भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विस्मृतश्च मया यस्मात्प्राङ् न पृष्टं गुरुं प्रति । माहात्म्यं त्रिपुराशक्तेः श्रुतं श्रीगुरुवक्त्रतः ॥ २८ ॥ परन्तु तन्न विदितं यत्संवर्त्तः पुराऽब्रवीत् । मया सृष्टिप्रसङ्गेन पृष्टं किञ्चिद्गुरुं प्रति ॥ २९ ॥ तदा कटकृदाख्यानं वर्णयित्वा च मे गुरुः । नाब्रवीदप्रकृततस्तन्मे तत्तादृशं स्थितम् ॥ ३० ॥ लोकस्य गतिमेतान्तु न जानाम्यपि लेशतः । कस्मादिदं समुदितं जगदाडम्बरं महत् ॥ ३१ ॥ कुत्र वा गच्छति पुनः कुत्र संस्थानमृच्छति । अस्थिरन्तु प्रपश्यामि सर्वं सर्वत्र किञ्चन ॥ ३२ ॥ व्यवहारः स्थिरप्रायः कस्मादेतदपीदृशम् । चित्रां जगत्प्रवृत्तिं प्रपश्याम्यविमर्शिनीम् ॥ ३३ ॥ फिर मैं उसे भूल गया, इसलिये गुरुजीसे भी नहीं पूछा। हाँ, गुरुदेवके मुखारविन्दसे मैंने भगवती त्रिपुराका माहात्म्य अवश्य सुना ॥ २८ ॥ परन्तु जो बात पहले संवर्तजीने कही थी वह मुझे तब भी मालूम नहीं हुई। मैंने गुरुजीसे भी सृष्टिके प्रसंगमें कुछ पूछा तो अवश्य था ॥ २९ ॥ तब उन्होंने इसे कटकृत् आख्यान¹ बतलाकर अप्रासंगिक होनेके कारण इस विषयमें कुछ भी नहीं कहा और यह बात वहीं रह गयी ॥३०॥ किन्तु मुझे लोककी इस गति-विधिका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। यह इतना बड़ा विश्वप्रपञ्च कहाँ से खड़ा हो गया ॥ ३१ ॥ कहाँ यह जा रहा है और कहाँ जाकर स्थिर होगा। जहाँ भी जो कुछ है वह सभी मुझे अस्थिर दिखायी देता है ॥ ३२ ॥ [ और जब सभी पदार्थ अस्थिर हैं तब उनके आश्रित रहनेवाला 'यह मेरा है, यह तेरा है' ] इस प्रकारका व्यवहार भी कैसे स्थिर हो १. 'कटकृत्' कहते हैं चटाई बुननेवालेको। वे चटाई बुनते हुए जैसे जहाँ- वहाँकी अनेकों अप्रासंगिक बातें करते रहते हैं उसी प्रकार प्रस्तुत विषय न होनेके कारण उस समय श्रीदत्तात्रेयजीने सृष्टिविषयक चर्चाको 'कटकृत् आख्यान' कहा ।