकरं परम् । तं लोकं द्रष्टुमिच्छामि कृपया मे प्रदर्शय ॥ ६७ ॥ इति सम्प्रार्थितो राज्ञा मुनिः पुत्रं समादिशत् । वत्सास्मै दर्शय स्वीयं लोकं सर्वं यथेप्सितम् ॥ ६८ ॥ इत्युक्त्वा तङ्गणो भूयः प्रांवेवेश समाहितिम् । अथ तं तङ्गणसुतः समासाद्य नृपं ययौ ॥ ६९ ॥ गण्डशैलं प्रति ततः प्राविशन्मुनिदारकः । प्रवेष्टुं नाशकद् भूप आह्वयतं मुनेः सुतम् ॥ ७० ॥ सोऽपि गण्डशिलान्तस्थो राजानं समुपाव्हयत् । अथ भूयो विनिष्क्रम्य प्राह भूपं मुनेः सुतः ॥ ७१ ॥ नृपैष लोकस्तेऽसाध्यः प्रवेष्टुं खल्वयोगिनः । अयोगाद् गण्डशैलोऽयं घनः सप्रतिघोऽभवत् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार मैंने तुम्हें शिलाके भीतर कैद करनेकी कथा सुना दी।” मुनिवरका यह वक्तव्य सुनकर राजाने पुनः पूछा—॥ ६६ ॥ “आपके मुखसे मैंने यह बड़ा ही आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुना। अब मैं उस लोककी देखना चाहता हूँ। दिखानेकी कृपा करें” ॥ ६७ ॥ राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर मुनिवरने अपने पुत्रको आज्ञा दी, “बेटा ! तुम इसे इच्छानुसार अपना सारा संसार दिखा दो” ॥ ६८ ॥ ऐसा कहकर तंगणमुनि पुनः समाधिमें प्रविष्ट हो गये। तब उनका पुत्र राजाको लेकर उस शिलाके समीप गया वहाँ पहुँचकर वह मुनिपुत्र तो शिलामें घुस गया किन्तु राजा प्रवेश नहीं कर सका। तब उसने मुनिकुमारको पुकारा ॥ ६९-७० ॥ उधर शिलाके भीतरसे उसने भी राजाको पुकारा। फिर बाहर आकर उसने राजासे कहा—॥ ७१ ॥ राजन् ! तुम योगी नहीं हो, इसलिये तुम्हारे लिये तो इस शिलामें घुसना सम्भव नहीं है। योगहीन होनेके कारण ही तुम्हें यह शिला सघन और रुकावट डालनेवाली जान पड़ी ॥ ७२ ॥

द्वादशोऽध्यायः । १७१ नेतव्यस्तं सर्वथैव पितुर्वचनगौरवात् । तदत्र देहं विन्यस्य कोटरे तृणसंवृते ॥ ७३ ॥ मनोमात्रशरीरः सन् शैलं विश मया सह । इत्युक्तः प्राह नृपतिरशक्तो देहनिर्गमे ॥ ७४ ॥ कथं मुने देहमिममुत्सृजामि समीरय । उत्सृजामि यदि बलात्नाशमेष्यामि सर्वथा ॥ ७५ ॥ एवं वदन्तं नृपतिं प्रहस्याह मुनेः सुतः । अहो योगानभिज्ञोऽसि चाऽस्तु नेत्रे निमीलय ॥ ७६ ॥ इत्युक्त्वा मीलिताक्षं तं प्रविश्य निमिषार्द्धतः । आकृष्य तल्लिङ्गतनुं क्षिप्त्वा श्वभ्रे च तत्तनुम् ॥ ७७ ॥ योगसामर्थ्यतः शैले निविश्य नृपसंयुतः । सुषुप्तं देहवैकल्यात् स्वसङ्कल्पोत्थदेहके ॥ ७८ ॥ संयोज्य बोधयामास प्रबुद्धो नृपतिस्तदा । गृहीतं मुनिनाऽपश्यत् स्वं महागगने तदा ॥ ७९ ॥


तथापि पिताजीकी आज्ञाके कारण किसी भी प्रकार तुम्हें ले चलना ही होगा । अतः तुम घास-फूससे ढके हुये इस गढ़ेमें अपना शरीर रख दो और केवल मनोमय शरीरसे मेरे साथ शिलामें चले आओ” ॥ ७३-७४ पू० ॥ ऐसा कहे जानेपर राजा बोला, “मैं शरीरसे बाहर आनेमें असमर्थ हूँ । मुने ! बताओ तो, मैं किस प्रकार इस शरीरको छोड़ूँ । यदि इसे बलपूर्वक छोड़ भी दूँ तो मेरा तो सर्वथा नाश हो जायगा” ॥ ७४ उ०-७५ ॥ राजाके ऐसा कहनेपर मुनिकुमार हँसकर बोला, “अरे ठाक, तुम तो योग नहीं जानते । अच्छा, तुम आँखें मूंद लो” ॥ ७६ ॥ मुनिपुत्र ऐसा कहकर, राजाके आँख मूँद लेनेपर, आधे पलमें ही उसके भीतर घुस गया । उसने राजाके लिंग शरीरको बाहर खींचा और स्थूल शरीरको गढ़ेमें डाल दिया फिर अपने योगबलसे राजाके सहित शिलामें घुस गया । देहसे पृथक् हो जानेके कारण इस समय राजाका लिंग शरीर अचेत था । उसे अपने संकल्पसे बनाये हुए शरीरसे संयुक्त करके सावधान किया तो राजा सचेत हो गया ! तब

१७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ऊर्ध्वं विष्वक् च संपश्यन् नभो भीममनन्तकम् । भीतः प्राह मुनेः पुत्रं मुने मां न परित्यज ॥ ८० ॥ परित्यक्तो विनश्यामि पतिष्येऽहं निराश्रये । इति भीतं नृपं दृष्ट्वा प्रहस्याऽऽह मुनेः सुतः ॥ ८१ ॥ परित्यज भयं भूप नोत्सृजामि निशामय । एनं शैलान्तरस्थानं लोकं धैर्येण सर्वतः ॥ ८२ ॥ अथ धैर्यं समालम्ब्य नृपः समवलोकयन् । अधो दूरे सनक्षत्रमभ्रमन्धतमोवृतम् ॥ ८३ ॥ प्रविश्य तं देशमपि ततोऽधस्तात् प्रपश्यत् । चन्द्रमण्डलमास्फीतं तत्राऽऽगत्य जडीकृतः ॥ ८४ ॥ चन्द्रमण्डलशीतेन मुनिपुत्रेण रक्षितः । अथ प्राप्य सूर्यलोकं तत्करैरभितापितः ॥ ८५ ॥ मुनिपुत्रेण योगेन शिशिरीकृतदेहकः । अपश्यल्लोकमखिलं स्वर्लोकप्रतिविम्ववत् ॥ ८६ ॥ उसने देखा कि मुनिपुत्र उसे बड़े भारी आकाशमें पकड़े ले जा रहा है ॥ ७७-७६ ॥ अपने ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर अति भयानक एवं असीम आकाश ही देख कर वह डर गया और मुनिपुत्रसे बोला, “मुने । मुझे छोड़ मत देना । आप छोड़ देंगे तो मैं इस निराधारमें गिरकर मर जाऊँगा” । इस प्रकार राजाको भयभीत देखकर मुनिकुमारने हँसकर कहा—॥ ८०-८१ ॥ “राजन् ! भय छोड़ दो, मैं छोडूंगा नहीं । यह शिलाके भीतर स्थित लोक है । इसे धैर्यपूर्वक सब ओर देखो” ॥ ८२ ॥ अब राजाने धैर्य धारणकर देखा तो उसे बड़ी दूरीपर नक्षत्रोंके सहित अन्धकारसे आच्छादित आकाश दिखायी दिया ॥ ८३ ॥ उस प्रदेशमें भी घुसकर जब नीचेकी ओर देखा तो बड़ा विशाल चन्द्रमण्डल दीख पड़ा । वहां पहुँचकर वह चन्द्रलोककी ठंडसे अकड़ गया । तब मुनिपुत्रने उसकी रक्षा की ॥ ८४-८५ पू० ॥ फिर जब सूर्यलोकमें पहुँचा तो वह सूर्यकी किरणोंसे झुलसने लगा । तब मुनिपुत्रने योगद्वारा उसके शरीरको शीतल किया । उसे वह सारा

द्वादशोऽध्यायः। १७३ अथ शृङ्गे हेमगिरेर्मुनिना सह संस्थितः । मुनिप्रदर्शितं सर्वमपश्यत् पृथिवीपतिः ॥ ८७ ॥ देशान्तरावलोकाय मुनिदत्तशुभेक्षणः अपश्यद्वलयात्मानं लोकालोकाख्यपर्वतम् ॥ ८८ ॥ तद्बहिर्ध्वान्तसन्दोहमन्तःसौवर्णमेदिनीम् । समुद्रान् सप्तद्वीपांश्च नदीगिरिसमाकुलान् ॥ ८९ ॥ भुवनान्यपि सर्वाणि चेन्द्राद्यान् विबुधोत्तमान् । दैत्यान् मनुष्यान् रक्षांसि यक्षकिंपुरुषादिकान् ॥ ९० ॥ तत्राऽपश्यत् सत्यलोके वैकुण्ठे राजते नगे । मुनिपुत्रं स्वमात्मानं ब्रह्मविष्णुशिवात्मना ॥ ९१ ॥ विभज्य संस्थितं सर्वलोक-सृष्ट्यादिहेतवे । अथोऽपश्यद् भूविभागे कृत्वा रूपान्तरं तथा ॥ ९२ ॥ प्रशासनपरो भूमेः सार्वभौमत्वमास्थितः । एवं मुनिकुमारस्य दृष्ट्वा योगर्द्धिमुत्तमाम् ॥ ९३ ॥ लोक स्वर्गलोकके प्रतिबिम्बके समान दिखायी दिया ॥ ८५ उ०-८६ ॥ फिर वह मुनिके साथ ही हिमालयके शिखरपर उतरा। वहाँसे वह मुनिपुत्रके दिखानेसे सब वस्तुएँ देखने लगा ॥ ८७ ॥ विभिन्न देशोंको देखनेके लिये मुनिने उसे सुन्दर दृष्टि दे दी। उससे उसने चारों ओर मण्डलाकार लोकालोक पर्वतको देखा ॥ ८८ ॥ उसके बाहर की ओर घोर अन्धकार था और भीतरकी ओर सुवर्णमयी भूमि थी। इसके सिवा उसने सब समुद्र, नदी और पर्वतोंसे पूर्ण सातों द्वीप, सभी भुवन, इत्यादि प्रधान-प्रधान देवगण, दैत्य, मनुष्य, राक्षस, यक्ष और किन्नर आदि सभी देखे ॥ ८९--९० ॥ वहाँ उसने यह भी देखा कि वह मुनिपुत्र ही स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीन रूपोंमें अपने ही को विभक्त करके लोकों की रचना आदिके लिये सत्यलोक, वैकुण्ठ और कैलाशमें विराजमान है ॥ ९१-९२ पू० ॥ साथ ही यह भी देखा कि पृथ्वीतलमें एक अन्य रूप धारणकर वही सार्वभौम सम्राट्के पदपर स्थित हो पृथ्वीका शासनकर रहा है ॥ ९२ उ०-९३ पू० ॥