त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः इति श्रुत्वा शैललोकाख्यानमत्यद्भुतं तदा । भूयोऽत्यन्तं विस्मितोऽभूद्रामो भृगुकुलोद्वहः ॥ १ ॥ विमृश्य गुरुणा प्रोक्तं बुद्ध्या निश्चित्य शुद्धया । दत्तात्रेयं पुनर्गत्वा नत्वा पप्रच्छ सादरम् ॥ २ ॥ भगवन् यत्त्वया प्रोक्तमाख्यानैर्विविधैस्तु तत् । तत्र सारमियज्ज्ञातं मयात्यन्तं विचारतः ॥ ३ ॥ संवेदनं सत्यमेकं संवेद्यं तत्र कल्पितम् । आदर्शनगरप्रख्यं मृषैव प्रविभावितम् ॥ ४ ॥ सा चितिः परमा शक्तिः संविद्रूपा महेश्वरी । स्वात्मभित्तौ जगच्चित्रमव्यक्तादिप्रभेदितम् ॥ ५ ॥ भावयेत्स्वातन्त्र्यमात्रान्निरुपदानहेतुकम् । एतावत्तु मया ज्ञातं विचार्य सूक्ष्मया धिया ॥ ६ ॥ पञ्चदश अध्याय ॥ १५ ॥ अष्टावक्रका प्रसङ्ग इस प्रकार शैललोककी अत्यन्त अनोखी गाथा सुनकर भृगुनन्दन श्री परशुरामजीको बड़ा ही अचम्भा हुआ ॥ १ ॥ उन्होंने गुरुदेवके कथनपर शुद्ध बुद्धिसे विचार किया और फिर कुछ निश्चयकर श्रीदत्तात्रेयजीके पास जा उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार करके पूछा ॥ २ ॥ “भगवन् ! आपने अनेकों आख्यानों द्वारा जो कुछ कहा है उस पर अत्यन्त विचार करके मैंने उसका यह सार समझा है—॥ ३ ॥ 'एक ज्ञान ही सत्य है, ज्ञेय (दृश्य) उसमें कल्पित है। दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान उसकी मिथ्या भावना कर ली गयी है ॥४॥ वह ज्ञानस्वरूपा परमाशक्ति चिति साक्षात् महेश्वरी है। वह अपने स्वातन्त्र्यसे बिना किसी उपादानके ही अपने ही स्वरूपभूत भित्तिपर इस अव्यक्तादि भेदों वाले जगच्चित्रकी कल्पना कर लेती है।' मैंने तो सूक्ष्म बुद्धिसे विचार करके इतना ही समझा है ॥ ५-६ ॥