त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे रागस्तृष्णा परिच्छित्तिरायुषा काल उच्यते । नियतिः परतन्त्रत्वमेतैर्युक्तस्तु पूरुषः ॥ ६९ ॥ चितिशक्तिमधिष्ठाय विचित्राऽनादिकर्मणाम् । जनानां वासनापिण्डः स्थितः प्रकृतिरुच्यते ॥ ७० ॥ फलं तु त्रिविधं यस्मात् कर्मणां सा त्रिरूपिणी । अस्या अवस्थाभेदो हि चित्तमित्यभिधीयते ॥ ७१ ॥ सुषुप्तौ प्रकृतिर्ज्ञेया तदन्ते चित्तमुच्यते । वासनापिण्डसहिता चितिश्चित्तमुदीरितम् ॥ ७२ ॥ अव्यक्तमेतदेवोक्तं वासनापिण्डभावतः । पुरुषाणां विभेदेन चित्तं बहुविधं भवेत् ॥ ७३ ॥ जीवानांमविभेदेन सुषुप्तावेकधा हि तत् । प्रकृतित्वं समायाति तदन्ते चित्ततामियात् ॥ ७४ ॥ कर सकना कला है, कुछ जान सकना विद्या है, राग तृष्णाको कहते हैं, आयुकी सीमा काल है और परतन्त्रता नियति है । इन पाँच कञ्चुकोंसे जो युक्त है उसे 'पुरुष' कहते हैं ॥ ६८-६९ ॥ जीवोंके शुक्ल-कृष्णादि अनेक प्रकारके अनादिकालीन कर्मोंकी वासनाओंका जो समूह चितिशक्तिको आश्रय करके स्थित है वह 'प्रकृति' कहलाता है ॥ ७० ॥ क्योंकि कर्मोंका फल सुख, दुःख एवं मोह रूप तीन प्रकारका होता है इसलिये वह प्रकृति भी सत्त्व, रज एवं तम तीन रूपोंवाली है । उसीका एक अवस्थाभेद 'चित्त' कहा जाता है ॥ ७१ ॥ सुषुप्तिमें उसे 'प्रकृति' कहते हैं और सुषुप्तिका अन्त होनेपर वही 'चित्त' कहा जाता है । वासनासमूहके सहित जो चिति है वही 'चित्त' कहलाता है ॥ ७२ ॥ वासनासमूहसे युक्त होनेके कारण यह चित्त ही 'अव्यक्त' भी कहा जाता है। पुरुषोंके भेदके अनुसार चित्त भी अनेक प्रकारका होता है ॥ ७३ ॥ किन्तु सुषुप्तिमें पुरुषोंका भेद नहीं रहता, इसलिये उस समय वह एक ही प्रकारका होता है। उस अवस्थामें वह प्रकृतिभावको प्राप्त हो जाता है और उसका अन्त होनेपर चित्तरूपताको ॥ ७४ ॥