भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

चतुर्दशोऽध्यायः । १६६ निमित्तोपादानहीनं द्वितीयमतिचित्रितम् ॥ ५३ ॥ यथाऽनेकरूपविधे भासमानेऽपि दर्पणे । एकत्वं भासते स्पष्टमविशेषाददूषितम् ॥ ५४ ॥ तथा विचित्रे जगति भासमानेऽप्यनेकधा । अनुसन्धानसंसिद्धमेकं दोषविवर्जितम् ॥ ५५ ॥ राजन् स्वात्मनि सम्पश्य मनोराज्यदशास्थितिम् । अनेकवैचित्र्यवपुरपि चैतन्यमात्रकम् ॥ ५६ ॥ सृष्टौ वा प्रलये वाऽपि निर्विकल्पैव सा चितिः । प्रतिबिम्बस्य भावे वाऽप्यभावे वेव दर्पणः ॥ ५७ ॥ एवंविधैकरूपाऽपि चितिः स्वातन्त्र्यहेतुतः । स्वान्तर्विभासयेद्वाह्यमादर्शे गगनं यथा ॥ ५८ ॥ एषा हि प्रथमा सृष्टिरविद्या तम उच्यते । द्वैतको, जिसका कोई निमित्त या उपादान कारण नहीं है और जो परस्पर अत्यन्त विलक्षण है, भासित कर रही है ॥ ५२ उ०-५३ ॥ जिस प्रकार [ प्रतिबिम्बके कारण ] अनेकरूप प्रतीत होनेवाले दर्पणमें अपने सामान्यरूपसे अबाधित एकत्व स्पष्ट भासता है, उसी प्रकार [ जाग्रदादि अवस्थाओंके कारण ] यह विचित्र जगत् अनेक- रूपसे भासित होनेपर भी, इसमें किसी प्रकार भी बाधित न होनेवाला एक तत्त्व सिद्ध है ही, क्योंकि इसकी विभिन्न अवस्थाओंका एक ही के द्वारा स्मरण होता है ॥ ५४-५५ ॥ राजन् ! तुम अपनेमें ही अपने मनोराज्यके समयकी स्थितिका विचार करो। वह अनेक प्रकारके रूपोंवाली होनेपर भी वास्तवमें चैतन्यमात्र ही तो होती है ॥ ५६ ॥ वह चिति, सृष्टि हो अथवा प्रलय, निर्विकल्पा ही रहती है, जैसे प्रतिबिम्ब हो अथवा न हो दर्पण शुद्ध ही रहता है ॥ ५७ ॥ इस प्रकार एकरूपा होकर भी यह चिति अपने स्वातन्त्र्यके कारण दर्पणमें आकाशके समान अपने आन्तरिक स्वरूपको ही बाह्यरूपसे भासित करती है ॥ ५८ ॥ यही पहली सृष्टि है, यह अविद्या या तम कही जाती है ।