त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भास्यं तु भाननिर्मग्नमादर्शे नगरादिवत् । दर्पणे नगरं यद्वद्दर्पणान्नातिरिच्यते ॥ ४७ ॥ तथा चिति जगद्भाति यत्तन्नैवातिरिच्यते । दर्पणात्मनि सम्पूर्णे निविडे चैकरूपिणि ॥ ४८ ॥ यथा हि भिन्नं नगरं सर्वथा नोपपद्यते । तथा पूर्णेऽस्तु निविडे चैकरूपे चिदात्मनि ॥ ४९ ॥ जगत् सर्वात्मना नैव ह्युपपत्तिं समश्नुते । आकाशस्त्ववकाशात्मा शून्यरूपत्वहेतुतः ॥ ५० ॥ द्वैतं जगत् प्रसहते सर्वत्रैव हि सर्वदा । सती चितिरशून्यात्मरूपिण्येकरसा कथम् ॥ ५१ ॥ द्वितीयलेशं प्रसहेदादर्शात्मवदञ्जसा । तस्मादादर्शवत् संवित् स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ ५२ ॥ भासयेदद्वितीये स्वे रूपे सर्वं चराचरम् । दर्पणमें दीखनेवाले नगर आदि जैसे दर्पणसे अभिन्न होते हैं वैसे ही सम्पूर्ण भास्यवर्ग अपने भासकसे अभिन्न है। दर्पणका नगर जैसे दर्पणसे भिन्न नहीं होता वैसे ही जिस जगत्को चिति प्रकाशित करती है वह चितिसे भिन्न नहीं है ॥ ४७-४८ पू० ॥ जिस प्रकार एकरूप घनीभूत एवं सम्पूर्ण ( अवकाशहीन ) दर्पणसे भिन्न उसमें प्रतिबिम्बित नगरकी सत्ता किसी प्रकार सम्भव नहीं है, उसी प्रकार एकरूप, घनीभूत एवं परिपूर्ण चिदात्मामें जगत्की पृथक् सत्ता किसी प्रकार नहीं हो सकती ॥ ४८ उ०-५० पू० ॥ आकाश तो अवकाशरूप और शून्यात्मक है, अतः उसमें तो सर्वदा सर्वत्र ही द्वैतरूप जगत् समा सकता है ॥ ५० उ०-५१ पू० ॥ किन्तु सत्यरूपा चिति, जो अशून्यात्मा एकरूपिणी और एक- रसा है, स्वभावसे ही दर्पणके समान किस प्रकार लेशमात्र द्वैतको भी सहन कर सकती है ? ॥ ५१ उ०-५२ पू० ॥ अतः वह चित् शक्ति अपने स्वातन्त्र्यरूप सामर्थ्यके प्रभावसे दर्पणके समान अपने ही अद्वितीय स्वरूपमें इस सम्पूर्ण चराचर