त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः। १८३ तथैव मायया मुग्धः स्वमज्ञात्वा प्रशोचति ॥ ५२ ॥ यथा स्वप्नात् प्रबुद्धो वा ज्ञातैन्द्रजालिकागमः । न शोचति क्वचिच्चान्याञ्छुचा युक्तान् हसत्यपि ॥ ५३ ॥ एवं स्वात्मविदो मायामुक्ताः शोचन्ति न क्वचित् । शोचतस्त्वादृशान् मायामूढान् प्रविहसन्ति च ॥ ५४ ॥ तत्त्वं विज्ञाय्यात्मतत्त्वं मायामुत्तीर्य दुर्गमाम् । जहि शोकं महाबाहो ! मोहोत्थं सद्विमर्शनात् ॥ ५५ ॥ इत्युक्तः पुनरप्याह महासेनो मुनीश्वरम् । भगवन् यस्त्वया प्रोक्तो दृष्टान्तो विषमः स हि ॥ ५६ ॥ स्वाप्नो वा मायिको वाऽपि शून्यात्मा भासते परम् । अयं जाग्रत्प्रपञ्चस्तु सत्यः सर्वार्थसाधकः ॥ ५७ ॥ अबाधितः स्थिरश्चापि कथं स्वाप्नसमो भवेत् । उसी प्रकार मायासे मुग्ध हुआ पुरुष अपनेको न जाननेके कारण ही शोक करता है ॥ ५१-५२ ॥ जैसे स्वप्नसे जगा हुआ तथा इन्द्रजालविद्याको जाननेवाला पुरुष कभी शोक नहीं करता, प्रत्युत अन्य शोकयुक्त पुरुषोंको देखकर हँसता भी है, इसी प्रकार आत्मतत्त्वको जाननेवाले मायामुक्त महापुरुष कभी शोक नहीं करते, प्रत्युत तुम-जैसे शोक करनेवाले मायामुग्ध पुरुषको देखकर हँसते हैं ॥ ५३-५४ ॥ अतः तुम आत्मतत्त्वको जानकर इस दुर्गम मायाको पार कर लो और हे महाबाहो ! सत्स्वरूप आत्मतत्त्वका विचार करके इस मोहजनित शोकको दूर कर दो" ॥ ५५ ॥ इस प्रकार कहे जानेपर महासेनने पुनः उन मुनिराजसे कहा, “भगवन् ! आपने जो स्वप्न और इन्द्रजालका दृष्टान्त दिया वह तो यहाँ ठीक नहीं बैठता ॥ ५६ ॥ स्वप्न और मायाका जो प्रपञ्च होता है वह तो पीछे शून्यरूप ही भासता है। किन्तु यह जाग्रत् प्रपञ्च तो सत्य और सब प्रकारके प्रयोजनोंकी पूर्ति करनेवाला है। इसका कभी बाध (मिथ्यात्व निश्चय) नहीं होता और यह स्थिर भी है। फिर यह स्वप्नके समान कैसे