भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मृत्युरप्यात्मतां याति यस्मात्तुष्टाद्गुरोर्नृनु । ममाकाण्डादेव गुरुः सोऽद्य तुष्टो महेश्वरः ॥ १६ ॥ मन्ये सर्वं मया प्राप्तमित्येव कृपया गुरोः । नाथ माहात्म्यमखिलं श्रुतं त्वत्कृपयाधुना ॥ १७ ॥ तामुपासितुमिच्छामि त्रिपुरां परमेश्वरीम् । तदुपास्तिक्रमं ब्रूहि मह्यं सुकृपया गुरो ॥ १८ ॥ इति सम्प्रार्थितो दत्तगुरुरालक्ष्य भार्गवे । योग्यतां त्रिपुरोपास्तौ सच्छ्रद्धाभक्तिबृंहिताम् ॥ १९ ॥ क्रमेण दीक्षयामास त्रिपुरोपास्तिहेतवे । जामदग्न्योऽपि सम्प्राप्य त्रैपुरं दीक्षणं शुभे ॥ २० ॥ सर्वदीक्षासमधिकं पूर्णतत्त्वप्रबोधनम् । मन्त्रयन्त्रवासनाभिरन्वितमखिलं क्रमम् ॥ २१ ॥ तथा जिन सद्गुरुदेवके प्रसन्न होनेपर मृत्यु भी अपना आत्मा ही हो जाता है, आज वे मेरे शिवस्वरूप गुरुदेव अकारण ही मुझपर प्रसन्न हैं ॥ १६ ॥ उन गुरुदेवकी कृपासे, मुझे ऐसा जान पड़ता है, आज सभी पदार्थ मुझे प्राप्त हो गये हैं। हे नाथ ! आपकी कृपासे अब मैंने श्रीत्रिपुरादेवीका माहात्म्य तो सारा सुन लिया ॥ १७ ॥ अतः मैं उन भगवती त्रिपुराकी उपासना करना चाहता हूँ। गुरुदेव ! आप कृपा करके मुझसे उनकी उपासनाका क्रम कहिये' ॥ १८ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने देखा कि त्रिपुरादेवीके प्रति श्रद्धा और भक्तिकी अधिकताके कारण वे उनकी उपासनाके अधिकारी हो गये हैं। अतः उन्होंने क्रमशः त्रिपुरोपासनाके लिये उन्हें दीक्षा दी ॥ १८-२० पू० ॥ इस प्रकार शुभ मुहूर्त्तमें परशुरामजीने त्रिपुरोपासनाकी दीक्षा प्राप्त की, जो सभी प्रकारकी दीक्षाओंसे श्रेष्ठ है और पूर्णतत्त्वका बोध करानेवाली है। जिस प्रकार भौंरा कमलसे रस ग्रहण करता है