त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतस्तु भासकस्यान्तर्भास्यमस्तीति युज्यते ॥ ३७ ॥ भासकं तु न देहादिर्भास्यत्वात् पर्वतादिवत् । न सर्वथा यत्तु भास्यं भासकं तद्धि युज्यते ॥ ३८ ॥ भासकस्याऽपि भास्यत्वे भासकस्याऽनवस्थितिः । स्वस्यैव भासकत्त्वं च भास्यत्वं न हि युज्यते ॥ ३९ ॥ अतस्तु भासकं शुद्धं भासकैकस्वरूपकम् । तच्च भारूपमेवेह पूर्णमेकरसात्मकम् ॥ ४० ॥ तेन व्याप्ता देशकाला भासनात्तस्य पूर्णता । अभारूपस्य चाऽभानाद्भारूपैकरसं हि तत् ॥ ४१ ॥ सकती। अतः यही कहना ठीक है कि भासित होनेवाले पदार्थ भासकके अन्तर्गत ही होते हैं ॥ ३६ उ०-३७ ॥ देहादि भासक हो नहीं सकते, क्योंकि वे पर्वतादिके समान भासित होने वाले हैं। भासक तो वही हो सकता है जो किसी प्रकार भासित होनेवाला न हो ॥ ३८ ॥ यदि भासक भासित होनेवाला भी हो तो भासकका निर्णय करनेमें अनवस्था दोष उपस्थित होगा। और स्वयं वही अपना भासक तथा अपना ही भास्य हो नहीं सकता ॥ ३९ ॥ अतः जो भासक है वह एकमात्र शुद्ध भासकरूप ही है। वह केवल भारूप ( प्रकाशस्वरूप ), पूर्ण और एकरसात्मक है ॥ ४० ॥ उस भारूप भासकके द्वारा देश और काल भी व्याप्त हैं, क्योंकि उसीकी सत्तासे वे भासते हैं, इसीसे उसकी पूर्णता सिद्ध होती है। १. यदि भासक भासित होनेवाला भी माना जाय तो यह प्रश्न होगा कि वह किससे भासित होता है। उसका कोई भासक मानेंगे तो उसे भी भासित होने वाला मानना होगा और फिर उसके विषयमें भी यही प्रश्न होगा। अतः कोई भी चरम भासक सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसीको अनवस्था दोष कहते हैं। २. भास्य और भासकका प्रकारसे घटसे पटादिके भेदके समान भेद नहीं समझना चाहिये; प्रत्युत दर्पण और प्रतिबिम्बके समान उन दोनोंका अभेद है। जिस प्रकार दर्पणके बिना प्रतिबिम्बकी सत्ता ही नहीं होती उसी प्रकार चिन्मात्र आत्मासे व्यतिरिक्त दृश्य प्रपञ्चकी सत्ता ही नहीं है। अतः दृश्यरूपसे भी चिति ही प्रकाशित होती है। यही उसकी पूर्णता है।