भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

त्रयोदशोऽध्यायः। १८७ ज्ञातविज्ञेयतत्त्वाना मप्रामाण्यदृशिः स्फुटा ॥ ७६ ॥ तस्मादिदं दृश्यजालं स्वाप्नदृश्यसमस्थिति । दीर्घकालोऽपि च स्वप्ने भासते निर्विशेषतः ॥ ७७ ॥ तस्मादबाधितो ह्यर्थक्रियाकारी स्थिरोऽपि च । स्वाप्नभावस्तेन तुल्यो जाग्रद्भावोऽपि सर्वशः ॥ ७८ ॥ यथा जाग्रति जाग्रत्त्वं गृहीतं जागरे स्फुटम् । स्वप्नेऽपि जागरत्वं तु गृहीतं तद्वदेव हि ॥ ७९ ॥ एवं स्थिते कुतो राजन् विशेषः स्वप्नजाग्रतोः । तत्स्वाप्नान्निजबन्धूंस्त्वं न हि शोचसि वै कुतः ॥ ८० ॥ केवलं भावनामात्रात् सत्यता जगति स्थिता । शून्यताभावनेनाऽपि शून्यं निष्प्रतिघं भवेत् ॥ ८१ ॥ तुम-जैसे भ्रान्त पुरुषोंको वह अप्रमाणदर्शन करनेकी दृष्टि प्राप्त नहीं है। जो महापुरुष ज्ञेयतत्त्वको पहचानते हैं उन्हें स्पष्ट ही यह अप्रमा- णदर्शनकी दृष्टि प्राप्त है ॥ ७५ उ०-७६ ॥ इसलिये यह दृश्यप्रपञ्च स्वप्नकालके दृश्यके समान ही है। स्वप्नमें भी समान रूपसे दीर्घकालकी प्रतीति होती ही है ॥ ७७ ॥ अतः स्वप्नकालमें स्वप्नसृष्टि भी बाधित न होनेवाली, प्रयोजन- की पूर्ति करनेवाली और स्थिर ही है। जाग्रत्सृष्टि भी सर्वथा उसके समान ही है ॥ ७८ ॥ जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें ‘यह जाग्रत् है’ ऐसा भान स्पष्ट होता है उसी प्रकार स्वप्नावस्थामें भी जागृतिका ग्रहण होता ही है। [ अर्थात् उस समय भी यही जान पड़ता है कि यह जाग्रत् है ] ॥ ७९ ॥ राजन् ! ऐसी स्थितिमें भला, जाग्रत् और स्वप्नका अन्तर कहाँ है ? फिर तुम अपने स्वप्नावस्थाके सम्बन्धियोंके लिये शोक क्यों नहीं करते हो ? ॥ ८० ॥ केवल भावनासे ही संसारमें सत्यता बनी हुई है। यदि इसमें शून्यताकी भावना की जाय तो यह शून्य और निष्प्रतिघ ( सब प्रकार की रुकावटसे रहित ) जान पड़ेगा ॥ ८१ ॥