भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 164

१५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे महासत्ता जगद्ग्रासशीला पूर्णावभासते । समुद्रमन्तरा तोयं दिवानाथं विना प्रभाः ॥ ३१ ॥ यथा न सन्ति तद्वद् वै संविद्रूपं विना जगत् । तस्मादेष महादेवः शुद्धचैतन्यविग्रहः ॥ ३२ ॥ आसीत्सृष्टेः पुरा तस्मादुत्पन्नं तत्र संस्थितम् । तस्मिन्विलीयते चान्ते जगदेतच्चराचरम् ॥ ३३ ॥ इत्यागमप्रसिद्धोऽर्थस्तन्न विप्रतिपद्यते । अदृष्टार्थेषु संवादात्प्रमाणं ह्यागमो भवेत् ॥ ३४ ॥ दृश्यन्ते मणिमन्त्रादिसिद्धयः सर्वतो यतः । नाल्पप्रज्ञो विजानीयान्मणिमन्त्रमहाफलम् ॥ ३५ ॥ तस्मात्सर्वज्ञगदितो ह्यागमः सर्वदर्शनः । तत्रोक्तो देव एवादौ सृष्टेर्जगत आस्थितः ॥ ३६ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें लीन कर लेनेवाली वह महा- सत्ता ही पूर्णरूपसे प्रकाशमान है । जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंग और सूर्यके बिना प्रभाकी सत्ता नहीं है उसी प्रकार उस चिन्मात्र के { बिना संसार नहीं है ॥ ३१-३२ पू० ॥ अतः सृष्टिसे पहले यह शुद्धचैतन्यस्वरूप महेश्वर ही थे । यह चरा- चर जगत् उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है और अन्तमें उन्हींमें लीन होता है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ यही श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है, इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं हो सकता, क्योंकि जहाँ अदृष्ट पदार्थके विषयमें शंका होती है वहाँ श्रुति ही प्रमाण मानी जाती है ॥ ३४ ॥ [ देखो, शास्त्रद्वारा प्रतिपादित होनेके कारण ही ] सर्वत्र मणि और मन्त्रादिसे प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ देखी जाती हैं। इन मणि-मन्त्रा- दिके महान् प्रभावको कोई अल्पबुद्धि जीव नहीं जान सकता ॥ ३५ ॥ इसलिये सर्वज्ञ परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ वेद ही सबसे बड़ा प्रमाण है । उसमें कहा है कि जगत्की रचनासे पूर्व एक परमात्मा ही था ॥ ३६ ॥