त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः । ३ प्राप्य श्रीगुरुवक्त्राब्जाद्रसं मधुकरो यथा । तृप्तान्तरङ्ग आनन्दमादितो भार्गवस्तदा ॥ २२ ॥ श्रीनाथेनाभ्यनुज्ञातस्त्रिपुरासाधनोद्यतः । परिक्रम्य गुरुं नत्वा महेन्द्राद्रिमुपाययौ ॥ २३ ॥ तत्र निर्माय वसतिं शुभामतिसुखावहाम् । अभूदुपासनपरो वर्षद्वादशकं तदा ॥ २४ ॥ नित्यनैमित्तिकपरः पूजाजपपरायणः । सदा श्रीत्रिपुरेशान्या मूर्तिध्यानैकतत्परः ॥ २५ ॥ एवं तस्यात्यगात्कालो द्वादशाब्दो निमेषवत् । अथैकदा सुखासीनो जामदग्न्योऽनुचिन्तयत् ॥ २६ ॥ पुरा यत्प्राह संवर्तो मया स्वभ्यर्थितः पथि । तन्मया नैव विदितमंशेनापि तदा ननु ॥ २७ ॥ उसी प्रकार उन्होंने गुरुदेवके मुखकमलसे मन्त्र, यन्त्र और वासना आदि भावोंसे युक्त उपासनाका सभी क्रम प्राप्त किया ॥२० उ०-२२ पू०॥ इससे उनका अन्तःकरण तृप्त हो गया और वे आनन्दातिरेकसे मस्त हो गये। फिर त्रिपुरादेवीको सिद्ध करनेके लिये उद्यत हो उन्होंने गुरुदेवकी आज्ञा ली, चलते समय परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया और फिर महेन्द्रपर्वतपर चले आये ॥ २२ उ०-२३ ॥ वहाँ उन्होंने एक सुन्दर और अत्यन्त आनन्ददायिनी कुटिया बनायी और फिर बारह वर्षोंके लिये त्रिपुरादेवीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ २४ ॥ वे विधिवत् नित्य-नैमित्तिक कार्योंका अनुष्ठान करते, पूजा और मन्त्रजपमें तत्पर रहते तथा सर्वदा ही एकमात्र भगवती त्रिपुराके स्वरूपका ध्यान करते रहते ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनका बारह वर्षका समय एक निमेषके समान व्यतीत हो गया। तब एक दिन आनन्दसे बैठे हुए वे जमदग्निनन्दन सोचने लगे ॥ २६ ॥ पहले कभी मार्गमें चलते हुए मेरे प्रश्न करनेपर मुझसे महर्षि संवर्तने जो बात कही थी वह उस समय मेरी समझमें कुछ भी नहीं आयो ॥ २७ ॥