भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 404 में से

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पृष्ठ 196

१८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वभावतस्तु शोचामि कारणं तत्र नाविदम् । प्रपन्नस्त्वामहं दीनः किमिदं भगवन् वद ॥ ४६ ॥ सर्वे शोचन्ति यत् कस्मिन्नपि बन्धौ मृते सति । न स्वात्मानं विजानन्ति नाऽन्यं शोचन्ति चैव हि ॥ ४७ ॥ एतन्मे ब्रूहि भगवन् शिष्याय तव वै स्फुटम् । इति पृष्टो मुनिसुतो महासेनमथाऽब्रवीत् ॥ ४८ ॥ राजन् शृणु महादेव्या मायया मोहिता जनाः । स्वात्मानमविदित्वाैव व्यर्थं शोचन्ति सर्वदा ॥ ४९ ॥ यावन्न विदितं स्वात्मसतत्त्वं तावदेव वै । जनाः शोचन्ति विज्ञाय भूयः शोचन्ति न क्वचित् ॥ ५० ॥ यथा निद्रामोहितात्मा स्वमविज्ञाय शोचति । ऐन्द्रजालिकमन्त्रोत्थमायया मोहितो नरः ॥ ५१ ॥ तत्प्रकल्पितसर्पादिभीत्या यद्वद्धि शोचति । सका कि मैं कौन हूँ। मैं केवल स्वभाववश ही शोक कर रहा हूँ, किन्तु उसका कारण नहीं जानता। मैं दीन आपकी शरणमें हूँ। भगवन् ! बताइये, यह सब क्या रहस्य है ॥ ४४ उ०-४६ ॥ कोई भी सम्बन्धी मर जाता है तो सभी लोक शोक किया करते हैं। वे भी न तो अपने स्वरूपको जानते हैं और न दूसरेके ही स्वरूप- को। तथापि शोक करते ही हैं ॥ ४७ ॥ भगवन् ! मैं आपका शिष्य हूँ। यह बात आप मुझे स्पष्ट समझा दीजिये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने महासेनसे कहा—॥४८॥ “राजन् ! सुनो, देवी महामायाके कारण मोहमें पड़े हुए लोग अपने वास्तविक स्वरूपको न जानकर सर्वदा व्यर्थ ही शोक किया करते हैं ॥ ४९ ॥ जबतक आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता तभीतक लोगोंको शोक होता है। उसको जान लेनेपर तो फिर कभी शोक नहीं होता ॥ ५० ॥ जिस प्रकार निद्रासे मूर्च्छित हुआ पुरुष [ स्वप्नावस्थामें कल्पित अनर्थकी आशंकासे ] अपनेको न जाननेके कारण ही शोक करने लगता है, तथा किसी मायावीकी मन्त्रजनित मायासे मोहित हुआ पुरुष मायाकल्पित सर्पादिके भयसे शोकाकुल हो उठता है,

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