भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

पञ्चदशोऽध्यायः। २०६ केचित्समाधिपरमाः संहृतेन्द्रियमण्डलाः ॥ १३ ॥ केचित्तपः प्रकुर्वन्ति देहेन्द्रियविशोषणम् । केचिच्छिष्यान्प्रबोधयन्ति पृथक्प्रवचनैः स्फुटम् ॥ १४ ॥ केचिद्राज्यं प्रशासन्ति दण्डनीत्युक्तवर्त्मना । केचित्प्रवादं कुर्वन्ति सदःसु प्रतिवादिभिः ॥ १५ ॥ केचिच्छास्त्राणि विविधान्यजस्रं रचयन्ति वै । अन्ये केवलमुग्धत्वमावहन्ति सदैव हि ॥ १६ ॥ केपि लोकविगर्हां तु वृत्तिं नित्यमिहास्थिताः । त इमे ज्ञानिन इति प्रथिता भूरिशोचनैः ॥ १७ ॥ तत्कथं साधनफलाभेदेपि स्थितिभिन्नता । किमेते समविज्ञानास्तारतम्यमुताश्रिताः ॥ १८ ॥ एतत्सर्वमशेषेण प्रवक्तुं मे समर्हसि । शिष्येऽनन्यशरण्ये ते निसर्गसदयं मनः ॥ १९ ॥ इत्यत्रिसूनुनापृष्टो भार्गवेण प्रसन्नधीः । भिन्न प्रणालियोंसे देवताओंकी आराधना करते हैं, कोई इन्द्रियग्रामका संयम करके समाधिमें तत्पर रहते हैं, कोई देह और इन्द्रियोंको सुखाने- वाला तप करते हैं, कोई तरह-तरहके वचनों द्वारा स्पष्टतया शिष्योंको उपदेश करते हैं, कोई दण्डनीतिमें बताये हुए नियमोंके अनुसार राज्य- शासन करते हैं, कोई सभाओंमें प्रतिवादियोंके साथ वाद-विवाद करते हैं, कोई निरन्तर तरह-तरहके शास्त्रोंकी रचना करते रहते हैं और कोई सर्वदा पागलपनका स्वांग ही बनाये रहते हैं ॥ १२ उ०-१६ ॥ कोई इस लोकमें निन्दनीय वृत्तिका आचरण करते हैं। फिर भी अत्यन्त चिन्तनशील लोग निश्चय करते हैं कि ये सभी ज्ञानी हैं ॥ १७॥ तब ऐसा क्यों है कि साधन और फलमें भेद न होनेपर भी इनकी स्थितियोंमें भेद है। इन सबका ज्ञान समान ही होता है अथवा उसमें न्यूनाधिकता रहती है ? ॥ १८ ॥ कृपया यह सब रहस्य मुझसे समझाकर कहिये। मुझे किसी अन्यका आश्रय नहीं है। अपने इस शिष्यके प्रति आपका चित्त स्वभावसे ही दयार्द्र है" ॥ १९ ॥ परशुरामजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर श्रीदत्तात्रेयजी बड़े