त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः। ' १६१ तत्राऽसत्यमन्यतरत् कतमं तन्ममेरय । इति पृष्टो मुनिसुतः प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ६ ॥ सङ्कल्पो भावना प्रोक्ता सिद्धाऽसिद्धेति सा द्विधा । सिद्धिर्विकल्पासम्भेदो(ऽ)विकल्पस्त्वेकनिष्ठितेः ॥ ७ ॥ ब्रह्मभावनया पश्य जातं जगदिदं ननु । एतत् सर्वैः सत्यरूपं भावितं सुदृढत्वतः। ८ ॥ तथा स्वसङ्कल्पभवे नास्ति कस्याऽपि भावना । विकल्पसम्भेद एषोऽसिद्धा तस्माद्विभावना ॥ ९ ॥ भावनायाः सिद्धिरत्र बहुधा संस्थिता भवेत् । जन्मना मणिना तद्वदौषधेन च योगतः ॥ १० ॥ तपसा मन्त्रसिद्ध्या च वरेण च भवेन्नृपः । जन्मना ब्रह्मणः सा वै मणिना यक्षरक्षसाम् ॥ ११ ॥ औषधेन तु देवानां योगिनां योगतो भवेत् । तपसा तापसानां सा मान्त्रिकाणां तु मन्त्रतः ॥ १२ ॥ इनमें एक तो असत्य होगा ही, सो कौन-सा है—यह मुझे बतला- इये।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥ “भावना संकल्पको ही कहते हैं और वह सिद्ध एवं असिद्ध दो प्रकारकी होती है। जिस भावनामें विकल्प (संशय) का संश्लेष नहीं होता वह सिद्ध होती है, विकल्प न होनेका अर्थ है किसी एकमें लग जाना ॥ ७ ॥ इस संसारको तुम निश्चय ही ब्रह्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ समझो। अत्यन्त दृढ़ताके कारण सबने इसे सत्य मान रखा है ॥ ८ ॥ तथा तुम्हारे अपने संकल्पसे उत्पन्न हुए संसारमें किसी दूसरेकी सत्यत्व भावना नहीं होती ! अतः इसमें [यह सत्य नहीं है] ऐसे तुम्हारे ही विकल्पका मेल रहनेके कारण यह भावना सिद्ध नहीं होती ॥ ९ ॥ यहाँ भावनाकी सिद्धि अनेक प्रकारसे होती है। राजन् ! यह भावनासिद्धि जन्मसे, मणिसे, ओषधिसे, योगसे, तपसे, मन्त्रसिद्धिसे तथा वरके द्वारा भी हो सकती है ॥ १०-११ पू० ॥ यह जन्मके द्वारा ब्रह्माको, मणिसे यक्ष और राक्षसोंको, ओषधिसे