भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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१३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यद्वशादेष संसार आततो दुष्प्रतिक्रियः । तथा जगत्यनात्मत्वबुद्धिर्भानसमाश्रये ॥ २५ ॥ एवं जीवेशभेदादिनिश्चया ग्रन्थयो मताः । एतच्चिरात्समुद्भूतं भूयः संवर्धितं च वै ॥ २६ ॥ ग्रन्थिरूपसमापन्नं पुरुषः पाशितस्ततः । तद्ग्रन्थिविस्रंसनतो बन्धान्मुक्तिः समीरिता ॥ २७ ॥ यत्त्वं निमील्य नेत्रे स्वे पदमासादयस्यलम् । तत्पदं निजरूपं ते शुद्धसंविदनुत्तरम् ॥ २८ ॥ तदेवाखिलसंसारचित्रादर्शतलं महत् । कदा क्व केन रूपेण नास्ति तन्मे निरूपय ॥ २९ ॥ यदा यद्रूपतो यस्मिन्नेति ब्रूयाः स्वसंविदम् । तर्हि तत्कालदेशादेर्वन्ध्यापुत्रत्वमेव हि ॥ ३० ॥ जिसके कारण इस संसारका विस्तार हुआ है, जिससे छुटकारा पाना बड़ा ही कठिन है। तथा [ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान ] केवल भानके आश्रय खड़े हुए इस संसारमें अनात्मबुद्धि होना [ दूसरी ग्रन्थि है ] ॥ २५ ॥ इसी प्रकार जीव और ईश्वरमें भेद-निश्चय करना आदि अन्य ग्रन्थियाँ मानी गयी हैं। यह स्वरूपका अज्ञान अनादिकालसे उत्पन्न और बार-बार उलझकर ग्रन्थिरूप हो गया है। उसीसे यह पुरुष बँधा हुआ है। उस ग्रन्थिके कट जानेसे ही जीवकी बन्धनसे मुक्ति कही जाती है ॥ २६-२७ ॥ अपने नेत्रोंको मूँदकर आपने जो पूर्णपद प्राप्त किया है वह तो आपका अपना ही स्वरूप है और वह सम्पूर्ण अनात्मवर्गका निषेध करनेपर बचनेवाली शुद्ध संवित् ही है ॥ २८ ॥ वही इस सम्पूर्ण संसार-चित्रको प्रतिबिम्बित करनेवाला महान् दर्पण है। मुझे बताइये तो, वह कब, कहाँ और किस रूपमें नहीं है? ॥ २९ ॥ आप जिस काल, जिस रूप और जिस देशमें उस आत्मसंवित्का अभाव बतलायेंगे तब वे देश और कालादि तो वन्ध्यापुत्रके समान अलीक सिद्ध होंगे ॥ ३० ॥