त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः । २०३ एतदेव पुमान् प्रोक्तश्चितिप्राधान्यहेतुना । अव्यक्तप्राधान्यतस्तु चित्तप्रकृतितामियात् ॥ ७५ ॥ क्रियाभेदाच्च त्रिविधमन्तःकरणमुच्यते । अहङ्कारबुद्धिमनोरूपेण नृपसत्तम ! ॥ ७६ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां तु पञ्चकं स्यात्ततः पृथक् । शब्दादिगगनादीनि भूतानि स्थूलसूक्ष्मतः ॥ ७७ ॥ एवं सा परमा संविद् बाह्याभासपूर्वकम् । क्रीडां करोति सृष्ट्यादिक्रमेण सर्वसाक्षिणी ॥ ७८ ॥ तत्राऽऽद्यया श्रीत्रिपुराशक्त्या सृष्टौ प्रभावतः । हिरण्यगर्भो यो ब्रह्मा तस्यैतद्भावनोत्थितम् ॥ ७९ ॥ जगत्तत्र तु या संवित्त्वमहंरूपभासिनी । सा परैव हि चिच्छक्तिस्तद्भेदो न तु विद्यते ॥ ८० ॥ चितिकी प्रधानताके कारण यह चित्त ही 'पुरुष' कहा जाता है तथा अव्यक्त की प्रधानतासे यही चित्त और प्रकृति रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ ७५ ॥ नृपश्रेष्ठ ! क्रियाभेदसे वह चित्त ही अहंकार, बुद्धि एवं मन तीन प्रकारका अन्तःकरण कहलाता है ॥ ७६ ॥ उस त्रिगुणात्मक अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ १, पाँच कर्मेन्द्रियाँ २ तथा शब्दादि ३ सूक्ष्म एवं आकाशादि ४ स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं ॥ ७७ ॥ इस प्रकार वह सर्वसाक्षिणी परमा चिति बाह्याभासपूर्वक सृष्टि आदि क्रमसे क्रीडा कर रही है ॥ ७८ ॥ इस सृष्टिक्रममें सबकी मूलकारण त्रिपुराशक्ति है । उसकी भावना से जो हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुआ है उसीके संकल्पसे यह संसार उत्पन्न हुआ है । इसमें जो 'तू' 'मैं' रूपसे भासनेवाली संवित् है वह परा चित् शक्ति ही है । उसमें कोई भेद नहीं है ॥ ७९-८० ॥ १. श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा और घ्राण । २. वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ । ३. शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ सूक्ष्म भूत हैं । ४. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये पाँच स्थूल भूत हैं ।