त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः। २०२ अनयोः संवेदनं तु भेदाऽभेदविमर्शनम् ॥ ६३ ॥ शुद्धविद्येति सम्प्रोक्तमेतावच्छुद्धमुच्यते । भेदशक्तेरप्ररूढ्या चाऽभेदात्माऽवभासनात् ॥ ६४ ॥ अथ चित्स्वातन्त्र्यभरात् प्ररूढे भेदभावने । जडशक्तिर्धर्मिभावं चितिर्धर्मात्मतां ययौ ॥ ६५ ॥ तदा सा जडशक्तिस्तु मायातत्त्वं प्रचक्षते । माया विभेदबुद्धिस्तु भेदप्रचुरभावनात् ॥ ६६ ॥ भेदप्रचुरसंवीता चितिः सङ्कुचितात्मिका । पञ्चकञ्चुकसम्प्राप्ता पुरुषत्वं प्रपद्यते ॥ ६७ ॥ कलाविद्यारागकालनियतिः पञ्चकञ्चुकम् । कला किञ्चित्कर्त्तृता स्याद्विद्या किञ्चिज्ज्ञता भवेत् ॥ ६८ ॥ है।¹ इन सदाशिव और ईश्वरतत्त्वका 'यह मैं हूँ' और 'मैं यह हूँ' इस प्रकार भेदाभेद भेदरूपसे भासना ही 'शुद्धविद्या' नामका पाँचवाँ तत्त्व कहा जाता है। शिवतत्त्वसे लेकर यहाँतक ये पाँचो तत्त्व भेद- शक्ति (जडता) का विकास न होनेसे तथा अभेदस्वरूप आत्मतत्त्व के ही अवभास होनेके कारण 'शुद्ध' कहे जाते हैं ॥ ६३-६४ ॥ फिर जब चित्स्वातन्त्र्यके माहात्म्यसे भेदभाव बढ़ने लगता है तो जडशक्ति धर्मी भावको प्राप्त हो जाती है और चिति उसका धर्म हो जाती है ॥ ६५ ॥ तब वह जडशक्ति ही मायातत्त्व कही जाती है। माया भेदबुद्धिका नाम है, क्योंकि उसमें भेदप्रधान भावना रहती है ॥ ६६ ॥ भेदभावकी प्रचुरतासे व्याप्त चिति संकुचित हो जाती है तथा ऐसे पाँच कञ्चुक (आवरणों) से व्याप्त होकर वह पुरुषभावको प्राप्त हो जाती है ॥ ६७ ॥ वे पाँच कञ्चुक हैं—कला, विद्या, राग, काल और नियति। कुछ १. 'मैं यह हूँ' इसमें 'मैं' चिद्रूप है और 'यह' महाशून्य जडतत्त्व है। जब 'मैं' की प्रधानता होती है तब 'सदाशिव' और जब 'यह' की प्रधानता होती है तब ईश्वरतत्त्व होता है। 'मैं' और 'यह' में तत्त्वदृष्टिसे अभेद है और उल्लेख की दृष्टिसे भेद है। इस प्रकार इनका भान भेदाभेदरूपसे होता है।