त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भावना ह्यप्रमाणत्ववैधुर्येण स्थिरीकृता । भवेत्तदात्मभावेन सत्यमेतन्महीपते ! ॥ ८२ ॥ निदर्शनं त्वत्र चेदं यज्जगद् दृष्टमेव ते । इमं शैलं परिक्रम्य यौ हि पश्याव सम्प्रति ॥ ८३ ॥ इत्युक्त्वा नृपतिं हस्ते गृहीत्वा परिचक्रमे । परिक्रम्य गण्डशैलं राज्ञा सह समेत्य तु ॥ ८४ ॥ पुनः प्राह महासेनं मेधावी मुनिनन्दनः । राजन् ! दृष्ट एष शैलः पादगव्यूतिमात्रकः ॥ ८५ ॥ दृष्ट श्वास्य गर्भे ते लोकः सुविततः स्फुटः । एष जाग्रदुत स्वप्नः सत्यो मिथ्यात्मकोऽपि वा ॥ ८६ ॥ शैललोके यदिनेकं तदत्र द्वादशाऽर्बुदाः ! वत्सरास्त्वनुभूतास्ते सत्यासत्ये विवेचय ॥ ८७ ॥ विवेचनं नास्य भवेत् स्वप्नयोर्भिन्नयोरिव । वह भावना इसमें अप्रमाणत्व (असत्यत्व) बुद्धि न होनेके कारण पुष्ट हो गयी है। राजन् ! आत्मभाव होनेपर तो यह सचमुच भावना ही जान पड़ेगी ॥ ८२ ॥ इस समय तुमने जो संसार देखा है वह इसमें दृष्टान्त है। [यदि इच्छा हो तो] इस पर्वतकी परिक्रमा करके अब पुनः देख लें” ॥ ८३ ॥ ऐसा कहकर मुनिपुत्रने राजाका हाथ पकड़कर परिक्रमा की और राजाके साथ शिलाकी परिक्रमा कर उस महाबुद्धि मुनिपुत्रने महा- सेनसे पुनः कहा—॥ ८४-८५ पू० ॥ “राजन् ! देखा, यह पहाड़ी केवल चौथाई गव्यूतिमात्र है, किन्तु इसके भीतर स्पष्ट ही तुमने विस्तृत संसार देखा था। यह जाग्रत् था या स्वप्न, सत्य था या मिथ्या ?” ॥ ८५ उ०-८६ ॥ पहाड़ीके संसारमें जो एक दिन था वही यहाँ तुम्हारे अनुभवमें बारह अरब वर्ष हुए। इन दोनों अनुभवोंमें तुम सत्य और असत्यका निर्णय करो ॥ ८७ ॥ भिन्न-भिन्न दो स्वप्नोंके समान इनका विवेचन नहीं हो सकता। १. गव्यूति दो कोशको कहते हैं। अतः चौथाई गव्यूति ‘आधा कोश’ हुई।