त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः । १६७ अन्तर्बहिर्वा यत् किञ्चिद्भारूपोदरसंस्थितम् । अतस्तन्नापादानं स्यात् शृङ्गस्येव हि पर्वतः ॥ ४२ ॥ एवंविधं हि भारूपं ग्रस्तसर्वप्रपञ्चकम् । भाति स्वतन्त्रतः स्वस्मिन् सर्वत्राऽपि च सर्वदा ॥ ४३ ॥ एतत् परा चितिः प्रोक्ता त्रिपुरा परमेश्वरी । ब्रह्मेत्याहुर्वेदविदो विष्णुं वैष्णवसत्तमाः ॥ ४४ ॥ शिवं शैवोत्तमाः प्राहुः शक्तिं शक्तिपरायणाः । एतद्रूपादृते किञ्चिद् यदि ब्रूयुस्तदल्पकम् ॥ ४५ ॥ तया व्याप्तं तु चिच्छक्त्या दर्पणप्रतिबिम्बवत् । तस्य भास्यकृतं भासकत्वं च न स्वतः स्थितम् ॥ ४६ ॥ जो अप्रकाशरूप होगा उसका तो भान ही नहीं हो सकता। इसलिये वह एकरस प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ४१ ॥ भीतर और बाहर जो कुछ भी है वह सब उस प्रकाशस्वरूपके पेटमें ही स्थित है। इसलिये जैसे पर्वत अपने शिखरका अपादान नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह उसका अपादान नहीं हो सकता। [ तात्पर्य यह कि जिस प्रकार शिखरको पर्वतसे पृथक् या पर्वतसे बाहर नहीं कह सकते उसीप्रकार प्रपञ्चको प्रकाशस्वरूप चेतनसे पृथक् या बाहर नहीं कह सकते ] ॥ ४२ ॥ इस प्रकारके इस प्रकाशस्वरूपने सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपनेमें ग्रस्त किया हुआ है। वह सर्वदा सर्वत्र स्वतन्त्रतासे अपनेमें आप ही प्रकाश- मान है ॥ ४३ ॥ यह पराचिति ही भगवती त्रिपुरा कही गयी है। वैदिक विद्वान् इसीको ब्रह्म कहते हैं और वैष्णव विष्णु ॥ ४४ ॥ श्रेष्ठ शैव इसे शिव बताते हैं और शाक्त लोग शक्ति। इस चिद्रूपसे भिन्न जो कुछ कहा जायगा वह अपूर्ण ही होगा ॥ ४५ ॥ प्रतिबिम्ब जिस प्रकार दर्पणसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह सब उस चेतन शक्तिसे व्याप्त है। इसका जो भासकत्व है वह भास्यके कारण है, स्वतः नहीं ॥ ४६ ॥