भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विश्वकर्ममुखानां च वरप्राप्त्या हि साऽऽभवत् । सङ्कल्पिते तथा भाव्यं पूर्वविस्मरणे सति ॥ १३ ॥ स्थिरं तावद्भवत्येव यावत् पूर्वं न हि स्मरेत् । एवमेव निर्विकल्पभावना यदि सुस्थिरा ॥ १४ ॥ अनिच्छया विकल्पस्य यावत् सम्भेदनं न हि । तावत् सा भावना सिद्धा साधयेद्वै महाफलम् ॥ १५ ॥ सम्भेदात्तु विकल्पेन न सिद्धा तव भावना । भावनां साधय क्षिप्रं यदि स्रष्टुं समीहसि ॥ १६ ॥ शृणु राजन् ! देशकालद्वैविध्यं वदतो मम । अव्युत्पन्नोऽसि लोकस्य व्यवहारे ह्यतस्तव ॥ १७ ॥ एतच्चित्रं भासते वै शृणु सम्यग् ब्रवीमि ते । जगद्भावस्वभावोऽयं विविधत्वेन भासनम् ॥ १८ ॥ देवताओंको, योगसे योगियोंको, तपसे तपस्वियोंको मन्त्रसे मान्त्रिकोंको और वरसे विश्वकर्मा आदिको प्राप्त हुई थी ॥ ११ उ०-१३ पू० ॥ संकल्प ऐसा होना चाहिये कि मैं संकल्प कर रहा हूँ—इस पूर्व- संकल्पकी भी स्मृति न रहे। ऐसा संकल्प तबतक स्थिर रहता है जबतक कि पूर्वसंकल्प न फुरे ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥ इस प्रकार ही जब निर्विकल्प भावना अच्छी तरहसे स्थिर हो जाती है और इच्छा न होनेके कारण ही जबतक उससे विकल्पका संसर्ग नहीं होता, तबतक वह सिद्ध भावना बड़ा भारी फल प्रदान करती रहती है ॥ १४ उ०-१५ ॥ विकल्पका सम्पर्क रहनेके कारण ही तुम्हारी भावना सिद्ध नहीं हुई है। अतः यदि तुम सृष्टिरचना करना चाहते हो तो तुरन्त ही अपनी भावनाको सिद्ध करो ॥ १६ ॥ राजन् ! सुनो, अब मैं इस लोक और शैललोकके देश-कालोंकी द्विविधताका रहस्य बतलाता हूँ। क्योंकि तुम लोकव्यवहारको ठीक-ठीक नहीं समझते हो इसीसे तुम्हें यह बात विचित्र जान पड़ती है। मैं तुम्हें यह स्पष्ट करके समझाता हूँ, सुनो। इस तरह अनेक रूपसे भासना तो जगत्का स्वभाव ही है ॥ १७-१८ ॥