भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

२०६ Tripura Rahasye Jñānakhaṇḍe | २०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे परित्यज्याऽखिलभ्रान्तिं ज्ञातज्ञेयः शुभाशयः । समाध्यभ्यासयोगेन संसाध्य निजभावनाम् ॥ ९४ ॥ स्वातन्त्र्यमधिगम्याऽथ चिरकालं विहृत्य तु । देहाभासमथोन्मूल्य महागगनसंश्रयः ॥ ९५ ॥ निर्वाणं परमं प्राप्तो महासेनोऽपि भार्गव । एवं जगत् सत्यभावभावनामात्रहेतुतः ॥ ९६ ॥ भाति सत्याऽऽत्मरूपेण विमृश्यैतद् भृगूद्वह । विचारेण शमं यायाद् भ्रान्तिस्ते चित्तसंश्रया ॥ ९७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शैललोकाख्यानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ भ्रम दूर हो गया । जानने योग्य तत्त्वको जानलेनेसे उसका अन्तःकरण शुद्ध हो गया । समाधिके अभ्यासद्वारा उसने अपनी भावनाको सिद्ध कर लिया और इस प्रकार स्वातन्त्र्य प्राप्त करके वह चिरकालतक भूतलमें विहार करता रहा। फिर देहानुसन्धानको भी निर्मूलकर उसने निर्विकल्प पराचितिका आश्रयसे परम निर्वाणपद प्राप्त कर लिया ॥ ६३ उ०-६६ पू० ॥ इस प्रकार हे भृगुनन्दन ! केवल सत्यताकी भावनाके कारण ही यह जगत् सत्यरूप भासता है—ऐसा विचार करो । विचारके द्वारा ही तुम्हारे चित्तमें रहनेवाला भ्रम शान्त होगा ॥ ६६ उ०-६७ ॥ चतुर्दश अध्याय समाप्त ।