त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः। २०५ त्वमप्यन्तःक्रोशमितं देशं कालं कलात्मकम्। विभाव्य भूयस्तत्रैव भावयाऽनन्तयोजनम् ॥ ८७ ॥ असङ्ख्यकालमपि च भासेद्यावद्धि भावनम्। तस्माद्भावनमात्रात्मरूपमेतज्जगद्बहिः ॥ ८८ ॥ चिदात्मरूपे व्यक्ते वै भासते मनुजाऽधिप। तस्माद्वाह्यात्मकाऽव्यक्तभित्तौ चित्रमयं जगत् ॥ ८९ ॥ अव्यक्तभित्तिमात्रं स्यात् सा स्वभित्तिचिदात्मिका। अत एव चिराद्गम्यो दूरदेशोऽपि योगिनः ॥ ९० ॥ क्षणेन गत्वा पश्यन्ति करामलकवद् ध्रुवम्। तस्माद् दूरं समीपं वा चिरं शीघ्रमथाऽपि वा ॥ ९१ ॥ भावनामात्रसंसिद्धं चिद्दर्पणसमाश्रितम् । निश्चित्यैवं त्यज भ्रान्तिं शुद्धचिद्भावनक्रमात् ॥ ९२ ॥ ततस्त्वमप्यहमिव स्वतन्त्रस्तु भविष्यसि। इति श्रुत्वा मुनिसुतवचनं मुनिसत्तमः ॥ ९३ ॥ तुम भी यदि अपनी संकल्पभूमिमें पहले एक कोश लम्बे देश और कलामात्र कालकी कल्पना करके फिर उसमें अनन्त योजनके विस्तार और असंख्यकालकी भावना करो तो जैसी तुम्हारी भावना होगी वैसा ही भासेगा। इसलिये राजन् ! यह भावनामात्र रूपवाला बाह्य जगत् चिदात्मारूप अव्यक्तपर ही भास रहा है। अतः बाह्यात्मक अव्यक्त भित्तिपर भासनेवाला यह चित्ररूप जगत् अव्यक्तमात्र ही है और वह अव्यक्त भित्ति चित्स्वरूपिणी है ॥ ८७-६० पू० ॥ इसीलिये योगीलोग दीर्घकालमें पहुँचने योग्य दूरवर्ती प्रदेशको भी क्षणमात्रमें जाकर निश्चय ही करामलकवत् देख लेते हैं॥६०उ०-६१पू०॥ अतः दूर या समीप तथा चिरकाल या अल्पकाल केवल भावनासे ही सिद्ध हुए हैं और चेतनरूप दर्पणके आश्रित हैं—ऐसा निश्चय करके तुम शुद्ध चेतनकी भावना करते हुए भ्रान्तिको त्याग दो। तब तुम भी मेरी ही तरह स्वतन्त्र हो जाओगे ॥ ६१ उ०-६३ पू० ॥ मुनिश्रेष्ठ परशुरामजी मुनिपुत्रके ये वचन सुनकर महासेनका सारा