त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
चतुर्दशोऽध्यायः । २०३ एतदेव पुमान् प्रोक्तश्चितिप्राधान्यहेतुना । अव्यक्तप्राधान्यतस्तु चित्तप्रकृतितामियात् ॥ ७५ ॥ क्रियाभेदाच्च त्रिविधमन्तःकरणमुच्यते । अहङ्कारबुद्धिमनोरूपेण नृपसत्तम ! ॥ ७६ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां तु पञ्चकं स्यात्ततः पृथक् । शब्दादिगगनादीनि भूतानि स्थूलसूक्ष्मतः ॥ ७७ ॥ एवं सा परमा संविद् बाह्याभासपूर्वकम् । क्रीडां करोति सृष्ट्यादिक्रमेण सर्वसाक्षिणी ॥ ७८ ॥ तत्राऽऽद्यया श्रीत्रिपुराशक्त्या सृष्टौ प्रभावतः । हिरण्यगर्भो यो ब्रह्मा तस्यैतद्भावनोत्थितम् ॥ ७९ ॥ जगत्तत्र तु या संवित्त्वमहंरूपभासिनी । सा परैव हि चिच्छक्तिस्तद्भेदो न तु विद्यते ॥ ८० ॥ चितिकी प्रधानताके कारण यह चित्त ही 'पुरुष' कहा जाता है तथा अव्यक्त की प्रधानतासे यही चित्त और प्रकृति रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ ७५ ॥ नृपश्रेष्ठ ! क्रियाभेदसे वह चित्त ही अहंकार, बुद्धि एवं मन तीन प्रकारका अन्तःकरण कहलाता है ॥ ७६ ॥ उस त्रिगुणात्मक अहंकारसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ १, पाँच कर्मेन्द्रियाँ २ तथा शब्दादि ३ सूक्ष्म एवं आकाशादि ४ स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं ॥ ७७ ॥ इस प्रकार वह सर्वसाक्षिणी परमा चिति बाह्याभासपूर्वक सृष्टि आदि क्रमसे क्रीडा कर रही है ॥ ७८ ॥ इस सृष्टिक्रममें सबकी मूलकारण त्रिपुराशक्ति है । उसकी भावना से जो हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुआ है उसीके संकल्पसे यह संसार उत्पन्न हुआ है । इसमें जो 'तू' 'मैं' रूपसे भासनेवाली संवित् है वह परा चित् शक्ति ही है । उसमें कोई भेद नहीं है ॥ ७९-८० ॥ १. श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा और घ्राण । २. वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ । ३. शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ सूक्ष्म भूत हैं । ४. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये पाँच स्थूल भूत हैं ।
२०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भेदस्त्वौपाधिको भाति ह्युपाधिर्ब्रह्मभावितः । तद्भावनोपसंहारे नास्ति भेदस्य भासनम् ॥ ८१ ॥ चितौ या भावना शक्तिर्मायया ते समावृता । तदावरणहाने तु तव सा सिद्धिमेष्यति ॥ ८२ ॥ देशः कालोऽथवा किञ्चिद् यथा येन विभावितम् । तथा तत्तत्र भासेत दीर्घसूक्ष्मत्वभेदतः ॥ ८३ ॥ मयैकदिनरूपेण भावितं तद्दिनैककम् । ब्रह्मणा तावदेवाऽत्र द्वादशाऽर्बुदरूपतः ॥ ८४ ॥ भावितं तेनैवमेतच्चिरशीघ्रत्वभासनम् । ब्रह्मणा निर्मिते शैले पादगव्यूतिसम्मिते ॥ ८५ ॥ मयाऽनन्तप्रदेशस्य भावितत्वादनन्तता । एवं च द्वयमप्यत्र सत्यं चाऽसत्यमेव च ॥ ८६ ॥ भेद उपाधिके कारण भासता है और उपाधि ब्रह्माकी भावनासे हुई है। अतः उसकी भावनाका अन्त होनेपर भेदका भास भी नहीं होता ॥ ८१ ॥ तुममें जो चितिकी भावनाशक्ति है वह मायासे ढकी हुई है। उस आवरणकी निवृत्ति हो जाने पर वह तुम्हारे लिये सिद्ध (प्रकट) हो जायगी ॥ ८२ ॥ देश, काल अथवा कोई भी वस्तु हो उसके विषयमें जिसकी जैसी भावना है उसीके अनुसार वह उसे अल्प या बृहत् रूपमें भासता है ॥ ८३ ॥ मैंने [ अपने संसारमें ] एक दिनकी भावनाकी थी, इसलिये वहाँ एक दिन हुआ। किन्तु उतने ही कालकी ब्रह्माने बारह अरब वर्षरूपसे भावना की। इसीसे यह एक ही कालमें दीर्घता और शीघ्रता- का भास हुआ ॥ ८४-८५ पू० ॥ ब्रह्माके बनाये चौथाई गव्यूतिमात्र पर्वतमें मैंने अनन्त देशकी भावना की, इसलिये उसमें अनन्तता भासी। इस प्रकार ये अनुभूतियां दोनों प्रकार की हैं—[ व्यावहारिक दृष्टिसे ] सत्य भी हैं और [ पार- मार्थिक दृष्टिसे ] असत्य भी ॥ ८५ उ०-८६ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः। २०५ त्वमप्यन्तःक्रोशमितं देशं कालं कलात्मकम्। विभाव्य भूयस्तत्रैव भावयाऽनन्तयोजनम् ॥ ८७ ॥ असङ्ख्यकालमपि च भासेद्यावद्धि भावनम्। तस्माद्भावनमात्रात्मरूपमेतज्जगद्बहिः ॥ ८८ ॥ चिदात्मरूपे व्यक्ते वै भासते मनुजाऽधिप। तस्माद्वाह्यात्मकाऽव्यक्तभित्तौ चित्रमयं जगत् ॥ ८९ ॥ अव्यक्तभित्तिमात्रं स्यात् सा स्वभित्तिचिदात्मिका। अत एव चिराद्गम्यो दूरदेशोऽपि योगिनः ॥ ९० ॥ क्षणेन गत्वा पश्यन्ति करामलकवद् ध्रुवम्। तस्माद् दूरं समीपं वा चिरं शीघ्रमथाऽपि वा ॥ ९१ ॥ भावनामात्रसंसिद्धं चिद्दर्पणसमाश्रितम् । निश्चित्यैवं त्यज भ्रान्तिं शुद्धचिद्भावनक्रमात् ॥ ९२ ॥ ततस्त्वमप्यहमिव स्वतन्त्रस्तु भविष्यसि। इति श्रुत्वा मुनिसुतवचनं मुनिसत्तमः ॥ ९३ ॥ तुम भी यदि अपनी संकल्पभूमिमें पहले एक कोश लम्बे देश और कलामात्र कालकी कल्पना करके फिर उसमें अनन्त योजनके विस्तार और असंख्यकालकी भावना करो तो जैसी तुम्हारी भावना होगी वैसा ही भासेगा। इसलिये राजन् ! यह भावनामात्र रूपवाला बाह्य जगत् चिदात्मारूप अव्यक्तपर ही भास रहा है। अतः बाह्यात्मक अव्यक्त भित्तिपर भासनेवाला यह चित्ररूप जगत् अव्यक्तमात्र ही है और वह अव्यक्त भित्ति चित्स्वरूपिणी है ॥ ८७-६० पू० ॥ इसीलिये योगीलोग दीर्घकालमें पहुँचने योग्य दूरवर्ती प्रदेशको भी क्षणमात्रमें जाकर निश्चय ही करामलकवत् देख लेते हैं॥६०उ०-६१पू०॥ अतः दूर या समीप तथा चिरकाल या अल्पकाल केवल भावनासे ही सिद्ध हुए हैं और चेतनरूप दर्पणके आश्रित हैं—ऐसा निश्चय करके तुम शुद्ध चेतनकी भावना करते हुए भ्रान्तिको त्याग दो। तब तुम भी मेरी ही तरह स्वतन्त्र हो जाओगे ॥ ६१ उ०-६३ पू० ॥ मुनिश्रेष्ठ परशुरामजी मुनिपुत्रके ये वचन सुनकर महासेनका सारा
२०६ Tripura Rahasye Jñānakhaṇḍe | २०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे परित्यज्याऽखिलभ्रान्तिं ज्ञातज्ञेयः शुभाशयः । समाध्यभ्यासयोगेन संसाध्य निजभावनाम् ॥ ९४ ॥ स्वातन्त्र्यमधिगम्याऽथ चिरकालं विहृत्य तु । देहाभासमथोन्मूल्य महागगनसंश्रयः ॥ ९५ ॥ निर्वाणं परमं प्राप्तो महासेनोऽपि भार्गव । एवं जगत् सत्यभावभावनामात्रहेतुतः ॥ ९६ ॥ भाति सत्याऽऽत्मरूपेण विमृश्यैतद् भृगूद्वह । विचारेण शमं यायाद् भ्रान्तिस्ते चित्तसंश्रया ॥ ९७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकाख्यानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ भ्रम दूर हो गया । जानने योग्य तत्त्वको जानलेनेसे उसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया । समाधिके अभ्यासद्वारा उसने अपनी भावनाको सिद्ध कर लिया और इस प्रकार स्वातन्त्र्य प्राप्त करके वह चिरकालतक भूतलमें विहार करता रहा। फिर देहानुसन्धानको भी निर्मूलकर उसने निर्विकल्प पराचितिका आश्रयसे परम निर्वाणपद प्राप्त कर लिया ॥ ६३ उ०-६६ पू० ॥ इस प्रकार हे भृगुनन्दन ! केवल सत्यताकी भावनाके कारण ही यह जगत् सत्यरूप भासता है—ऐसा विचार करो । विचारके द्वारा ही तुम्हारे चित्तमें रहनेवाला भ्रम शान्त होगा ॥ ६६ उ०-६७ ॥ चतुर्दश अध्याय समाप्त ।
पञ्चदशोऽध्यायः इति श्रुत्वा शैललोकाख्यानमत्यद्भुतं तदा । भूयोऽत्यन्तं विस्मितोऽभूद्रामो भृगुकुलोद्वहः ॥ १ ॥ विमृश्य गुरुणा प्रोक्तं बुद्ध्या निश्चित्य शुद्धया । दत्तात्रेयं पुनर्गत्वा नत्वा पप्रच्छ सादरम् ॥ २ ॥ भगवन् यत्त्वया प्रोक्तमाख्यानैर्विविधैस्तु तत् । तत्र सारमियज्ज्ञातं मयात्यन्तं विचारतः ॥ ३ ॥ संवेदनं सत्यमेकं संवेद्यं तत्र कल्पितम् । आदर्शनगरप्रख्यं मृषैव प्रविभावितम् ॥ ४ ॥ सा चितिः परमा शक्तिः संविद्रूपा महेश्वरी । स्वात्मभित्तौ जगच्चित्रमव्यक्तादिप्रभेदितम् ॥ ५ ॥ भावयेत्स्वातन्त्र्यमात्रान्निरुपदानहेतुकम् । एतावत्तु मया ज्ञातं विचार्य सूक्ष्मया धिया ॥ ६ ॥ पञ्चदश अध्याय ॥ १५ ॥ अष्टावक्रका प्रसङ्ग इस प्रकार शैललोककी अत्यन्त अनोखी गाथा सुनकर भृगुनन्दन श्री परशुरामजीको बड़ा ही अचम्भा हुआ ॥ १ ॥ उन्होंने गुरुदेवके कथनपर शुद्ध बुद्धिसे विचार किया और फिर कुछ निश्चयकर श्रीदत्तात्रेयजीके पास जा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार करके पूछा ॥ २ ॥ “भगवन् ! आपने अनेकों आख्यानों द्वारा जो कुछ कहा है उस पर अत्यन्त विचार करके मैंने उसका यह सार समझा है—॥ ३ ॥ 'एक ज्ञान ही सत्य है, ज्ञेय (दृश्य) उसमें कल्पित है। दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान उसकी मिथ्या भावना कर ली गयी है ॥४॥ वह ज्ञानस्वरूपा परमाशक्ति चिति साक्षात् महेश्वरी है। वह अपने स्वातन्त्र्यसे बिना किसी उपादानके ही अपने ही स्वरूपभूत भित्तिपर इस अव्यक्तादि भेदों वाले जगच्चित्रकी कल्पना कर लेती है।' मैंने तो सूक्ष्म बुद्धिसे विचार करके इतना ही समझा है ॥ ५-६ ॥
२०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे किं त्वेवंविधसंवित्तिर्वेद्यवन्ध्या निरूपिता। उपलब्धुमशक्यैव संवेद्यायाः सदा स्थितेः॥ ७॥ वेद्यं विना तु संवित्तेः कथं स्यादुपलम्भनम्। उपलम्भं विना तस्याः पुरुषार्थो न विद्यते॥ ८॥ पुरुषार्थोऽपि मोक्षः स्यात्स वा किंविध उच्यते। विज्ञाने सति मोक्षः स्यान्मुक्ते व्यवहृतिः कथम्॥ ९॥ ज्ञानिनोऽपि च दृश्यन्ते व्यवहारपरायणाः। कथं तेषां हि संवेद्यमुक्तं संवेदनं स्थितम्॥ १०॥ स्थितायां शुद्धसंवित्तौ व्यवहारः कथं भवेत्। विज्ञानमेकरूपं वै मोक्षोप्येकः फलं भवेत्॥ ११॥ तत्कथं ज्ञानिनां भेदः स्थितौ लोके हि दृश्यते। के चित्कर्म प्रकुर्वन्ति काले सच्छास्त्रचोदितम्॥ १२॥ के चित्समाराधयन्ति देवतां भिन्नवर्त्मभिः। किन्तु इस प्रकारकी उस चितिको तो वेद्यभावसे शून्य [अर्थात् अज्ञेय] कहा गया है। और यदि उसकी स्थिति सर्वदा उपलब्धिके अयोग्य ही है तो ज्ञानकी विषय न होनेके कारण उस चितिको किसीको उपलब्धि ही कैसे हो सकती है। और उसकी उपलब्धिके बिना पुरुषार्थ- की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ७-८॥ पुरुषार्थ भी यदि मोक्ष है तो वह किस प्रकारका कहा जाता है। यदि ज्ञान होनेपर मोक्ष हो जाता है तो मुक्तिके अनन्तर उस जीव- न्मुक्तका व्यवहार कैसे होता है? ॥ ९॥ ज्ञानियोंको भी व्यवहारमें तत्पर तो देखा ही जाता है। ऐसी अवस्थामें उनका ज्ञान ज्ञेयहीन (निर्विकल्प) कैसे रहता है? ॥ १०॥ यदि उनका ज्ञान निर्विकल्प ही रहता है तो उनके द्वारा व्यवहार कैसे होता है? [इसके सिवा एक संशय यह भी है कि] ज्ञान तो सबका एक जैसा ही होता है और उसका फल मोक्ष भी एक ही है। फिर लोकमें ज्ञानियोंकी स्थितिमें भेद क्यों देखा जाता है ॥११-१२ पू०॥ ज्ञानियोंमें कोई तो यथासमय शास्त्रोक्त कार्य करते हैं, कोई भिन्न-
पञ्चदशोऽध्यायः। २०६ केचित्समाधिपरमाः संहृतेन्द्रियमण्डलाः ॥ १३ ॥ केचित्तपः प्रकुर्वन्ति देहेन्द्रियविशोषणम् । केचिच्छिष्यान्प्रबोधयन्ति पृथक्प्रवचनैः स्फुटम् ॥ १४ ॥ केचिद्राज्यं प्रशासन्ति दण्डनीत्युक्तवर्त्मना । केचित्प्रवादं कुर्वन्ति सदःसु प्रतिवादिभिः ॥ १५ ॥ केचिच्छास्त्राणि विविधान्यजस्रं रचयन्ति वै । अन्ये केवलमुग्धत्वमावहन्ति सदैव हि ॥ १६ ॥ केपि लोकविगर्हां तु वृत्तिं नित्यमिहास्थिताः । त इमे ज्ञानिन इति प्रथिता भूरिशोचनैः ॥ १७ ॥ तत्कथं साधनफलाभेदेपि स्थितिभिन्नता । किमेते समविज्ञानास्तारतम्यमुताश्रिताः ॥ १८ ॥ एतत्सर्वमशेषेण प्रवक्तुं मे समर्हसि । शिष्येऽनन्यशरण्ये ते निसर्गसदयं मनः ॥ १९ ॥ इत्यत्रिसूनुनापृष्टो भार्गवेण प्रसन्नधीः । भिन्न प्रणालियोंसे देवताओंकी आराधना करते हैं, कोई इन्द्रियग्रामका संयम करके समाधिमें तत्पर रहते हैं, कोई देह और इन्द्रियोंको सुखाने- वाला तप करते हैं, कोई तरह-तरहके वचनों द्वारा स्पष्टतया शिष्योंको उपदेश करते हैं, कोई दण्डनीतिमें बताये हुए नियमोंके अनुसार राज्य- शासन करते हैं, कोई सभाओंमें प्रतिवादियोंके साथ वाद-विवाद करते हैं, कोई निरन्तर तरह-तरहके शास्त्रोंकी रचना करते रहते हैं और कोई सर्वदा पागलपनका स्वांग ही बनाये रहते हैं ॥ १२ उ०-१६ ॥ कोई इस लोकमें निन्दनीय वृत्तिका आचरण करते हैं। फिर भी अत्यन्त चिन्तनशील लोग निश्चय करते हैं कि ये सभी ज्ञानी हैं ॥ १७॥ तब ऐसा क्यों है कि साधन और फलमें भेद न होनेपर भी इनकी स्थितियोंमें भेद है। इन सबका ज्ञान समान ही होता है अथवा उसमें न्यूनाधिकता रहती है ? ॥ १८ ॥ कृपया यह सब रहस्य मुझसे समझाकर कहिये। मुझे किसी अन्यका आश्रय नहीं है। अपने इस शिष्यके प्रति आपका चित्त स्वभावसे ही दयार्द्र है" ॥ १९ ॥ परशुरामजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर श्रीदत्तात्रेयजी बड़े
२१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मत्वा योग्यं प्रश्नजातं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ २० ॥ राम बुद्धिमतां श्रेष्ठ नूनं स्पृशसि तत्पदम् । सद्विमर्शपरो यस्त्वमतो ज्ञातुं प्रभावितः ॥ २१ ॥ एतदेव हि तच्छक्तिपातो यत्सद्विमर्शनम् । भगवच्छक्तिपातेन विना कः श्रेय आप्नुयात् ॥ २२ ॥ कृत्यमात्मदेवताया जानीह्येतावदेव हि । यत्सद्विमर्शनं नित्यं वर्धयेत्सुप्रसादिता ॥ २३ ॥ यत्त्वया विदितं तत्तु तादृक् सत्यं नहीतरत् । किन्तु तत्तादृशमपि त्वयोक्तं परचिद्वपुः ॥ २४ ॥ न ते सुविदितं राम यत एवं वदस्यतः । ताटस्थ्येन तु यो यावद्वेद तावन्न वेद वै ॥ २५ ॥ यतः सा विदिता सम्यक्ताटस्थ्यमुपशामयेत् । तटस्थसंवेदनं तु स्वप्नसंवेदनोपमम् ॥ २६ ॥ प्रसन्न हुए और उनके प्रश्नोंको उचित समझकर उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ २० ॥ "परशुराम ! तुम बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हो । तुमने अवश्य उस पदका स्पर्श प्राप्त किया है । तुम सद्विचारमें तत्पर हो, इसलिये उसे जाननेकी भी योग्यता रखते हो ॥ २१ ॥ यह जो सद्विचार करता है वही भगवान्की अनुग्रहशक्तिको पाना है । भला उनकी अनुग्रहशक्तिको प्राप्त किये बिना कौन उस परमपदको प्राप्त कर सकता है ? ॥ २२ ॥ उस आत्मदेवका कार्य तो केवल इतना ही समझो कि वह प्रसन्न होकर निरन्तर सद्विचारकी वृद्धि करता रहे ॥ २३ ॥ तुमने जो कुछ समझा है वह तो उतना ही है; उससे भिन्न नहीं । किन्तु वह वैसा होनेपर भी तुमने जिस परा चिच्छक्तिकी चर्चा की है वह अभी तुम्हें ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है । इसीसे तुम ऐसी शंका करते हो ॥ २४-२५ पू० ॥ जबतक साधक तटस्थरूपसे उसे जानता है तबतक वास्तवमें नहीं जानता; क्योंकि जब उसका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है तो तटस्थता
पञ्चदशोऽध्यायः । २११ यथा स्वप्ननिधिप्राप्तिः पुरुषाणां निरर्थिका । तथा तटस्थविज्ञानममुख्यफलदं भवेत् ॥ २७ ॥ अत्र ते कथयिष्यामि प्राग्वृत्तमतिशोभनम् । पुरा विदेहेषु कश्चिदासीद्राजा सुधार्मिकः ॥ २८ ॥ वृद्धप्रज्ञो हि जनकः प्रविज्ञातपरावरः । स कदाचित्स्वात्मदेवीमीजे क्रतुभिरुत्तमैः ॥ २९ ॥ तत्राजग्मुर्ब्राह्मणाद्या विद्यावन्तस्तपस्विनः । कलाभिज्ञा वैदिकाश्च यज्वानश्चापि सत्रिणः ॥ ३० ॥ तत्काल एव वरुणो यष्टुं समुपचक्रमे । तेनोपहूता विप्राद्या न ययुस्तत्र भूरिशः ॥ ३१ ॥ जनके ह्यभिसंप्रीताः पूजितास्तेन तर्पिताः । अथाजगाम वरुणदायादो बौद्धसम्पदा ॥ ३२ ॥ विप्रवेषधरो नेतुं ब्राह्मणान्कूटवर्त्मना । निवृत्त हो जाती है। उसे तटस्थरूपसे जानना तो स्वप्नज्ञानके समान है ॥ २५ उ०-२६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें खजानेको पा लेना मनुष्यके किसी काम नहीं आता, उसी प्रकार तटस्थ ज्ञान मनुष्यको मोक्षरूप मुख्य फल नहीं दे सकता ॥ २७ ॥ अब मैं तुमसे एक अति सुन्दर प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ। पूर्व- कालमें विदेह-राज्यमें जनक नामका कोई धर्मनिष्ठ और बुद्धिमान राजा था । उसे परमात्माका ज्ञान हो चुका था ॥ २८-२९ पू० ॥ उसने किसी समय उत्तम यज्ञों द्वारा अपने आत्मदेवकी आरा- धना की। उसके यज्ञोंमें अनेकों विद्वान् और तपस्वी ब्राह्मणादि पधारे। वे अनेकों कलाओंके ज्ञाता, वेदज्ञ, यजनशील और सत्रोंका अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ २९ उ०-३० ॥ उसी समय वरुणने भी यज्ञ आरम्भ किया। उसके निमन्त्रित करनेपर भी अनेकों ब्राह्मणादि, जनकसे अधिक प्रेम हो जाने और उससे पूजित तथा तृप्त होनेके कारण वहाँ नहीं गये ॥ ३१-३२ पू० ॥ तब वरुणका पुत्र अपने बुद्धिवैभवसे कूटमार्गद्वारा ब्राह्मणोंको ले जाने-
२१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आसाद्य यज्ञसदनं नृपं संयोज्य चाशिषा ॥ ३३ ॥ आक्षिपत्तत्र सभ्यांस्तु शृण्वताञ्च सभासदाम् । राजंस्ते यज्ञसदनमत्यन्तं नैव शोभते ॥ ३४ ॥ कमलाकरवत्काककङ्कवृन्दस्य सञ्चयात् । सभा विद्वत्समुदयैः क्षोमिनी शोभतेतराम् ॥ ३५ ॥ शारदं हंससंघातैः सपद्मं तु सरो यथा । तदत्र विद्याविशदं न पश्याम्येकमप्यलम् ॥ ३६ ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि नात्र मे संस्थितिर्भवेत् । कथं सभामिमां मूर्खप्रचुरां संविशाम्यहम् ॥ ३७ ॥ एवं वारुणिना प्रोक्ताः सभ्याश्चक्रुधुरञ्जसा । किमरे द्विजबन्धो ! त्वमधिक्षिपसि सर्वतः ॥ ३८ ॥ केयं तवेदृशी विद्या यया सर्वे वयं जिताः । वृथा कत्थसि दुर्बुद्धे जित्वास्मांस्त्वं गमिष्यसि ॥ ३९ ॥ के लिये ब्राह्मणका वेष धारण कर जनकके यज्ञमें आया ॥३२ उ०-३३पू०॥ उसने यज्ञशालामें आकर राजाको आशीर्वाद दे सब सभासदोंको सुनाते हुए उनपर आक्षेप किया, "राजन् ! यज्ञमण्डप तो विशेष शोभित नहीं है, जिस प्रकार कौए और कंकसमुदायके इकट्ठे हो जानेसे सरोवरकी शोभा नहीं होती ॥ ३३ उ०-३५ पू० ॥ सुन्दर सभाकी शोभा तो विद्वत्समुदायसे ही होती है, जैसे कमलोंसे युक्त शरत्कालीन सरोवर हंससमूहसे ही सुशोभित होता है ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥ सो, मुझे तो यहाँ एक भी विद्याविभूषित सदस्य दिखायी नहीं देता । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो जाता हूँ । यहाँ मेरा निर्वाह नहीं हो सकता । इस मूर्खबहुल सभामें मैं कैसे बैठ सकता हूँ ?” ॥. ३६ उ०-३७ ॥ वरुणपुत्रके इस प्रकार कहनेपर सभी सभासद स्वभावसे ही क्रोधमें भर गये [ और बोले-] "अरे ब्राह्मणाधम ! तू सभीका अपमान कैसे कर रहा है ? ॥ ३८ ॥ तुझमें ऐसी क्या विद्या है जिससे तू हम सभीको जीत सकता है। मूर्ख ! तू व्यर्थ क्यों बकवाद करता है ? अब हमें जीतकर ही जाना ॥ ३६ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः। २१३ प्रायो भूलोकसंस्थाना विद्वांसः सङ्गताः खलु । किं त्वं भूलोकमेवाद्य जेतुमिच्छसि दुर्मते ॥ ४० ॥ ब्रूहि का ते भवेद्विद्या यथाऽस्माञ्जेतुमिच्छसि । इत्युक्तवत्सु सभ्येषु वारुणिः पुनराह तान् ॥ ४१ ॥ समयेन विजेष्यामि सर्वान् वः क्षणमात्रतः । अहं जितो भवद्भिस्तु समुद्रे स्यान्निमज्जितः ॥ ४२ ॥ युष्मास्त्वहं मज्जयामि जितं जितमथापि वा । उपेत्यैवं तु समयं विवदन्तु मया सह ॥ ४३ ॥ इत्युक्त्वा सम्मतिं चक्रुः सभ्या वादाय तेन तु । विवादं चक्रुरत्यन्तं तेन वारुणिना द्विजाः ॥ ४४ ॥ जिग्ये वारुणिर्विप्रान् वितण्डाजल्पवर्त्मना । सिन्धौ निमज्जिता विप्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४५ ॥ निमज्जितास्तु ये विप्रा दूतैस्तैर्वारुणैर्हृताः । यहाँ भूमण्डलके प्रायः सभी विद्वान् एकत्रित हुए हैं। क्यो रे दुर्बुद्धि ! क्या तू अकेला ही सारे भूलोकको जीतना चाहता है ॥ ४० ॥ बोल, तेरी वह क्या विद्या है, जिससे तू हमें जीतनेकी इच्छा करता है।" सभासदोंके ऐसा कहनेपर वरुणपुत्रने उनसे कहा-॥ ४१ ॥ “मैं एक शर्त करके तुम सभीको क्षणमात्रमें जीत सकता हूँ। यदि तुमलोग मुझे जीत लो तो मुझे समुद्र में डुबो देना। नहीं तो तुममेंसे जिस-जिसको मैं परास्त करूँगा उसे डुबा दूँगा। इस शर्तको स्वीकार करो, फिर मेरे साथ विवाद कर सकते हो" ॥ ४२-४३ ॥ इस शर्तको स्वीकार कर सभी सभासदोंने उसके साथ विवाद करनेका निर्णय किया। और उन सभी ब्राह्मणोंने उस वरुणपुत्रके साथ खूब शास्त्रार्थ किया ॥ ४४ ॥ वरुणपुत्रने वितण्डा¹ और जल्प²के द्वारा सभी ब्राह्मणोंको जीत लिया। और इस प्रकार उसने सैकड़ों-हजारों ब्राह्मणोंको समुद्रमें डुबा दिया ॥४५॥ उन डुबाये हुए ब्राह्मणोंको वरुणके दूत ले जाते थे और १. अपना कोई पक्ष स्थापित न करते हुए केवल दूसरेके पक्षका खण्डन करना । २. अपने पक्षको स्थापित करते हुए दूसरेके पक्षका खण्डन करना ।
२१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
वारुणं यज्ञमासाद्य मुमुदुः पूजिता भृशम् ॥ ४६ ॥ मज्जितं पितरं श्रुत्वा कहोलं तत्सुतस्ततः । अष्टावक्रः समागत्य ज्ञानवैतण्ड्यजल्पकः ॥ ४७ ॥ विजित्य वारुणिं सिन्धावादिदेश निमज्जने । अथ प्रकाशमापन्नो वारुणिर्द्विजमुख्यान् ॥ ४८ ॥ समानयत्स्वलोकस्थानष्टावक्रेण निर्जितः । अथागतेषु विप्रेषु कहोलतनयो भृशम् ॥ ४९ ॥ विप्रान् विमोचितान् सर्वानत्यवर्त्त दर्पतः । अष्टावक्रेण विमता विप्राः खेदमुपागताः ॥ ५० ॥ तत्काल आगतां कांचित्तापसीं शरणं ययुः । तान्समाश्वास्य विप्रान् सा काषायाम्बरवासिनी ॥ ५१ ॥ जटिला नित्यतरुणी मनोहरवपुर्धरा । सभामुपैत्य प्रोवाच नृपेणाभिसुपूजिता ॥ ५२ ॥
वरुणकी यज्ञशालामें पहुँचनेपर खूब सत्कार पाकर वे बड़े प्रसन्न होते थे ॥ ४६ ॥ कहोलका पुत्र अष्टावक्र वितण्डा और जल्पमें बड़ा प्रवीण था। जब उसने अपने पिताको समुद्र में डुबाया सुना तो वहाँ आकर वरुणपुत्रको परास्त किया और उसे समुद्रमें डुबानेका आदेश दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥ अष्टावक्रसे परास्त होनेपर वरुणपुत्रने अपनेको प्रकट कर दिया और अपने लोकसे सभी द्विजश्रेष्ठोंको ले आया ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥ सब ब्राह्मणोंके आनेपर कहोलपुत्रको बड़ा अभिमान हुआ और वह वरुणके यहाँसे छुड़ाये हुए ब्राह्मणोंसे अपना बड़प्पन प्रकट करने लगा। इस प्रकार अष्टावक्रसे अपमानित होनेपर ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ ॥ ४९ उ०-५० ॥ उसी समय वहाँ एक तपस्विनी आयी। वह काषाय वस्त्र धारण, किये थी, उसके सिरपर जटाएँ थीं, योगाभ्यासके कारण नित्य तरुणा- वस्थामें रहती थी और अत्यन्त मनोहर शरीरवाली थी। राजाने उसका खूब सत्कार किया। वे सब उसकी शरणमें गये। उनको सान्त्वना दे उसने सभामें आकर कहा-॥ ५१-५२ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः । २१५ कहोलसुत वत्स त्वमत्यन्तं बुद्धिमानसि । त्वया विमोचिता विप्रा वादे निर्जित्य वारुणिम् ॥ ५३ ॥ अहं पृच्छामि किञ्चित्त्वां वद हित्वा सुकैतवम् । यत्पदं विदितं सर्वामृतत्वप्रतिपादकम् ॥ ५४ ॥ यत्पदे विदिते सर्वसन्देहः प्रलयं व्रजेत् । अविज्ञातं न किञ्चित्स्यादाशास्यं वा न किञ्चन ॥ ५५ ॥ अवेद्यं विदितं तच्चेद्वद मामुप सत्वरम् । तापस्यैवं समापृष्टः कहोलतनयोऽब्रवीत् ॥ ५६ ॥ विदितं तत्पदं भूयो वच्मि तापसि संशृणु । न मे ह्यविदितं लोके ह्यस्ति किञ्चित्कियच्चिदम् ॥ ५७ ॥ मया शास्त्राणि सर्वाणि भूयः संलुलिठतानि वै । यत्त्वं पृच्छसि तद्वक्ष्ये शृणु तापसि तत्त्वतः ॥ ५८ ॥ तद्धि सर्वजगद्धेतुरादिमध्यान्तवर्जितम् । देशकालानवच्छिन्नं शुद्धाखण्डचिदात्मकम् ॥ ५९ ॥ “कहोलपुत्र ! बेटा ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । तुमने वरुणपुत्रको विवादमें जीतकर सभी ब्राह्मणोंको छुड़ा दिया ॥ ५३ ॥ मैं तुमसे कुछ पूछती हूँ । तुम कपट त्यागकर बताओ । जो पद जान लिये जानेपर सब प्रकार की अमरता प्रदान करनेवाला है, जिस पदको जान लेनेपर सारे सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, कुछ भी जानना शेष नहीं रहता और न कोई चाहने-योग्य वस्तु ही रहती है, ऐसा जो अवेद्य पद है वह यदि तुम्हें विदित है तो शीघ्र ही मेरे सामने कहो ।” तपस्विनीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर कहोलपुत्रने कहा-॥५४-५६॥ “उस पदको मैं अच्छी तरह जानता हूँ और तपस्विनीजी ! सुनो, तुम्हें बताता हूँ । संसारमें ऐसी कोई बात नहीं है जो मैं नहीं जानता । तुम्हारे इस प्रश्नमें तो है ही क्या ? ॥ ५७ ॥ मैंने सारे ही शास्त्रोंका अनेकों बार आलोडन किया है । तुम जो कुछ पूछती हो अभी ठीक-ठीक बताये देता हूँ । तपस्विनीजी ! सुनिये ॥ ५८ ॥ तुम्हारा पूछा पद ही सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है । उसका न
२१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदुपाश्रित्य वै सर्वं जगदेतद्विराजते । आदर्शानगरप्रख्यं तदेतत्परमं पदम् ॥ ६० ॥ प्राप्नोति तद्विदित्वैव निश्चलामृतसंस्थितिम् । आदर्शे विदिते यद्वत् सन्देहः क्वचिद्भवेत् ॥ ६१ ॥ प्रतिबिम्बेष्वनन्तेषु न स्यादविदितं तथा । नाशास्यं वा भवेत्किञ्चिदेवं प्रविदिते परे ॥ ६२ ॥ तच्चाप्यवेद्यमन्यस्य वेदकादेरभावतः एवं तापसि तत्तत्त्वं शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६३ ॥ इत्यष्टावक्रवचनं श्रुत्वा सा पुनरब्रवीत् । मुनिदारक सूक्तं ते यथावत्सर्वसम्मतम् ॥ ६४ ॥ यदुक्तं वेदकाभावादवेद्यं तदिति त्वया । प्राप्नोति तद्विदित्वैव चामृतं पदमव्ययम् ॥ ६५ ॥ आदि है, न मध्य है और न अन्त है। वह देश और कालसे सीमित नहीं है तथा शुद्ध, अखण्ड और चिन्मय है ॥ ५६ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान जिसका आश्रय लेकर यह सारा जगत् विद्यमान है वही तुम्हारा पूछा हुआ परम पद है ॥ ६० ॥ जिस प्रकार दर्पणको जान लेनेपर उसमें प्रतिबिम्बित किसी भी वस्तुकी स्थितिके विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता उसी प्रकार उस पदको जान लेनेपर ही साधक अविचल अमरपद प्राप्त कर लेता है ॥६१॥ तथा जैसे [दर्पणका ज्ञान होनेपर] उसके अनन्त प्रतिबिम्बोंमें से कोई भी अज्ञात नहीं रहता उसी प्रकार उस परमपदको जान लेनेपर किसी वस्तुकी आशा (चाह) नहीं रहती ॥ ६२ ॥ अवश्य ही वह किसी अन्यके द्वारा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उसका कोई अन्य ज्ञाता है ही नहीं। तपस्विनीजी ! शास्त्र-दृष्टिसे उस तत्त्वके विषय में ऐसा निर्णय किया गया है” ॥ ६३ ॥ अष्टावक्रका ऐसा कथन सुनकर वह फिर बोली, “मुनिपुत्र ! तुम्हारा कथन बड़ा सुन्दर है। तथा वह यथार्थ और सर्वसम्मत भी है ॥ ६४ ॥ किन्तु तुमने जो कहा कि उसका कोई अन्य ज्ञाता न होनेके कारण वह पद अवेद्य है और [साथ ही यह भी कहा कि] उसे जान
पञ्चदशोऽध्यायः। २१७ इति पूर्वोत्तरवचो मन्यसे सङ्गतं कथम्। अवेद्यं चेन्न जानामि नास्तीति च निरूपय ॥ ६६ ॥ अस्ति जानासि यदि तदवेद्यमिति मा वद। अथैतत्तु त्वया विप्र शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६७ ॥ न तत्स्वयं विजानासि तस्मात्तच्चापरोक्षकम्। दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः सर्वं प्रतिबिम्बं यथास्थितम् ॥ ६८ ॥ आदर्शं न विजानासि प्रत्यक्षेणेति तत्कथम्। एवं वदन् सभामध्ये जनकस्यास्य वै पुरः ॥ ६९ ॥ परिभूतं स्वमात्मानं मन्यसे नो कथं वद। एवमुक्तस्तया तत्र नैव प्रोवाच किञ्चन ॥ ७० ॥ विमना इव सञ्जातो लज्जितोऽभवदञ्जसा। अवाङ्मुखः क्षणं स्थित्वा विचार्यान्तस्तयेरितम् ॥ ७१ ॥ तत्प्रश्नोत्तरमप्राप्य तां प्राह द्विजसत्तमः। लेनेपर ही साधक अविनाशी अमरपद प्राप्त कर लेता है—सो, इन पहले और पिछले दोनों वाक्योंकी परस्पर संगति कैसे लगेगी ? ॥६५-६६ पू०॥ यदि वह अवेद्य है तो कहो कि मैं उसे नहीं जानता अथवा वह पद है ही नहीं। और यदि वह है तथा तुम उसे जानते हो तो ऐसा मत कहो कि वह अवेद्य है ॥ ६६ उ०-६७ पू० ॥ इसके सिवा ब्राह्मणदेवता ! तुमने तो यह बात शास्त्रदृष्टिसे कल्पना कर ली है। स्वयं अनुभव करके तो जानी नहीं। इसलिये उसका तुम्हें अपरोक्ष ज्ञान तो है नहीं ॥ ६७ उ०-६८ पू० ॥ जब तुम सारे प्रतिबिम्बको ज्योंका त्यों प्रत्यक्ष देखते हो तो [ उसके आश्रयभूत ] दर्पणको प्रत्यक्ष क्यों नहीं जानते ? ॥ ६८ उ०-६९ पू० ॥ इस सभामें राजा जनकके सामने ऐसी बात कहने हुए भी, भला बताओ तो, तुम अपनेको परास्त हुआ क्यों नहीं मानते ?" ॥ ६९ उ०-७० पू० ॥ तपस्विनीके ऐसा कहनेपर अष्टावक्र कुछ भी न बोल सका। वह उदास- सा हो गया और स्वभावसे ही लज्जित भी हुआ ॥ ७० उ०-७१ पू० ॥ कुछ देर नीचा मुख किये बैठा रहा और उस तपस्विनीके कथन-
२१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तापस्यहं न जानामि त्वत्प्रश्नस्योत्तरं वचः ॥ ७२ ॥ शिष्योऽहं ते वदेतन्मे कथमेतन्निरूपितम् । नाहं वदाम्यनृतकं तपोहरमनर्थकम् ॥ ७३ ॥ इत्यापृष्टा तापसी सा प्रसन्ना तस्य सत्यतः । अष्टावक्रं प्रत्युवाच शृण्वतां च सभासदाम् ॥ ७४ ॥ वत्सैतदविदित्त्वैव बहवो मोहमागताः । शुष्कतर्कैरविज्ञेयं सर्वत्रैव सुगोपितम् ॥ ७५ ॥ एतावत्सु सभासत्सु न विजानाति कश्चन । राजाऽयं वेत्त्यहं वापि वेद्मि नान्यस्तु कश्चन ॥ ७६ ॥ सर्वत्र हि विवादेषु नैतत्प्रश्नोत्तरं क्वचित् । प्रायो विदुर्हि विद्वांसस्तर्कमात्रसमाश्रयाः ॥ ७७ ॥ नैतत्तर्केण सुज्ञेयमपि सूक्ष्मधिया क्वचित् । पर ऊहापोह करनेपर भी जब उसके प्रश्नका उत्तर न सूझा तो वह द्विजश्रेष्ठ बोला—॥ ७१ उ०-७२ पू० ॥ तपस्विनीजी ! मैं आपके प्रश्न का उत्तर नहीं जानता। मैं आपका शिष्य हूँ, अब आप ही बताइये कि शास्त्रमें ऐसा विरोधी निरूपण क्यों मिलता है ? मैं तपस्याको क्षीण करनेवाला अनर्थकारी असत्य- भाषण नहीं करता हूँ ॥ ७२ उ०-७३ ॥ इस प्रकार पूछे जानेपर तपस्विनी उसके सत्य-भाषणसे प्रसन्न हो गयी तथा सब सभासदोंके सुनते हुए अष्टावक्रसे कहने लगी ॥ ७४ ॥ “वत्स ! इस रहस्यको न जाननेके कारण ही बहुत लोग मोहमें पड़ जाते हैं ! यह बात कोरे तर्कसे समझमें आनेवाली नहीं है और सभी शास्त्रोंमें बहुत गुप्त है ॥ ७५ ॥ यहाँ जितने सभासद् हैं उनमेंसे भी कोई नहीं जानता। या तो यह राजा जानता है या मैं जानती हूँ, और कोई नहीं ॥ ७६ ॥ सब जगह वाद-विवादोंमें भी इस प्रकारका प्रश्नोत्तर कहीं नहीं होता । विद्वान् लोग भी प्रायः तर्कमात्रका आश्रय लेकर ही इसे जानते हैं ॥ ७७ ॥ किन्तु सद्गुरुकी सेवा और इष्टदेवकी कृपा आदिके बिना केवल
पञ्चदशोऽध्यायः। २१६ विना सद्गुरुसेवायां देवतानुग्रहादिना ॥ ७८ ॥ मुनिपुत्राभिधास्यामि शृण्वेतत्सूक्ष्मया धिया । नेदं श्रुत्वापि विज्ञेयं ताटस्थ्यप्राणया धिया ॥ ७९ ॥ यावदेतद्धि विज्ञानमनुदाहृतमात्मनि । तावत्सहस्रशः प्रोक्तं श्रुतं चापि निरर्थकम् ॥ ८० ॥ यथा कश्चित्स्वकण्ठस्थं मुक्ताहारं प्रमादतः । अविज्ञाय हृतं चौरैर्मन्यते मूढभावतः ॥ ८१ ॥ प्रबोधितोपि स पुनः कण्ठेऽस्तीति हि केनचित् । स्वात्मानमनुदाहृत्य यावत्कण्ठं न पश्यति ॥ ८२ ॥ तावन्नाप्नोति कण्ठस्थं हारं सूक्ष्मविमर्श्यपि । एवं मुनिसुतात्मानं स्वस्वभावं निशम्य च ॥ ८३ ॥ भूयोऽतिनिपुणोऽप्यन्तरात्मानमनुदाहरेत् । यावत्तावद्बहिः कुत्र कथं तद्विदितं भवेत् ॥ ८४ ॥ तर्कद्वारा सूक्ष्म बुद्धिसे इसे कभी कोई नहीं जान सकता ॥ ७८ ॥ मुनिपुत्र ! मैं तुम्हें समझाती हूं, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । तटस्थ प्राण (असमाहित चित्त) रहनेपर तो इसे सुनकर भी कोई जान नहीं सकता ॥ ७९ ॥ जबतक यह विज्ञान अपने अन्तःकरणमें अनुभूत नहीं होता तब- तक हजारों वार सुनाना या सुनना भी व्यर्थ ही होता है ॥ ८० ॥ जिस प्रकार कोई पुरुष अपने गलेमें पड़े मोतियोंके हारको भ्रमवश न जानकर अज्ञानवश समझता है कि उसे चोरों ने चुरा लिया ॥ ८१ ॥ उसे कोई ऐसा समझाते भी कि वह तेरे गले में है तो भी जबतक अपने शरीरके अभिमुख होकर वह अपने कण्ठको नहीं देखता तबतक, बड़ा सूक्ष्म विचार करनेवाला होनेपर भी, उसे वह कण्ठस्थ हार नहीं मिलता, इसी प्रकार हे मुनिपुत्र ! अपने आत्मा और आत्माके स्वभावके विषयमें बार-बार सुनकर भी जबतक समाहितचित्त होकर आत्माके अभिमुख नहीं होता तबतक अत्यन्त निपुण पुरुष भी उसे बाहर कहाँ और कैसे जान सकता है ? ॥ ८२-८४ ॥ १. अर्थात् 'मैं ऐसा हूँ या नहीं' ऐसा निर्णय करनेके लिये अन्तःकरण समाहित होकर अपने स्वरूपके अभिमुख नहीं होता ।
२२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा हि दीपो विषयान्प्रकाशयति सर्वतः । स्वयं प्रकाश्यतां नैति कचिद्दीपस्य कस्यचित् ॥ ८५ ॥ प्रकाशते स्वयं चैवानपेक्ष्यान्यं प्रकाशकम् । एवं सूर्योदये सर्वे प्रकाशकतया स्थिताः ॥ ८६ ॥ एवं च किं दीपमुखा अप्रकाश्यत्वहेतुतः । न सन्ति न प्रकाशन्ते इति वक्तुं हि युज्यते ॥ ८७ ॥ एवं प्रकाश्यभूतेषु सत्सु दीपमुखेषु वै । अत्यन्तमप्रकाश्यं यच्चित्त्वं तत्कुतो वद ॥ ८८ ॥ असंवेद्यं प्रकाशेत चेत्यत्र विचिकित्सितम् । तस्मात्त्वमन्तर्मुखया दृष्ट्या सम्यग्विचारय ॥ ८९ ॥ चिच्छक्तिरेषा परमा त्रिपुरा सर्वसंश्रया । सर्वावभासिनी कुत्र कदा वा न प्रकाशते ॥ ९० ॥ यदा सा न प्रकाशेत प्रकाशेत तदा नु किम् । अप्रकाशेनापि सैव चितिशक्तिः प्रकाशते ॥ ९१ ॥ जिस प्रकार दीपक सब ओर विषयोंको प्रकाशित करता है किन्तु स्वयं कभी किसी अन्य दीपकका प्रकाश्य नहीं होता वह किसी अन्य प्रकाशककी अपेक्षा न रखकर स्वयं ही प्रकाशित होता है, इसी प्रकार सूर्यादि अन्य सब भी प्रकाशक रूपसे ही स्थित हैं ॥ ८५-८६ ॥ ऐसी अवस्थामें अप्रकाश्य होनेके कारण क्या यह कहना ठीक है कि ये दीपक आदि हैं ही नहीं अथवा प्रकाशित ही नहीं होते ॥ ८७ ॥ इस प्रकार जब प्रकाशित होनेवाले दीपक आदिके विषयमें ऐसी बात है, तब जो अत्यन्त अप्रकाश्य [ अर्थात् जो कभी किसीका भी विषय नहीं होता ] उस चेतन तत्त्वके विषयमें यदि यह कहा जाता है कि 'वह अज्ञेय है और प्रकाशितभी होता है' तो इसमें सन्देह क्यों होता है ? अतः तुम अन्तर्मुख दृष्टिसे खूब विचार करो ॥ ८८-८९ ॥ यह सर्वोत्कृष्टा चित्-शक्ति ही सबकी आश्रयभूता त्रिपुरा देवी है । वही सबको प्रकाशित करनेवाली है । अतः वह कब और कहाँ प्रकाशित नहीं होती ? ॥ ९० ॥ जब वह प्रकाशित नहीं होगी तब और ही क्या प्रकाशित होगा ।
पञ्चदशोऽध्यायः । २२१ अप्रकाशो यथा भाति सा न भायात्कथं वद । भाति चेत्सा कथं भाति विमृशैतत्सुसूक्ष्मतः ॥ ९२ ॥ अत्र सर्वे न पश्यन्ति कुशला अपि पण्डिताः । अनन्तर्दृष्टयस्तेन मोहिताः संसरन्ति च ॥ ९३ ॥ यावद् दृष्टिः प्रवृत्तिं तु न परित्यज्य तिष्ठति । तावदन्तर्दृष्टितापि न स्यादेव कथञ्चन ॥ ९४ ॥ यावन्नान्तर्दृष्टिमेति तावत्तां न प्रपश्यति । अन्तर्दृष्टिर्निरीहा स्यात् सेहायाः सा कथं भवेत् ॥ ९५ ॥ परिहृत्य तु तां सम्यक् स्वभावमुपसंश्रय । क्षणं स्वभावमाश्रित्य निर्विमर्शस्ततः परम् ॥ ९६ ॥ विमृश्य स्मरणद्वारा ततो वेत्सि समस्तकम् । असंवेद्यं सुवेद्यं च तदेवं तत्त्वमुच्यते ॥ ९७ ॥ विदित्वैवमवेद्यं च प्राप्नुयादमृतां स्थितिम् । अप्रकाशरूपसे भी तो वह चितिशक्ति ही प्रकाशित होती है ॥ ९१ ॥ भला, जिससे अप्रकाशका भी भान होता है वह स्वयं क्यों भासित नहीं होगी ? और यदि भासती है तो किस प्रकार भासती है—इसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो ॥ ९२ ॥ अन्तर्दृष्टि हुए बिना इस रहस्यको बड़े निपुण विद्वान् भी नहीं समझ पाते । इसीसे वे मोहग्रस्त रहकर संसार-चक्रमें पड़े रहते हैं ॥९३॥ जबतक दृष्टि बाह्य प्रवृत्तिको त्यागकर स्थिर नहीं होती तबतक किसी प्रकार अन्तर्दृष्टिता भी प्राप्त नहीं हो सकती ॥ ९४ ॥ और जबतक अन्तर्दृष्टि नहीं होती तबतक उसका साक्षात्कार नहीं होता । अन्तर्दृष्टि तो निःसंकल्पता है अतः संकल्पोंके रहते हुए वह कैसे हो सकती है ॥ ९५ ॥ अतः तुम संकल्पोंको अच्छी तरह त्यागकर अपने स्वरूपका आश्रय लो और एक क्षण स्वरूपमें स्थित रहकर फिर निश्चिन्त हो जाओ ॥९६॥ फिर उस अवस्थाके स्मरण द्वारा तुम यह सब कुछ जान जाओगे कि वह तत्त्व अज्ञेय है और सुज्ञेय भी है—ऐसा क्यों कहा जाता है ॥९७॥ इस प्रकार उस अविज्ञेय तत्त्वको जानकर तुम अमृत-स्थिति
२२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एतत्तेऽभिहितं सर्वं मुनिपुत्र नमोऽस्तु ते ॥ ९८ ॥ व्रजाम्यहं त्वयः चैतन्न विज्ञातं सकृच्छ्रुतेः । बोधयिष्यति त्यामेष राजा बुद्धिमतां वरः ॥ ९९ ॥ पृच्छ भूयः संशयं ते सर्वं छेत्स्यति वै नृपः । इत्युक्त्वा पूजिता राज्ञा प्रणता च सभासदैः ॥ १०० ॥ वातनुन्नाभ्रलेखेव क्षणादन्तर्द्धिमाययौ । एतत्तेऽभिहितं राम वेदनप्रक्रियात्मनः ॥ १०१ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये पञ्चदशोऽध्यायः । प्राप्त कर लोगे। यह मैंने तुमसे सारा रहस्य कह दिया। मुनिपुत्र ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ९८ ॥ अब मैं जाती हूँ। एक बार सुन लेनेसे ही तुम इसे जान नहीं सकोगे। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज जनक तुम्हें इसका बोध करायेंगे। तुम इनसे पुनः प्रश्न करना। महाराज तुम्हारे सब संशयोंका छेदन कर देंगे” ॥ ९९-१०० पू० ॥ ऐसा कहकर वह उठी। राजाने उसका पूजन किया तथा अन्य सभासदोंने प्रणाम। फिर वह वायुसे विचलित हुई मेघमालाके समान एक क्षणमें ही अन्तर्धान हो गयी। परशुराम ! मैंने तुम्हें यह आत्माका ज्ञान होनेकी प्रक्रिया सुना दी ॥ १०० उ०-१०१ ॥ पञ्चदश अध्याय समाप्त।