भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

२१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मत्वा योग्यं प्रश्नजातं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ २० ॥ राम बुद्धिमतां श्रेष्ठ नूनं स्पृशसि तत्पदम् । सद्विमर्शपरो यस्त्वमतो ज्ञातुं प्रभावितः ॥ २१ ॥ एतदेव हि तच्छक्तिपातो यत्सद्विमर्शनम् । भगवच्छक्तिपातेन विना कः श्रेय आप्नुयात् ॥ २२ ॥ कृत्यमात्मदेवताया जानीह्येतावदेव हि । यत्सद्विमर्शनं नित्यं वर्धयेत्सुप्रसादिता ॥ २३ ॥ यत्त्वया विदितं तत्तु तादृक् सत्यं नहीतरत् । किन्तु तत्तादृशमपि त्वयोक्तं परचिद्वपुः ॥ २४ ॥ न ते सुविदितं राम यत एवं वदस्यतः । ताटस्थ्येन तु यो यावद्वेद तावन्न वेद वै ॥ २५ ॥ यतः सा विदिता सम्यक्ताटस्थ्यमुपशामयेत् । तटस्थसंवेदनं तु स्वप्नसंवेदनोपमम् ॥ २६ ॥ प्रसन्न हुए और उनके प्रश्नोंको उचित समझकर उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ २० ॥ "परशुराम ! तुम बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हो । तुमने अवश्य उस पदका स्पर्श प्राप्त किया है । तुम सद्विचारमें तत्पर हो, इसलिये उसे जाननेकी भी योग्यता रखते हो ॥ २१ ॥ यह जो सद्विचार करता है वही भगवान्की अनुग्रहशक्तिको पाना है । भला उनकी अनुग्रहशक्तिको प्राप्त किये बिना कौन उस परमपदको प्राप्त कर सकता है ? ॥ २२ ॥ उस आत्मदेवका कार्य तो केवल इतना ही समझो कि वह प्रसन्न होकर निरन्तर सद्विचारकी वृद्धि करता रहे ॥ २३ ॥ तुमने जो कुछ समझा है वह तो उतना ही है; उससे भिन्न नहीं । किन्तु वह वैसा होनेपर भी तुमने जिस परा चिच्छक्तिकी चर्चा की है वह अभी तुम्हें ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है । इसीसे तुम ऐसी शंका करते हो ॥ २४-२५ पू० ॥ जबतक साधक तटस्थरूपसे उसे जानता है तबतक वास्तवमें नहीं जानता; क्योंकि जब उसका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है तो तटस्थता