त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः। १४६ स्वात्मभित्तौ जगच्चित्रं विलासायावभासयत् । तथा स्वप्नमनोराज्ये कल्पितं स्वेन केवलम् ॥ २५ ॥ अहंत्वेनैव गृह्णाति देहं तद्वदयं जगत् । न ते रूपं यथा देहः स्वप्नव्यावृत्तिहेतुतः ॥ २६ ॥ तथास्य न जगद्देहो व्यावृत्तेः प्रलये ननु । देहादिव्यतिरिक्तस्त्वं यथा केवलचिन्मयः ॥ २७ ॥ एवं देवो जगच्छून्यचिदेकवपुरव्ययः । तेनेदं स्वात्मनि जगच्चित्रमुन्मीलितं ननु ॥ २८ ॥ कोन्मीलयेज्जगच्चित्रं स्वान्यस्य क्वाप्यसम्भवात् । ऋते चितिं कदाचिद्वा क्व किं भवितुमर्हति ॥ २९ ॥ यत्राभावश्चितेर्ब्रूयात्स देशो नैव सिध्यति । अभावश्च चितेः केन सिध्येदस्माच्चितिः परा ॥ ३० ॥ स्वतन्त्रताके उत्कर्ष की महिमासे ही केवल क्रीडाकौतुकके लिये अपने ही स्वरूपभूत पटपर इस जगत्-चित्रको भासित कर दिया ॥ २४-२५ पू० ॥ जिस प्रकार स्वप्नके मनोराज्यमें अपने ही द्वारा कल्पित देहको 'मैं' रूपसे ग्रहण कर लिया जाता है उसी प्रकार का यह जगत् है ॥ २५ उ०-२६ पू० ॥ किन्तु स्वप्नकी निवृत्ति होनेपर न रहनेके कारण जैसे यह देह वास्तवमें तुम्हारा स्वरूप नहीं है, उसी तरह प्रलयमें न रहनेके कारण यह जगत् भी परमेश्वरका शरीर नहीं है ॥ २६ उ०-२७ पू० ॥ जैसे तुम देहादिसे अतिरिक्त शुद्ध चिन्मात्र हो उसी प्रकार भगवान् भी जगत्से सर्वथा शून्य एकमात्र अविनाशी चित्स्वरूप ही हैं। उन्होंने अपने ही पर यह जगच्चित्र प्रकट कर लिया है ॥२७ उ०-२८॥ उनसे भिन्न और कोई कहीं है ही नहीं; अतः इस जगच्चित्रको और कहाँ प्रकट किया जाता ? उस चिन्मात्रके सिवा क्या कभी कोई कहीं हो सकता है ? ॥ २९ ॥ जहाँ चितिका अभाव बताया जायगा वह देश तो सिद्ध ही नहीं हो सकता, क्योंकि बिना चेतनके उस अभावकी सिद्धि किससे होगी। इसलिये चिति ही परतत्त्व है [ उसका निषेध नहीं हो सकता ] ॥३०॥