त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः। १६५ एवं घ्राणादीन्द्रियाणामंशा गन्धादयोऽपि हि ॥ ३१ ॥ मानसाश्च मनोमात्रास्तथैवाऽखिलजगतः । क्रमोऽप्यक्षस्वभावोत्थस्ततः किञ्चिद् बहिर्न हि ॥ ३२ ॥ शृणु राजन् ! बहिरिति यल्लोके भाति केवलम् । तदाद्यं सर्वजगतां जगच्चित्रस्थभित्तिवत् ॥ ३३ ॥ तस्य वाह्यस्य वक्तव्यमपादानं ध्रुवं ननु । शरीरं स्यादपादानं नेतरद्भवितुं क्षमम् ॥ ३४ ॥ तस्याऽपि बहिराभासादपादानं कथं नु तत् । पर्वताद् बहिरित्युक्ते पर्वतो न बहिर्भवेत् ॥ ३५ ॥ यथा घटो भासते हि प्राहुस्तद्वच्छरीरकम् । भासकाद् बहिरित्येवं वक्तुं वाऽपि न सम्भवेत् ॥ ३६ ॥ दीपसूर्यालोकबहिर्गतान्तं न हि भासनम् । इसी तरह गन्धादि भी घ्राणादिके ही अंश हैं तथा सम्पूर्ण जगत्के जो मानसिक भाव हैं वे सब मनोमात्र हैं। एवं देश-काल और बड़े- छोटे आदिका जो क्रम है वह भी इन्द्रियस्वभावके ही अन्तर्गत है, उससे बाहर कुछ नहीं है ॥ ३१ उ०-३२ ॥ राजन् ! सुनो, लोकमें जो 'बाहर' इस तरह भास रहा है वही सम्पूर्ण जगत्का मूल है और इस जगत्-रूप चित्रकी भित्तिके समान है ॥ ३३ ॥ किन्तु 'उस 'बाह्य' का कोई निश्चित अपादान १ भी तो बनाना चाहिये। [ तब यही कहना होगा कि ] वह अपादान शरीर ही है, और कोई वस्तु तो हो नहीं सकती ॥ ३४ ॥ किन्तु वह शरीर भी तो बाहर ही भासता है। ऐसी अवस्थामें यह कैसे अपादान हो सकता है ? क्योंकि यदि 'पर्वतसे बाहर' ऐसा कहें तो पर्वत तो बाहर नहीं माना जायगा। पर शरीर तो जिस प्रकार घट भासता है उसी प्रकार भासनेवाला कहा जाता है ॥ ३५-३६ पू० ॥ ऐसा भी कह नहीं सकते कि वह भासकसे बाहर है, क्योंकि जो वस्तु दीपक या सूर्यके प्रकाशसे बाहर होती है वह तो भासित ही नहीं हो १. 'अपादान' उसे कहते हैं जिससे वह बाह्य वस्तु बाहर है।