त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पूर्णस्यांशेनेव भानं बाह्याभासनमुच्यते ॥ ५९ ॥ पूर्णाऽहम्भावविच्छेदादनहम्भावरूपता । एषैवाऽव्यक्तमित्युक्ता जडशक्तिश्च कथ्यते ॥ ६० ॥ या चितिश्चाऽत्र विच्छिन्नाभासिनी बहिरात्मनः । शिवतत्त्वमिति प्रोक्ता शक्तिस्तद्भासनं भवेत् ॥ ६१ ॥ बहिरूपं महाशून्यं कल्पितं यत्तदेव तु । अहम्भावाऽऽच्छादनेन सदाशिवमयं स्मृतम् ॥ ६२ ॥ तदेव जाड्यमुख्यत्वे ईश्वराख्यं प्रचक्षते । पूर्ण तत्त्वका अंशके समान भान होना ही बाह्याभास कहा जाता है ॥ ५६ ॥ परिपूर्ण आत्मतत्त्वमें अहंभाव न रहनेपर जो अनहंभावरूपता आती है वही अव्यक्त कही जाती है और उसीको जडशक्ति कहते हैं¹ ॥ ६० ॥ जो चिति इस लोकमें परिच्छिन्न रूपसे अपनेको बाह्यभावसे प्रकट करती है वही 'शिवतत्त्व' कही जाती है। उसका जो बाह्यरूपसे भासना है वही 'शक्ति' है² ॥ ६१ ॥ जो महाशून्य बाह्यरूपसे कल्पित हुआ है वही जब 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अहंभावसे आच्छादित होता है तो उसे 'सदाशिव' कहा जाता है ॥ ६२ ॥ वही जडताकी मुख्यता होनेपर 'ईश्वर' नामका चौथा तत्त्व कहलाता १. आत्मतत्त्व प्रत्यक्चैतन्य होनेके कारण अहमर्थ ही है। प्रलयादि निर्विकल्प अवस्थामें वह शुद्ध चिद्रूप ही रहता है। अपनी स्वातन्त्र्य शक्तिके द्वारा जब उसकी विक्षेपाभिमुख दशा होती है तब उसमें अहंभावका अभाव हो जाता है। यह समष्टि अहंकी अवस्था है। इसीको वेदान्त ग्रन्थोंमें मायाशक्ति कहा है। फिर जब विक्षेप दशा प्राप्त होती है तो परिच्छिन्न या व्यष्टि अहंकी स्फूर्ति होती है। इसे अविद्या या जडशक्ति कहते हैं। इस प्रकार भगवान्की चिच्छक्ति या उनके स्वरूपभूत स्वातन्त्र्यकी ये तीन अवस्थाएँ होती हैं। इन तीन श्लोकोंमें क्रमशः इन्हीं तीनों अवस्थाओंका वर्णन है। २. पूर्णचैतन्य में कोई बाह्याभास नहीं होता। उस अवस्थामें उसे 'परमशिव' कहते हैं। फिर सृष्टिरचना होनेपर विभिन्न परिच्छिन्न विशेषोंमें जो एक सामान्य निर्विकल्प चेतन अनुगत रहता है उसका नाम 'शिवतत्त्व' है और उस निर्विकल्प चेतनका परिच्छिन्न अहंरूपसे भासना 'शक्ति' है। इस प्रकार जो सृष्टिसे पूर्व परमशिव कहा जाता है वही सृष्टिकालमें सामान्य चिति रूपसे 'शिवतत्त्व' और अहंभासरूपसे 'शक्तितत्त्व' या जीव है।