भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

चतुर्दशोऽध्यायः। १६३ एक एव हि सर्वस्य प्रकाशो द्विविधः स्थितः । दिवान्धानामान्धकार इतरेषां तु भासकः ॥ १९ ॥ जलं मनुष्यपश्वादेः श्वासस्य प्रतिरोधकम् । मत्स्यादीनां बहिः श्वासप्रतिरोधो जले न हि ॥ २० ॥ अग्निर्दहति मर्त्यादींस्तं भक्षयति तित्तिरिः । वह्निर्नश्यति तोयेन स जले ज्वलति क्वचित् ॥ २१ ॥ एवं सर्वे जागतास्तु भावा द्वैरूप्यतः स्थिताः । एवं सेन्द्रियधृत्तान्तास्त्वन्ये कैऽपि निरिन्द्रियाः ॥ २२ ॥ स्वभावतो विरुद्धा वै शतशोऽथ सहस्रशः । अत्रोपपत्तिं वक्ष्यामि समाहितमनाः शृणु ॥ २३ ॥ एते हि चाक्षुषा भावाश्चक्षुर्विंकृतिमात्रकाः । न चाक्षुपादंशतोऽन्यद् दृश्यमस्ति क्वचिद्बहिः ॥ २४ ॥ प्रकाश सबके लिये एक ही होता है, किन्तु वह दो रूपमें ज्ञान पड़ता है। उल्लू आदि दिनमें अन्धे रहनेवाले जीवोंको वह अन्धकाररूप है तथा दूसरोंको ज्योतिस्वरूप ॥ १९ ॥ जल मनुष्य और पशु आदिके लिये तो साँस लेनेमें बाधा डालने- वाला है, किन्तु मत्स्यादिका श्वास बाहर निकलनेपर तो घुटता है पर जलमें नहीं ॥ २० ॥ अग्नि मनुष्यादिकों तो जला देती है, पर तीतर उसे खा जाता है। तथा आग बाहर होनेपर तो जलसे बुझ जाती है, किन्तु कहीं बड़वानल कुण्डादिमें वह जलमें रहती भी है ॥ २१ ॥ इस प्रकार जगत्के सभी पदार्थ दो रूपोंमें स्थित हैं। इसी प्रकार कुछ पदार्थ तो ऐसे हैं जो इन्द्रियोंसे जाने जा सकते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो इन्द्रियोंके विषय नहीं होते ॥ २२ ॥ इस तरह सैकड़ों-हजारों पदार्थ परस्पर स्वभावसे विरुद्ध हैं। मैं इसकी उपपत्ति बतलाता हूँ, सावधान चित्तसे सुनो ॥ २३ ॥ ये नेत्रोंसे प्रतीत होनेवाले पदार्थ केवल नेत्रके विकार ही हैं। नेत्रों- का दृश्य नेत्रोंके अंशसे भिन्न बाहर और कहीं कुछ भी नहीं होता ॥२४॥