त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्माज्जागतकार्यस्य कारणं नोपलभ्यते अदृष्टे तु श्रुतिर्मूलं नान्यमानसुसङ्गमः ॥ २० ॥ प्रमातॄणामपूर्णत्वात्प्रमाणस्यानवस्थितेः । कार्यकार्तृवियोगस्य भूयोऽदर्शनहेतुतः ॥ २१ ॥ सकर्तृकं जगदिदं सम्भवाच्चेतनो हि सः । कार्यस्याचिन्त्यरूपस्य कर्त्ता साधारणः कथम् ॥ २२ ॥ तस्मादचिन्त्यशक्तिः स आगमस्तद्विमर्शनम् । पूर्णस्य त्वप्रतिहतं प्रमाणं सर्वतोधिकम् ॥ २३ ॥ तत्रैकस्तु महेशानः पुरा सृष्टेरुदाहृतः । स्वतन्त्रो ह्यनुपादानः स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ २४ ॥ इस प्रकार जगत् रूप कार्यका कोई भी दृष्ट कारण तो मिलता नहीं है। और अदृष्ट कारणका निर्णय करनेमें श्रुति ही मूल प्रमाण है, उससे भिन्न कोई और प्रमाण माननीय नहीं हो सकता ॥ २० ॥ क्योंकि प्रमाता जीव तो अपूर्ण हैं तथा किसी प्रमाणकी उस ( परोक्ष कारण ) में गति नहीं है। और ऐसा कभी देखा नहीं जाता कि कर्ताके बिना ही कार्य हो गया हो। इसलिये यह जगत् किसी कर्ताकी ही रचना है। और सम्भव होनेके कारण वह कर्ता चेतन ही होना चाहिये। तथा यह जगत्-रूप कार्य बड़ा विलक्षण है, इसलिये इसका कर्ता भी साधारण कैसे हो सकता है ? ॥ २१-२२ ॥ अतएव वह अचिन्त्यशक्ति-सम्पन्न है और उसके तत्त्वको बत- लानेवाला उसीका व्यापार है आगम ( वेद )। अतः वही उस पूर्ण- तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला सर्वथा अबाधित सबसे बड़ा प्रमाण है ॥ २३ ॥ उस आगममें कहा है कि सृष्टिसे पूर्व एकमात्र महेश्वर ही थे। उन परम स्वतन्त्र परमेश्वरमें बिना किसी अन्य सामग्रीके अपनी १. सृष्टिका कारण परोक्ष है, इसलिये उसमें किसी इन्द्रियकी गति न हो सकने के कारण वह प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय नहीं हो सकता। और अनुमान प्रत्यक्ष- मूलक होता है, अतः प्रत्यक्षकी गति न होनेके कारण उसमें अनुमानकी भी गति नहीं है। इसी प्रकार किसी अन्य प्रमाण का भी वह विषय नहीं है।