भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 200

१८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पर्वताम्बुधिभूमूख्या अप्येवं क्षणभेदिनः । अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि पश्य सूक्ष्मधिया नृप ! ॥ ७० ॥ परिच्छिन्नाऽनुवृत्तिर्हि समैव स्वाप्नजाग्रतोः । अपरिच्छिन्नाऽनुवृत्तिः कार्येष्वत्यन्तदुर्लभा ॥ ७१ ॥ अनुवृत्तिः कारणेन रूपेणास्ति हि सर्वदा । इति चेत्कारणं रूपं पृथिव्यादिमयं किल ॥ ७२ ॥ तच्चाऽनुवृत्तंस्वप्नेऽपि पृथिव्यादेर्हि भासनात् । अथ स्वाप्नस्य बाधो हि जाग्रति ह्यनुभूयते ॥ ७३ ॥ न जागरस्य बाधस्तु भासते कस्यचित् क्वचित् । इति चेच्छृणु वक्ष्यामि बाधो ह्यनवभासनम् ॥ ७४ ॥ सुषुप्तौ सर्वजगतोऽप्यनुभूतं ह्यभासनम् । अथ बाधो ह्यप्रमाणदर्शनं चेत्तदा शृणु ॥ ७५ ॥ अप्रमाणदर्शिनास्ति भ्रान्तानां त्वादृशां खलु । सर्वत्र परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार पर्वत और समुद्रादि भी क्षण-क्षण में बदलनेवाले हैं ॥ ६६-७० पू० ॥ अब मैं तुमसे जो कहता हूं उसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो। आंशिक अनुवृत्ति तो स्वप्न और जाग्रत्में समान रूपसे ही होती है। हाँ, कार्यवर्गमें सर्वांशमें अनुवृत्तिकी प्रतीति होनी तो अत्यन्त कठिन ही है ॥ ७० उ०-७१ ॥ यदि कहो कि कारणरूपसे तो जाग्रत्कालमें सर्वदा ही पदार्थोंकी अनुवृत्ति होती है, तो कारणका स्वरूप तो पृथिवी आदि पञ्चभूतमय ही है, सो वे तो स्वप्नमें भी अनुवृत्त होते ही हैं, क्योंकि वहाँ भी पृथिवी आदिका भान होता ही है ॥ ७२-७३ पू० ॥ यदि ऐसा कहो कि स्वप्नके पदार्थोंका तो जाग्रत्कालमें अभाव जान पड़ता है, किन्तु जाग्रत्कालका बाध कभी किसीको नहीं भासता—तो सुनो, इसका उत्तर देता हूं। 'बाध' का अर्थ है 'न भासना', सो सुषुप्तिमें तो सम्पूर्ण जगत्का 'न भासना' अनुभवमें आता है ॥ ७३ उ०-७४ पू० ॥ और यदि तुम 'बाध' का अर्थ 'अप्रमाण दर्शन'¹ करो तो सुनो, १. प्रमाणसे सिद्ध न देखना अर्थात् 'असत्य देखना' ।