भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

१३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे त्यज ग्रन्थिं सन्निरुध्य पश्यामीति हृदि स्थिताम् । इदं नाहमिति ग्रन्थिमुन्मूल्य परां दृढाम् ॥ ३६ ॥ पश्य सर्वत्र चात्मानमखण्डानन्दबृंहितम् । पश्यात्मन्यखिलं लोकं दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ ३७ ॥ सर्वत्राखिलमात्मानमिति भूयो न भावयन् । शेषमभ्युपगम्यान्तःस्वस्थो भव निजात्मना ॥ ३८ ॥ इति प्रियोदितं श्रुत्वा हेमचूडः सिताशयः । विदित्वा पूर्णमात्मानं सर्वत्र भ्रान्तिवर्जितः ॥ ३९ ॥ क्रमात्पूर्णसमावेशासादनात्स्थिरभावनः । विहरन्सर्वदा हेमलेखादियुवतीगणैः ॥ ४० ॥ शासन् राज्यं समृद्धं स्वं जित्वा शत्रुगणं रणे । शास्त्राणि श्रावयन् शृण्वन्नर्जयन्धनसंचयम् ॥ ४१ ॥ त्कार करूँ' इस ग्रन्थिको आप त्याग दीजिये । 'मैं यह नहीं हूँ' इस अत्यन्त दृढ ग्रन्थिको भी काट डालिये ॥ ३५ उ०-३६ ॥ सर्वत्र अखण्डानन्दपूर्ण आत्मतत्त्वका दर्शन कीजिये । सम्पूर्ण प्रपञ्चको दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान अपने आत्मामें ही भासमान देखिये ॥ ३७ ॥ और फिर यह भावना भी मत कीजिये कि सर्वत्र केवल आत्मा ही है । इस प्रकार सम्पूर्ण भावनाओंके त्यागनेपर जो शेष रहे उसीको अपना स्वरूप जानकर अपने अकृत्रिम स्वरूपसे अभिन्न होकर स्थित रहिये' ॥ ३८ ॥ अपनी प्रियाका यह भाषण सुनकर हेमचूडका चित्त सर्वथा शुद्ध हो गया । आत्माको सर्वत्र पूर्ण जानकर उसकी सम्पूर्ण भ्रान्ति निवृत्त हो गयी [ अब उसे निरोध आदि किसी अवस्था विशेषका आग्रह नहीं रहा ] ॥ ३९ ॥ क्रमशः परमात्माके परिपूर्ण स्वरूपमें दृढ भावना होनेसे उसकी स्थिर स्थिति हो गयी । अब वह सर्वदा हेमलेखा आदि युवतियोंके साथ विहार करते हुए, शत्रुसमूहको युद्धमें जीतकर ऐश्वर्यसम्पन्न राज्यका शासन करते हुए, शास्त्र श्रवण करने और कराने हुए तथा धनसंचय करके