त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे किं त्वेवंविधसंवित्तिर्वेद्यवन्ध्या निरूपिता। उपलब्धुमशक्यैव संवेद्यायाः सदा स्थितेः॥ ७॥ वेद्यं विना तु संवित्तेः कथं स्यादुपलम्भनम्। उपलम्भं विना तस्याः पुरुषार्थो न विद्यते॥ ८॥ पुरुषार्थोऽपि मोक्षः स्यात्स वा किंविध उच्यते। विज्ञाने सति मोक्षः स्यान्मुक्ते व्यवहृतिः कथम्॥ ९॥ ज्ञानिनोऽपि च दृश्यन्ते व्यवहारपरायणाः। कथं तेषां हि संवेद्यमुक्तं संवेदनं स्थितम्॥ १०॥ स्थितायां शुद्धसंवित्तौ व्यवहारः कथं भवेत्। विज्ञानमेकरूपं वै मोक्षोप्येकः फलं भवेत्॥ ११॥ तत्कथं ज्ञानिनां भेदः स्थितौ लोके हि दृश्यते। के चित्कर्म प्रकुर्वन्ति काले सच्छास्त्रचोदितम्॥ १२॥ के चित्समाराधयन्ति देवतां भिन्नवर्त्मभिः। किन्तु इस प्रकारकी उस चितिको तो वेद्यभावसे शून्य [अर्थात् अज्ञेय] कहा गया है। और यदि उसकी स्थिति सर्वदा उपलब्धिके अयोग्य ही है तो ज्ञानकी विषय न होनेके कारण उस चितिको किसीको उपलब्धि ही कैसे हो सकती है। और उसकी उपलब्धिके बिना पुरुषार्थ- की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ७-८॥ पुरुषार्थ भी यदि मोक्ष है तो वह किस प्रकारका कहा जाता है। यदि ज्ञान होनेपर मोक्ष हो जाता है तो मुक्तिके अनन्तर उस जीव- न्मुक्तका व्यवहार कैसे होता है? ॥ ९॥ ज्ञानियोंको भी व्यवहारमें तत्पर तो देखा ही जाता है। ऐसी अवस्थामें उनका ज्ञान ज्ञेयहीन (निर्विकल्प) कैसे रहता है? ॥ १०॥ यदि उनका ज्ञान निर्विकल्प ही रहता है तो उनके द्वारा व्यवहार कैसे होता है? [इसके सिवा एक संशय यह भी है कि] ज्ञान तो सबका एक जैसा ही होता है और उसका फल मोक्ष भी एक ही है। फिर लोकमें ज्ञानियोंकी स्थितिमें भेद क्यों देखा जाता है ॥११-१२ पू०॥ ज्ञानियोंमें कोई तो यथासमय शास्त्रोक्त कार्य करते हैं, कोई भिन्न-