त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे इत्युक्तः पुनराचख्यौ मुनिपुत्रोऽतिबुद्धिमान् ॥ ५८ ॥ शृणु राजन् ! यच्चयोक्तं दृष्टान्तो विषमस्त्विह । एष मोहो द्वितीयस्ते स्वप्ने स्वाप्नस्य यादृशः ॥ ५९ ॥ स्वाप्नवृक्षोऽपि तत्काले किं न साधयते हितम् । पान्थानां किं न हरति तापं छायाप्रदानतः ॥ ६० ॥ फलाद्यैः स्वाप्नमर्त्यादीन्न तर्पयति किं वद । स्वप्ने क बाधितः स्वाप्नः कास्थिरश्चोपलक्षितः ॥ ६१ ॥ अखिलं बाधितं जाग्रद्दशायामिति चेच्छृणु । जाग्रत्प्रपञ्चोऽपि सर्वः सुपुप्तौ किं न बाधितः ॥ ६२ ॥ न बाधितः परदिनेऽप्यनुवृत्तेस्तथेति चेत् । स्वाप्नस्यापि परदिने नाऽनुवृत्तिः क वा वद ॥ ६३ ॥ हो सकता है ?” उसके ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् मुनिपुत्रने कहा—॥ ५७-५८ ॥ “राजन् ! सुनो, तुमने जो कहा कि स्वप्न और इन्द्रजालका दृष्टान्त यहाँ ठीक नहीं बैठता यह तुम्हें दूसरा भ्रम हो गया है, जैसे स्वप्नमें स्वाप्न पुरुषको [ रज्जु में सर्पादि प्रतीत होने की ] कोई दूसरी भ्रान्ति उत्पन्न हो जाय ॥ ५६ ॥ स्वप्नमें प्रतीत होनेवाला वृक्ष भी क्या स्वप्न-कालमें उपयोगी नहीं होता ? क्या उस समय छाया देकर वह यात्रियोंकी थकावट दूर नहीं करता ॥ ६० ॥ अथवा फलादि के द्वारा वह स्वप्नके मनुष्योंको तृप्त नहीं करता। भला, स्वप्नका पदार्थ कभी स्वप्नमें बाधित होता है अथवा कभी अस्थिर देखा जाता है ? ॥ ६१ ॥ यदि कहो कि [ स्वप्नमें भले ही बाधित न हो ] वह सब जाग्रत् दशामें तो बाधित हो ही जाता है, तो सुनो, क्या जाग्रत्का सारा प्रपञ्च सुषुप्तिमे बाधित नहीं हो जाता ॥ ६२ ॥ यदि कहो कि दूसरे दिन भी उसकी अनुवृत्ति होती है इसलिये उसका बाध नहीं होता, तो बताओ, क्या स्वप्नके पदार्थ दूसरे दिन अनुभवमें नहीं आते ? ॥ ६३ ॥