भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

२०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भेदस्त्वौपाधिको भाति ह्युपाधिर्ब्रह्मभावितः । तद्भावनोपसंहारे नास्ति भेदस्य भासनम् ॥ ८१ ॥ चितौ या भावना शक्तिर्मायया ते समावृता । तदावरणहाने तु तव सा सिद्धिमेष्यति ॥ ८२ ॥ देशः कालोऽथवा किञ्चिद् यथा येन विभावितम् । तथा तत्तत्र भासेत दीर्घसूक्ष्मत्वभेदतः ॥ ८३ ॥ मयैकदिनरूपेण भावितं तद्दिनैककम् । ब्रह्मणा तावदेवाऽत्र द्वादशाऽर्बुदरूपतः ॥ ८४ ॥ भावितं तेनैवमेतच्चिरशीघ्रत्वभासनम् । ब्रह्मणा निर्मिते शैले पादगव्यूतिसम्मिते ॥ ८५ ॥ मयाऽनन्तप्रदेशस्य भावितत्वादनन्तता । एवं च द्वयमप्यत्र सत्यं चाऽसत्यमेव च ॥ ८६ ॥ भेद उपाधिके कारण भासता है और उपाधि ब्रह्माकी भावनासे हुई है। अतः उसकी भावनाका अन्त होनेपर भेदका भास भी नहीं होता ॥ ८१ ॥ तुममें जो चितिकी भावनाशक्ति है वह मायासे ढकी हुई है। उस आवरणकी निवृत्ति हो जाने पर वह तुम्हारे लिये सिद्ध (प्रकट) हो जायगी ॥ ८२ ॥ देश, काल अथवा कोई भी वस्तु हो उसके विषयमें जिसकी जैसी भावना है उसीके अनुसार वह उसे अल्प या बृहत् रूपमें भासता है ॥ ८३ ॥ मैंने [ अपने संसारमें ] एक दिनकी भावनाकी थी, इसलिये वहाँ एक दिन हुआ। किन्तु उतने ही कालकी ब्रह्माने बारह अरब वर्षरूपसे भावना की। इसीसे यह एक ही कालमें दीर्घता और शीघ्रता- का भास हुआ ॥ ८४-८५ पू० ॥ ब्रह्माके बनाये चौथाई गव्यूतिमात्र पर्वतमें मैंने अनन्त देशकी भावना की, इसलिये उसमें अनन्तता भासी। इस प्रकार ये अनुभूतियां दोनों प्रकार की हैं—[ व्यावहारिक दृष्टिसे ] सत्य भी हैं और [ पार- मार्थिक दृष्टिसे ] असत्य भी ॥ ८५ उ०-८६ ॥